नई दिल्ली,3 मार्च (युआईटीवी)- भारत और कनाडा के बीच हाल ही में हुआ 2.6 अरब डॉलर का यूरेनियम आपूर्ति समझौता न केवल ऊर्जा क्षेत्र में एक बड़ा कदम है,बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलते भू-राजनीतिक और आर्थिक समीकरणों का संकेत भी देता है। ‘वन वर्ल्ड आउटलुक’ की ताजा रिपोर्ट के अनुसार,यह समझौता कनाडा की उस नई रणनीतिक सोच को दर्शाता है,जिसमें भारत को केवल प्रवासी समुदाय या कूटनीतिक चुनौती के नजरिए से नहीं,बल्कि एक उभरती वैश्विक आर्थिक शक्ति और विशाल ऊर्जा बाजार के रूप में देखा जा रहा है।
नई दिल्ली में घोषित ‘स्ट्रैटेजिक एनर्जी पार्टनरशिप’ के तहत कनाडा की प्रमुख खनन कंपनी कैमको वर्ष 2027 से 2035 के बीच भारत के नागरिक परमाणु रिएक्टरों के लिए लगभग 2.2 करोड़ पाउंड यूरेनियम की आपूर्ति करेगी। यह दीर्घकालिक समझौता भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाएगा। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और उसकी औद्योगिक प्रगति के साथ ऊर्जा की मांग भी निरंतर बढ़ रही है। ऐसे में स्थिर और भरोसेमंद परमाणु ईंधन आपूर्ति भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि यह समझौता कनाडा के लिए भी रणनीतिक रूप से फायदेमंद है। अब तक ओटावा का निर्यात काफी हद तक अमेरिका पर निर्भर रहा है,लेकिन वैश्विक बाजार में विविधता लाने की उसकी कोशिशें तेज हो गई हैं। भारत के साथ यह साझेदारी अमेरिका पर एकमात्र बाजार के रूप में निर्भरता कम करने की दिशा में अहम कदम है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आर्थिक उपस्थिति मजबूत करना कनाडा की विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है और भारत इस रणनीति के केंद्र में उभरता दिख रहा है।
यह साझेदारी केवल यूरेनियम आपूर्ति तक सीमित नहीं है। ‘स्ट्रैटेजिक एनर्जी पार्टनरशिप’ के दायरे में एलएनजी,एलपीजी,सौर ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन जैसे ऊर्जा स्रोत भी शामिल हैं। इसका अर्थ है कि दोनों देश ऊर्जा को केवल व्यापारिक लेन-देन के रूप में नहीं,बल्कि व्यापक आर्थिक बदलाव और दीर्घकालिक सहयोग की आधारशिला के रूप में देख रहे हैं। ऊर्जा सहयोग से औद्योगिक निवेश,तकनीकी साझेदारी और आपूर्ति श्रृंखला में भी नए अवसर खुलने की संभावना है।
कनाडा की रिपोर्ट में भारत को “विशाल आकार वाली अर्थव्यवस्था” के रूप में वर्णित किया गया है—जहाँ आबादी का आकार बड़ा है,ऊर्जा की माँग विशाल है,औद्योगिक विकास तेज है और भू-राजनीतिक महत्व लगातार बढ़ रहा है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की भूमिका को लेकर कनाडा की सोच में आया यह बदलाव दोनों देशों के संबंधों में एक नई शुरुआत का संकेत देता है। लंबे समय तक भारत-कनाडा संबंधों में प्रवासी मुद्दों और कुछ कूटनीतिक तनावों की छाया रही,लेकिन अब आर्थिक सहयोग प्राथमिकता में दिखाई दे रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि इस ऊर्जा समझौते के बाद अगला बड़ा कदम व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते,यानी सीईपीए,को अंतिम रूप देना होगा। दोनों देशों के मुख्य वार्ताकारों की बैठक हो चुकी है और प्रारंभिक शर्तों पर हस्ताक्षर भी किए जा चुके हैं। कनाडा सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना से अधिक बढ़ाकर 70 अरब डॉलर तक पहुँचाया जाए। यदि सीईपीए को अंतिम रूप मिल जाता है,तो व्यापार,निवेश,सेवाओं और तकनीकी सहयोग के क्षेत्र में अभूतपूर्व विस्तार संभव है।
हाल के महीनों में दोनों देशों के संबंधों में सुधार के संकेत भी दिखाई दिए हैं। विदेश मंत्रालय ने पुष्टि की है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके कनाडाई समकक्ष मार्क कार्नी के बीच बातचीत हुई,जिसमें दोनों देशों में राजनयिक स्टाफ की संख्या को पहले के स्तर पर बहाल करने पर चर्चा की गई। यह कदम कूटनीतिक संवाद को सामान्य बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मार्क कार्नी के कनाडा के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत के साथ संबंधों को पटरी पर लाने के लिए संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया गया है। इसी क्रम में भारत ने दिनेश के पटनायक को कनाडा में उच्चायुक्त नियुक्त किया है,जो इस बात का संकेत है कि नई दिल्ली भी द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के लिए गंभीर है।
ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग से दोनों देशों को रणनीतिक लाभ मिल सकता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित और विविध स्रोतों से पूरा कर सकेगा,जबकि कनाडा को एक स्थिर और विशाल बाजार मिलेगा। परमाणु ऊर्जा को लेकर भारत की दीर्घकालिक योजनाएँ महत्वाकांक्षी हैं और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में परमाणु ऊर्जा की भूमिका अहम मानी जाती है। ऐसे में यूरेनियम की नियमित और भरोसेमंद आपूर्ति भारत की ऊर्जा नीति को मजबूती देगी।
2.6 अरब डॉलर का यह समझौता केवल एक व्यापारिक करार नहीं,बल्कि व्यापक रणनीतिक साझेदारी की दिशा में निर्णायक कदम है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलते समीकरणों के बीच भारत और कनाडा का यह सहयोग आर्थिक,ऊर्जा और कूटनीतिक स्तर पर नए आयाम खोल सकता है। यदि सीईपीए जैसे समझौते भी साकार हो जाते हैं,तो आने वाले वर्षों में भारत-कनाडा संबंध एक नई ऊँचाई पर पहुँच सकते हैं,जहाँ ऊर्जा सुरक्षा,व्यापार विस्तार और भू-राजनीतिक संतुलन एक साथ आगे बढ़ते दिखाई देंगे।
