मनीष सिसोदिया और अरविंद केजरीवाल (तस्वीर क्रेडिट@epanchjanya)

दिल्ली आबकारी नीति मामले में बरी किए जाने को सीबीआई ने दी चुनौती,हाईकोर्ट में सरकार बोली—‘यह राजधानी का सबसे बड़ा घोटाला’

नई दिल्ली,9 मार्च (युआईटीवी)- दिल्ली की चर्चित आबकारी नीति मामले में एक बार फिर कानूनी और राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) की उस याचिका पर सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई हुई जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा आम आदमी पार्टी के नेताओं समेत 23 आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने अदालत में जोरदार दलीलें पेश करते हुए कहा कि यह राष्ट्रीय राजधानी के सबसे बड़े भ्रष्टाचार मामलों में से एक है और जाँच एजेंसियों ने इस साजिश के हर पहलू को वैज्ञानिक तरीके से साबित किया है।

इस मामले में प्रमुख आरोपी रहे दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और उनके करीबी सहयोगी तथा पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया को हाल ही में ट्रायल कोर्ट ने अन्य आरोपियों के साथ बरी कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ सीबीआई ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। मामले की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि जाँच एजेंसी ने इस मामले में व्यापक और वैज्ञानिक तरीके से जाँच की है और इसमें रिश्वत देने,लेने तथा उसके इस्तेमाल से जुड़ी साजिश के पर्याप्त सबूत मौजूद हैं।

उन्होंने अदालत में कहा कि यह स्पष्ट रूप से भ्रष्टाचार का मामला है और इसमें कई स्तरों पर पैसों के लेन-देन के प्रमाण सामने आए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हवाला चैनलों के माध्यम से कई किश्तों में रकम ट्रांसफर की गई थी। उनके अनुसार जाँच के दौरान ऐसे कई गवाह सामने आए,जिन्होंने मजिस्ट्रेट के समक्ष अपने बयान दर्ज कराए और पूरी साजिश के बारे में जानकारी दी।

सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि कई प्रमुख गवाहों के बयान दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज किए गए हैं। इन बयानों में यह विस्तार से बताया गया है कि कथित साजिश कैसे रची गई,रिश्वत कैसे दी गई और किसे दी गई। उन्होंने कहा कि जाँच एजेंसी के पास इस मामले से जुड़े ईमेल और व्हाट्सएप चैट जैसे डिजिटल सबूत भी मौजूद हैं,जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह मामला किसी प्रकार की कल्पना या आरोप मात्र नहीं है।

सुनवाई के दौरान उन्होंने ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने ट्रायल कोर्ट के सामने करीब दस दिनों तक विस्तार से बहस की थी,लेकिन उसके कुछ ही समय बाद फैसला सुना दिया गया। उनके अनुसार न्याय की प्रक्रिया में तेजी निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है,लेकिन यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जल्दबाजी के कारण न्याय की गुणवत्ता प्रभावित न हो।

सॉलिसिटर जनरल ने यह भी कहा कि जब किसी मामले में आपराधिक साजिश का आरोप लगाया जाता है,तो उसके हर पहलू को जोड़कर देखना आवश्यक होता है। उनके अनुसार साजिशें आम तौर पर खुले तौर पर नहीं रची जातीं,बल्कि अलग-अलग घटनाओं और परिस्थितियों को जोड़कर ही उनकी पूरी तस्वीर सामने आती है। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में सबूतों की गहराई से जाँच ट्रायल के दौरान की जानी चाहिए,न कि शुरुआती चरण में ही उन्हें खारिज कर दिया जाना चाहिए।

उन्होंने अदालत को बताया कि इस मामले में कई महत्वपूर्ण गवाहों के बयान और होटल के रिकॉर्ड भी मौजूद हैं,जिनकी पूरी जाँच मुकदमे की सुनवाई के दौरान होनी चाहिए। उनके अनुसार आरोप तय करने के चरण में ही इन सबूतों को नज़रअंदाज़ करना उचित नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने कई ऐसे नोट्स और डिजिटल सामग्री पर कोई ठोस निष्कर्ष नहीं दिया जो आरोपियों के मोबाइल फोन से बरामद हुए थे।

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने साक्ष्य नष्ट करने के आरोपों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जाँच के दौरान ऐसे कई उदाहरण सामने आए जहाँ कथित तौर पर सबूतों को नष्ट करने की कोशिश की गई। उन्होंने दावा किया कि लगभग 170 मोबाइल फोन नष्ट कर दिए गए थे। उनके अनुसार इन घटनाओं से यह संकेत मिलता है कि जाँच में सामने आए महत्वपूर्ण सबूतों को खत्म करने का प्रयास किया गया।

उन्होंने अदालत का ध्यान इस ओर भी दिलाया कि ट्रायल कोर्ट के डिस्चार्ज ऑर्डर में उन गवाहों के बयानों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया,जिन्हें मामले में ‘अप्रूवर’ के रूप में पेश किया गया था। उन्होंने कहा कि कानून के अनुसार आरोप तय करने के चरण में अप्रूवर के बयान महत्वपूर्ण माने जाते हैं और उन्हें पूरी तरह नज़रअंदाज़ करना उचित नहीं है।

यह मामला उस समय सुर्खियों में आया था,जब दिल्ली सरकार की नई आबकारी नीति को लेकर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। इस नीति के तहत शराब की बिक्री और वितरण प्रणाली में कई बदलाव किए गए थे। विपक्षी दलों और कुछ जाँच एजेंसियों ने आरोप लगाया था कि इस नीति के जरिए कुछ निजी कंपनियों को अनुचित लाभ पहुँचाया गया और इसके बदले में कथित तौर पर रिश्वत ली गई।

इस पूरे मामले को आमतौर पर ‘शराब नीति घोटाला’ कहा जाता है। इसी मामले में दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने 27 फरवरी को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए अरविंद केजरीवाल,मनीष सिसोदिया समेत कुल 23 आरोपियों को बरी कर दिया था। अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि आरोप तय करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं पाए गए।

हालाँकि,इस फैसले के बाद राजनीतिक माहौल भी गर्म हो गया था। आम आदमी पार्टी और विपक्षी गठबंधन ने आरोप लगाया था कि केंद्र सरकार ने राजनीतिक लाभ के लिए केंद्रीय जाँच एजेंसियों का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा था कि यह पूरा मामला राजनीतिक दबाव में तैयार किया गया था।

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी उस समय आरोप लगाया था कि उनके खिलाफ साजिश रची गई थी। उनका कहना था कि दिल्ली में राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिए उनके खिलाफ यह पूरा मामला तैयार किया गया। उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया था कि केंद्रीय एजेंसियों के माध्यम से उन्हें और उनकी पार्टी को निशाना बनाया गया।

अब जब सीबीआई ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी है,तो यह मामला एक बार फिर अदालत के समक्ष आ गया है। दिल्ली हाईकोर्ट में चल रही इस सुनवाई पर राजनीतिक और कानूनी हलकों की नजर बनी हुई है। आने वाले दिनों में अदालत के निर्णय से यह स्पष्ट होगा कि क्या इस मामले में आगे मुकदमा चलाने की प्रक्रिया जारी रहेगी या ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रहेगा।