कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे (तस्वीर क्रेडिट@Anand_thunder)

पीएम पर ‘आतंकवादी’ टिप्पणी से सियासी बवाल,चुनाव आयोग ने खरगे को भेजा नोटिस

नई दिल्ली,23 अप्रैल (युआईटीवी)- देश की राजनीति में एक बार फिर बयानबाजी को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की कथित ‘आतंकवादी’ टिप्पणी ने सियासी माहौल को गर्म कर दिया है। इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए भारत निर्वाचन आयोग ने खरगे को नोटिस जारी कर 24 घंटे के भीतर जवाब देने को कहा है। आयोग की इस कार्रवाई के बाद यह विवाद और तेज हो गया है और राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है।

मामले की शुरुआत उस समय हुई,जब चेन्नई में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री को लेकर विवादित टिप्पणी की। उनके बयान को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने कड़ा विरोध जताया और इसे प्रधानमंत्री के पद की गरिमा के खिलाफ बताया। भाजपा ने तुरंत इस मुद्दे को चुनाव आयोग के सामने उठाया और माँग की कि इस तरह की भाषा पर सख्त कार्रवाई की जाए। इसके बाद आयोग ने पूरे घटनाक्रम का संज्ञान लेते हुए खरगे को कारण बताओ नोटिस भेजा है।

चुनाव आयोग ने अपने नोटिस में स्पष्ट किया है कि इस तरह के बयान चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकते हैं और आचार संहिता का उल्लंघन भी हो सकता है। आयोग ने खरगे से 24 घंटे के भीतर अपना पक्ष रखने को कहा है,जिससे यह स्पष्ट हो सके कि उनका बयान किस संदर्भ में दिया गया था। आयोग की इस त्वरित कार्रवाई को इस बात का संकेत माना जा रहा है कि वह चुनावी प्रक्रिया के दौरान किसी भी प्रकार की आपत्तिजनक भाषा को लेकर सख्त रुख अपनाना चाहता है।

इस विवाद के बीच मल्लिकार्जुन खरगे ने अपने बयान पर सफाई भी दी है। उन्होंने कहा कि उनके शब्दों का गलत अर्थ निकाला गया है और उनका आशय प्रधानमंत्री को ‘आतंकित करने वाला’ बताने का था,न कि उन्हें ‘आतंकवादी’ कहना। खरगे के अनुसार उन्होंने यह कहना चाहा था कि प्रधानमंत्री अपनी सत्ता और एजेंसियों का इस्तेमाल कर लोगों को डराने और दबाव में रखने का काम करते हैं। उन्होंने यह भी जोर देकर कहा कि उन्होंने कभी प्रधानमंत्री को आतंकवादी नहीं कहा और उनके बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है।

हालाँकि,भाजपा ने इस सफाई को खारिज करते हुए इसे महज एक बचाव का प्रयास बताया है। पार्टी के नेताओं ने कहा है कि इस तरह के बयान न केवल निंदनीय हैं,बल्कि यह कांग्रेस की मानसिकता को भी दर्शाते हैं। भाजपा का आरोप है कि विपक्षी नेता लगातार प्रधानमंत्री के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं और यह एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।

इस मुद्दे को लेकर भाजपा का एक प्रतिनिधिमंडल, जिसमें केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण समेत अन्य नेता शामिल थे,ने चुनाव आयोग से मुलाकात की थी। इस प्रतिनिधिमंडल ने आयोग से माँग की कि मल्लिकार्जुन खरगे के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए और चुनावी प्रचार के दौरान इस तरह की भाषा पर रोक लगाई जाए। मुलाकात के बाद निर्मला सीतारमण ने मीडिया से बातचीत में कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष का यह बयान बेहद आपत्तिजनक है और इससे चुनावी प्रक्रिया की गरिमा प्रभावित होती है।

भाजपा के अन्य नेताओं ने भी इस मामले पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। पार्टी के प्रवक्ताओं का कहना है कि यह कोई ‘जुबान फिसलने’ का मामला नहीं है,बल्कि यह एक सुनियोजित बयान है, जो प्रधानमंत्री की छवि को नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से दिया गया है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस के शीर्ष नेता लगातार ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं,जो लोकतांत्रिक संवाद के स्तर को गिराते हैं।

दूसरी ओर कांग्रेस ने इस विवाद को राजनीतिक रंग देने का आरोप भाजपा पर लगाया है। पार्टी के नेताओं का कहना है कि खरगे के बयान को जानबूझकर गलत तरीके से पेश किया जा रहा है,ताकि असली मुद्दों से ध्यान हटाया जा सके। कांग्रेस का यह भी कहना है कि प्रधानमंत्री और सरकार के खिलाफ सवाल उठाना लोकतंत्र का हिस्सा है और इसे गलत तरीके से पेश करना उचित नहीं है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी मौसम में इस तरह की बयानबाजी अक्सर देखने को मिलती है,लेकिन इस बार मामला इसलिए गंभीर हो गया है क्योंकि इसमें देश के प्रधानमंत्री का नाम सीधे तौर पर जुड़ा है। ऐसे में चुनाव आयोग की भूमिका भी अहम हो जाती है,क्योंकि उसे यह सुनिश्चित करना होता है कि चुनावी प्रक्रिया निष्पक्ष और मर्यादित बनी रहे।

इस पूरे विवाद का असर आने वाले चुनावी प्रचार पर भी पड़ सकता है। एक ओर जहाँ भाजपा इस मुद्दे को लेकर आक्रामक रुख अपनाए हुए है,वहीं कांग्रेस अपने नेता के बयान का बचाव करने में जुटी है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनाव आयोग इस मामले में क्या फैसला लेता है और क्या यह विवाद आगे और तूल पकड़ता है।

फिलहाल सभी की नजरें चुनाव आयोग के अगले कदम पर टिकी हैं। यदि आयोग इस मामले में सख्त कार्रवाई करता है,तो यह एक संदेश जाएगा कि चुनावी राजनीति में मर्यादा बनाए रखना अनिवार्य है। वहीं यदि मामला केवल चेतावनी तक सीमित रहता है,तो यह बहस जारी रह सकती है कि क्या राजनीतिक दलों को अपनी भाषा पर और नियंत्रण रखने की जरूरत है।

यह विवाद केवल एक बयान तक सीमित नहीं है,बल्कि यह देश की राजनीति में संवाद के स्तर,चुनावी मर्यादा और जिम्मेदारी जैसे बड़े मुद्दों को भी सामने लाता है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह मामला किस दिशा में आगे बढ़ता है और इसका राजनीतिक समीकरणों पर क्या असर पड़ता है।