नई दिल्ली,23 अप्रैल (युआईटीवी)- राष्ट्रीय राजधानी में करोड़ों रुपये के चर्चित वीडियोकॉन मनी लॉन्ड्रिंग मामले में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। प्रवर्तन निदेशालय ने इस मामले में ब्रिटेन में रह रहे कारोबारी सचिन देव दुग्गल के खिलाफ विशेष न्यायालय में पूरक आरोपपत्र दाखिल किया है। यह कार्रवाई पहले से चल रही जाँच का विस्तार मानी जा रही है,जिसमें पहले ही वीडियोकॉन समूह के प्रमुख वेणुगोपाल धूत समेत कई अन्य लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है।
जानकारी के अनुसार,यह पूरक आरोपपत्र उस मूल शिकायत से जुड़ा है,जिसे 18 दिसंबर 2024 को दाखिल किया गया था। विशेष मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम न्यायालय ने इस मामले का संज्ञान 10 फरवरी को लिया था और अब जाँच एजेंसी ने नए तथ्यों और सबूतों के आधार पर अपनी जाँच को आगे बढ़ाते हुए दुग्गल को भी इस कथित घोटाले में शामिल बताया है।
इस पूरे मामले की जड़ें 23 जून 2020 को दर्ज उस प्राथमिकी में हैं,जिसे केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने दर्ज किया था। इस प्राथमिकी में आरोप लगाया गया था कि वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज लिमिटेड की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी वीडियोकॉन हाइड्रोकार्बन होल्डिंग्स लिमिटेड ने भारतीय स्टेट बैंक के नेतृत्व वाले बैंकों के एक समूह से भारी भरकम वित्तीय सुविधा प्राप्त की थी। यह सुविधा 2,773.60 मिलियन डॉलर की स्टैंडबाय लेटर ऑफ क्रेडिट के रूप में थी,जिसका उद्देश्य मोजाम्बिक,ब्राजील और इंडोनेशिया में तेल और गैस परियोजनाओं के विकास के लिए बताया गया था।
हालाँकि,जाँच के दौरान सामने आया कि इन फंड्स का उपयोग अपने निर्धारित उद्देश्य के लिए नहीं किया गया। प्रवर्तन निदेशालय के अनुसार,वीडियोकॉन समूह के प्रमोटरों ने विदेशी कंपनियों के एक जटिल नेटवर्क के माध्यम से करीब 2.03 बिलियन डॉलर की राशि का कथित तौर पर गबन किया। इस पूरी प्रक्रिया को योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया,जिसमें विभिन्न देशों में स्थित कंपनियों के जरिए धन को इधर-उधर घुमाकर उसे वैध दिखाने की कोशिश की गई।
ईडी के आरोपों के मुताबिक,इस कथित घोटाले में सचिन देव दुग्गल एक प्रमुख लाभार्थी के रूप में सामने आए हैं। बताया गया है कि उनकी स्विस कंपनी एनहोल्डिंग्स एसए और उनकी अन्य कंपनियों के जरिए इस फंड के प्रवाह को नियंत्रित किया गया। जाँच एजेंसी का दावा है कि दुग्गल की कंपनियों के माध्यम से धन को इस तरह से ट्रांसफर किया गया कि उसका स्रोत छिपाया जा सके और उसे वैध आय के रूप में प्रस्तुत किया जा सके।
जाँच में यह भी सामने आया कि इस कथित योजना की शुरुआत वर्ष 2008 में हुई थी,जब वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने दुग्गल के नियंत्रण वाली कंपनी निवियो टेक्नोलॉजीज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को बिना किसी औपचारिक ऋण समझौते के 17.32 करोड़ रुपये का ब्याज मुक्त ऋण दिया था। बाद में 24 मई 2011 को जल्दबाजी में एक ऋण समझौता किया गया,जिससे इस लेनदेन को वैध रूप देने की कोशिश की गई।
इसके अगले ही दिन एक विदेशी वीडियोकॉन इकाई ने दुग्गल की स्विस कंपनी में निवेश किया। यह निवेश 37.9 लाख स्विस फ्रैंक का था,जिसे ईडी ने संदिग्ध बताया है। एजेंसी का कहना है कि यह निवेश कंपनी के वास्तविक मूल्य से कहीं अधिक पर किया गया,जिससे यह संकेत मिलता है कि इसमें धन के गलत इस्तेमाल की संभावना थी।
2011 से 2014 के बीच कथित तौर पर पाँच विदेशी इकाइयों के जरिए एक सुनियोजित नेटवर्क तैयार किया गया,जिसके माध्यम से एनहोल्डिंग्स एसए और सीधे सचिन देव दुग्गल को 37.07 लाख डॉलर,यानी करीब 20.12 करोड़ रुपये,हस्तांतरित किए गए। इस पूरे लेनदेन को ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग की प्रक्रिया का हिस्सा बताया है,जिसमें अवैध धन को वैध बनाने के लिए कई स्तरों पर लेनदेन किए गए।
निवियो टेक्नोलॉजीज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के वित्तीय रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि वित्तीय वर्ष 2011-12 के दौरान कंपनी को एनहोल्डिंग्स एसए से 35 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। यह वही समय था,जब वीडियोकॉन समूह कथित तौर पर स्विस इकाई को धन भेज रहा था। इससे यह संदेह और मजबूत होता है कि इन कंपनियों के बीच वित्तीय लेनदेन एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा थे।
इसी अवधि में कंपनी की स्वामित्व संरचना में भी बदलाव किया गया। एनहोल्डिंग्स एसए को निवियो टेक्नोलॉजीज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड की परम मूल कंपनी बना दिया गया,जबकि निवियो क्लाउड कंप्यूटिंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को एक मध्यवर्ती होल्डिंग कंपनी के रूप में स्थापित किया गया। ईडी का आरोप है कि इस पुनर्गठन के जरिए दुग्गल ने भारत और विदेश में स्थित सभी संबंधित कंपनियों पर अपना सीधा नियंत्रण सुनिश्चित किया।
हालाँकि,इन सभी लेनदेन के बावजूद अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इन निधियों का अंतिम उपयोग क्या था। 31 मार्च 2013 को समाप्त हुए वर्ष के लिए एनहोल्डिंग्स एसए के वित्तीय विवरण में यह उल्लेख किया गया कि निवियो में किया गया निवेश पूरी तरह से बट्टे खाते में डाल दिया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि निवेश का वास्तविक उद्देश्य कुछ और हो सकता था।
जाँच एजेंसी ने यह भी बताया कि जनवरी 2022 से लेकर अब तक मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम की धारा 50 के तहत कई बार सचिन देव दुग्गल को समन भेजे गए,लेकिन वे एजेंसी के सामने पेश नहीं हुए। उन्होंने केवल ईमेल के माध्यम से कुछ दस्तावेज जमा किए,जिन्हें ईडी ने अधूरा और टालमटोल वाला बताया है।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर देश में कॉर्पोरेट धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग के बड़े नेटवर्क की ओर ध्यान आकर्षित किया है। प्रवर्तन निदेशालय की यह कार्रवाई इस बात का संकेत है कि एजेंसी इस मामले को लेकर गंभीर है और हर पहलू की गहराई से जाँच कर रही है।
फिलहाल मामला अदालत में है और आने वाले समय में इससे जुड़े और भी खुलासे होने की संभावना है। यदि आरोप सिद्ध होते हैं,तो यह देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट घोटालों में से एक साबित हो सकता है।
