वॉशिंगटन,23 अप्रैल (युआईटीवी)- मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ईरान के साथ अपने युद्धविराम को बढ़ाने का फैसला किया है,लेकिन इसके साथ ही तेहरान पर आर्थिक और सामरिक दबाव को और अधिक सख्त कर दिया गया है। व्हाइट हाउस की ओर से स्पष्ट संकेत दिए गए हैं कि सैन्य कार्रवाई में अस्थायी विराम का मतलब यह नहीं है कि अमेरिका अपने रणनीतिक उद्देश्यों से पीछे हट रहा है। इसके उलट,अमेरिका अब एक ऐसी दोहरी रणनीति पर काम कर रहा है,जिसमें एक ओर प्रत्यक्ष सैन्य टकराव को टालने की कोशिश की जा रही है,वहीं दूसरी ओर आर्थिक और समुद्री प्रतिबंधों के जरिए ईरान को कमजोर करने की दिशा में कदम तेज किए गए हैं।
व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलाइन लीविट ने इस नीति को विस्तार से समझाते हुए कहा कि अमेरिका ने युद्धविराम को बढ़ाकर बातचीत के लिए कुछ गुंजाइश जरूर छोड़ी है,लेकिन साथ ही ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक फ्यूरी’ के तहत आर्थिक दबाव को लगातार बढ़ाया जा रहा है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नौसैनिक नाकेबंदी पूरी तरह प्रभावी ढंग से जारी है और इसका उद्देश्य ईरान की आर्थिक जीवनरेखा को बाधित करना है। उनके अनुसार यह नाकेबंदी ईरान के लिए गंभीर आर्थिक संकट पैदा कर रही है और उसकी वैश्विक व्यापारिक गतिविधियों पर सीधा असर डाल रही है।
लीविट ने दावा किया कि इस नाकेबंदी के कारण ईरान को हर दिन भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि ईरान की तेल निर्यात क्षमता पर इसका बड़ा असर पड़ा है और वह न तो आसानी से तेल की खेप भेज पा रहा है और न ही अंतर्राष्ट्रीय भुगतान प्रणाली को सुचारु रूप से बनाए रख पा रहा है। उनके अनुसार यह रणनीति ईरान को आर्थिक रूप से इस हद तक कमजोर करने की कोशिश है कि वह बातचीत की मेज पर आने को मजबूर हो जाए।
हालाँकि,अमेरिका ने बातचीत की संभावना को खुला रखा है,लेकिन इसके लिए कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं की गई है। लीविट ने साफ कहा कि इस मामले में अंतिम निर्णय राष्ट्रपति के हाथ में है और वही तय करेंगे कि कब और कैसे आगे बढ़ना है। उन्होंने उन रिपोर्टों को भी खारिज किया जिनमें कहा जा रहा था कि बातचीत के लिए समय बहुत कम बचा है। उनके अनुसार अमेरिका किसी जल्दबाजी में नहीं है और वह अपने हितों को ध्यान में रखते हुए ही हर कदम उठा रहा है।
जब उनसे यह पूछा गया कि क्या यह युद्धविराम और नाकेबंदी लंबे समय तक जारी रह सकती है,तो उन्होंने कोई स्पष्ट जवाब देने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह परिस्थितियों पर निर्भर करेगा और राष्ट्रपति ही तय करेंगे कि कब यह रणनीति अमेरिका और उसकी जनता के हित में सबसे उपयुक्त है। इस बयान से यह संकेत मिलता है कि अमेरिका फिलहाल दबाव बनाए रखने की नीति पर कायम रहना चाहता है और किसी जल्द समझौते के मूड में नहीं है।
इस पूरे घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण पहलू ईरान की आंतरिक राजनीति भी बनकर उभरा है। लीविट ने कहा कि ईरान के भीतर नेतृत्व स्तर पर मतभेद हैं,जिससे बातचीत की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। उनके अनुसार ईरान में व्यवहारिक सोच रखने वाले नेताओं और कट्टरपंथी विचारधारा के समर्थकों के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है। यही कारण है कि अमेरिका को तेहरान से एक स्पष्ट और एकजुट प्रतिक्रिया नहीं मिल पा रही है।
व्हाइट हाउस ने यह भी स्वीकार किया कि ईरान की ओर से आ रहे विरोधाभासी संकेतों ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। लीविट के अनुसार ईरान सार्वजनिक रूप से जो बयान देता है,वह अक्सर निजी बातचीत में कही गई बातों से मेल नहीं खाता। इससे अमेरिका के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि ईरान की वास्तविक रणनीति क्या है और वह किस दिशा में आगे बढ़ना चाहता है। इसीलिए अमेरिका फिलहाल सतर्क रुख अपनाते हुए हर कदम सोच-समझकर उठा रहा है।
अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि इस समय रणनीतिक बढ़त उसके पास है। लीविट ने कहा कि मौजूदा हालात में सभी महत्वपूर्ण विकल्प राष्ट्रपति के हाथ में हैं और ईरान अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति में है। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति और अमेरिकी सरकार अपनी माँगों और ‘रेड लाइन्स’ को लेकर पूरी तरह स्पष्ट हैं और इस स्पष्टता का बातचीत पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ा है। उनके अनुसार यह सख्त रुख ही अमेरिका को मजबूत स्थिति में बनाए हुए है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की यह रणनीति ईरान पर दबाव बनाकर उसे अपनी शर्तों पर बातचीत के लिए मजबूर करने की कोशिश है। हालाँकि,इसका एक दूसरा पहलू यह भी है कि लंबे समय तक जारी रहने वाला आर्थिक और सैन्य दबाव क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ा सकता है। मध्य पूर्व पहले से ही कई संघर्षों से जूझ रहा है और ऐसे में अमेरिका-ईरान तनाव का बढ़ना वैश्विक स्तर पर भी असर डाल सकता है,खासकर तेल बाजार और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक और दिलचस्प बात सामने आई है कि अमेरिकी प्रशासन अन्य क्षेत्रों पर भी नजर बनाए हुए है। लीविट ने संकेत दिया कि विमानन क्षेत्र से जुड़े घटनाक्रमों,खासकर स्पिरिट एयरलाइंस से संबंधित संभावित राहत पैकेज की खबरों पर भी ध्यान दिया जा रहा है, हालाँकि,उन्होंने इस बारे में अधिक जानकारी साझा नहीं की। इससे यह स्पष्ट होता है कि अमेरिका एक साथ कई मोर्चों पर अपनी नीतियों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है।
अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा स्थिति एक जटिल रणनीतिक खेल की तरह है,जिसमें दोनों पक्ष अपने-अपने हितों को सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका जहाँ आर्थिक और सामरिक दबाव के जरिए बढ़त बनाए रखना चाहता है,वहीं ईरान भी अपने हितों से समझौता करने के मूड में नहीं दिख रहा। ऐसे में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले दिनों में यह टकराव किस दिशा में आगे बढ़ता है और क्या दोनों देश किसी साझा समाधान तक पहुँच पाते हैं या नहीं।
