वाशिंगटन,9 मार्च (युआईटीवी)- अमेरिका में एच-1बी वीजा नीति को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस फैसले के खिलाफ अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में एक नया विधेयक पेश किया गया है,जिसमें एच-1बी वीजा कर्मचारियों को नियुक्त करने वाले नियोक्ताओं पर सख्त वेतन मानक और भारी शुल्क लगाने का प्रावधान किया गया था। इस विधेयक को डेमोक्रेटिक पार्टी की सांसद बोनी वॉटसन कोलमैन ने पेश किया है। उनका कहना है कि ट्रंप प्रशासन के इस फैसले ने अमेरिकी कंपनियों,विश्वविद्यालयों,अस्पतालों और शोध संस्थानों के सामने गंभीर चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं,जो वैश्विक स्तर की प्रतिभा पर निर्भर रहते हैं।
दरअसल,सितंबर 2025 में राष्ट्रपति ट्रंप ने एच-1बी वीजा कार्यक्रम से जुड़े नियमों में व्यापक बदलाव की घोषणा की थी। इस निर्णय के तहत एच-1बी वीजा कर्मचारियों को रखने वाले नियोक्ताओं के लिए न्यूनतम वेतन स्तर को काफी ऊँचा कर दिया गया था। इसके साथ ही कंपनियों को ऐसे कर्मचारियों को नियुक्त करने के लिए लगभग एक लाख डॉलर तक का अतिरिक्त शुल्क देना अनिवार्य कर दिया गया। ट्रंप प्रशासन का तर्क था कि इससे अमेरिकी नागरिकों के लिए रोजगार के अवसर सुरक्षित होंगे और विदेशी कर्मचारियों के कारण घरेलू श्रम बाजार पर पड़ने वाले दबाव को कम किया जा सकेगा।
हालाँकि,इस फैसले की शुरुआत से ही कई उद्योगों,शिक्षण संस्थानों और स्वास्थ्य संगठनों ने आलोचना की थी। उनका कहना था कि एच-1बी वीजा कार्यक्रम अमेरिका की अर्थव्यवस्था और तकनीकी विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और इस पर कठोर पाबंदियाँ लगाने से नवाचार और विकास की गति धीमी पड़ सकती है। इसी पृष्ठभूमि में अब बोनी वॉटसन कोलमैन ने प्रतिनिधि सभा में एक विधेयक पेश किया है,जिसका उद्देश्य ट्रंप के आदेश को निरस्त करना और एच-1बी कार्यक्रम को पहले की तरह लचीला बनाना है।
कोलमैन ने अपने बयान में कहा कि ट्रंप की घोषणा दूरदर्शिता की कमी का उदाहरण है। उनके अनुसार इस फैसले ने उन संस्थानों के लिए अनावश्यक बाधाएँ पैदा कर दी हैं,जो उच्च कौशल वाले पेशेवरों पर निर्भर रहते हैं। उन्होंने कहा कि एच-1बी वीजा कार्यक्रम घरेलू कार्यबल का विकल्प नहीं है,बल्कि यह अमेरिकी और वैश्विक प्रतिभा के बीच एक पुल का काम करता है। उनके मुताबिक यह कार्यक्रम अमेरिका की आर्थिक वृद्धि, तकनीकी नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
एच-1बी वीजा कार्यक्रम अमेरिकी नियोक्ताओं को ऐसे विदेशी पेशेवरों को नियुक्त करने की अनुमति देता है,जिनके पास विशेष कौशल और उच्च तकनीकी विशेषज्ञता होती है। यह वीजा विशेष रूप से तकनीकी,इंजीनियरिंग,स्वास्थ्य सेवा,शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले पेशेवरों के लिए दिया जाता है। इन क्षेत्रों में अक्सर कुशल कामगारों की कमी रहती है और विदेशी विशेषज्ञ इस कमी को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कोलमैन के प्रस्तावित विधेयक को कई अन्य डेमोक्रेटिक सांसदों का समर्थन भी मिला है। इस विधेयक के सह-प्रायोजकों में यवेटे डी. क्लार्क,लोइस फ्रेंकल,सेठ मौलटन और हैंक जॉनसन जैसे सांसद शामिल हैं। इन नेताओं का कहना है कि यदि ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए कड़े नियम लागू रहते हैं,तो अमेरिकी कंपनियों और संस्थानों के लिए विश्वस्तरीय प्रतिभा को आकर्षित करना बेहद कठिन हो जाएगा।
समर्थकों का यह भी तर्क है कि एच-1बी कार्यक्रम को अत्यधिक महँगा और कठोर बना देने से विशेष रूप से विश्वविद्यालयों,अस्पतालों और अनुसंधान संस्थानों को भारी नुकसान होगा। कई संस्थान सीमित बजट पर काम करते हैं और उनके लिए विदेशी विशेषज्ञों को नियुक्त करने के लिए इतनी बड़ी फीस देना संभव नहीं होगा। इससे शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर भी असर पड़ सकता है।
कोलमैन ने खास तौर पर स्वास्थ्य क्षेत्र को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि अमेरिका पहले से ही स्वास्थ्य सेवाओं में बढ़ते दबाव का सामना कर रहा है। देश में उम्रदराज होती आबादी,कोविड-19 महामारी के बाद के प्रभाव और स्वास्थ्य क्षेत्र में कर्मचारियों की कमी जैसी समस्याएँ पहले से मौजूद हैं। ऐसे समय में एच-1बी वीजा पर प्रतिबंधों को सख्त करना आने वाले वर्षों में गंभीर संकट पैदा कर सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि नर्सिंग और स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में प्रशिक्षित पेशेवरों की भारी मांग है,लेकिन ट्रंप प्रशासन की नीतियों के कारण विदेशी पेशेवरों के लिए अमेरिका में काम करना कठिन होता जा रहा है। इसके अलावा नर्सिंग डिग्री के लिए संघीय छात्र ऋण पर हालिया सीमाएँ भी इस समस्या को और गंभीर बना सकती हैं। कोलमैन का कहना है कि यदि इस स्थिति में सुधार नहीं किया गया तो भविष्य में अमेरिका को नर्सों और अन्य स्वास्थ्य कर्मियों की भारी कमी का सामना करना पड़ सकता है।
डेमोक्रेटिक सांसदों का मानना है कि उनका प्रस्तावित विधेयक इस समस्या को कम करने में मदद कर सकता है। उन्होंने इसे “वेलकमिंग इंटरनेशनल सक्सेस एक्ट” का हिस्सा बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य योग्य और कुशल पेशेवरों को अमेरिका में काम करने का अवसर देना है,ताकि देश की अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक सेवाओं को मजबूत बनाया जा सके।
एच-1बी वीजा कार्यक्रम पर होने वाली यह बहस भारत के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। अमेरिका में एच-1बी वीजा धारकों में भारतीय पेशेवरों की हिस्सेदारी सबसे अधिक है, विशेष रूप से सूचना प्रौद्योगिकी और तकनीकी क्षेत्र में। कई भारतीय इंजीनियर, सॉफ्टवेयर डेवलपर और तकनीकी विशेषज्ञ इसी वीजा के माध्यम से अमेरिका में काम करते हैं और वहाँ की कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इसी कारण भारत और अमेरिका में बसे भारतीय समुदाय के बीच एच-1बी वीजा कार्यक्रम में होने वाले हर बदलाव पर करीबी नजर रखी जाती है। यदि ट्रंप प्रशासन की सख्त नीतियाँ लागू रहती हैं,तो इसका सीधा प्रभाव भारतीय आईटी पेशेवरों और उन कंपनियों पर पड़ सकता है जो अमेरिका में काम करती हैं।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में पेश किए गए इस विधेयक को कितना समर्थन मिलता है और क्या यह ट्रंप प्रशासन के फैसले को बदलने में सफल हो पाता है। फिलहाल एच-1बी वीजा नीति को लेकर अमेरिका की राजनीति,उद्योग जगत और प्रवासी समुदाय के बीच बहस लगातार जारी है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में इस मुद्दे पर और भी तीखी राजनीतिक चर्चा देखने को मिल सकती है,क्योंकि यह न केवल अमेरिकी रोजगार बाजार बल्कि वैश्विक प्रतिभा के प्रवाह से भी सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।
