नई दिल्ली,9 अप्रैल (युआईटीवी)- मध्य पूर्व में करीब 40 दिनों तक चले तनाव और टकराव के बाद जब ईरान और अमेरिका के बीच युद्धविराम की घोषणा हुई,तो वैश्विक स्तर पर राहत की एक लहर देखने को मिली। दुनिया को उम्मीद जगी कि अब हालात सामान्य होने की दिशा में आगे बढ़ेंगे और लंबे समय से जारी अनिश्चितता खत्म होगी। लेकिन यह राहत ज्यादा देर तक कायम नहीं रह सकी,क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक नए बयान ने एक बार फिर चिंताओं को जन्म दे दिया है।
डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा है कि जो भी देश ईरान को सैन्य हथियारों की आपूर्ति करेगा,उस देश से अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले सभी सामानों पर 50 प्रतिशत तक का भारी टैरिफ लगाया जाएगा। उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि इस फैसले में किसी भी प्रकार की छूट या रियायत नहीं दी जाएगी। ट्रंप ने यह बयान अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल के जरिए जारी किया,जिसने वैश्विक व्यापार और कूटनीति दोनों क्षेत्रों में हलचल पैदा कर दी है।
ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है,जब अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के संघर्ष-विराम पर सहमति बनी है। इस युद्धविराम को लेकर पहले ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय में सकारात्मक संकेत मिल रहे थे। कई देशों ने इसे शांति की दिशा में एक बड़ा कदम बताया था। खुद ट्रंप ने भी इसे “दुनिया के लिए बड़ा दिन” करार दिया और कहा कि ईरान अब संघर्ष से थक चुका है और शांति चाहता है।
हालाँकि,टैरिफ की यह चेतावनी इस पूरे घटनाक्रम को एक नया मोड़ देती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम न केवल ईरान पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा है,बल्कि उन देशों के लिए भी संदेश है जो ईरान के साथ सैन्य या रणनीतिक संबंध बनाए हुए हैं। इससे वैश्विक व्यापार पर भी असर पड़ सकता है,क्योंकि कई देश अमेरिका के साथ अपने आर्थिक संबंधों को जोखिम में नहीं डालना चाहेंगे।
इस बीच,अमेरिकी राजनीतिक हलकों में भी इस पूरे मुद्दे को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। कुछ सांसदों और नीति निर्माताओं ने युद्धविराम को कूटनीतिक सफलता बताया है और इसे आगे बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया है। वहीं,कुछ अन्य नेताओं ने ट्रंप के बयानों को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी है और कहा है कि ऐसे कदम स्थिति को और जटिल बना सकते हैं।
अमेरिका के करीबी सहयोगी इजरायल ने भी इस युद्धविराम का समर्थन किया है। व्हाइट हाउस के एक अधिकारी के अनुसार,ट्रंप ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से बातचीत की थी,जिसके बाद ईरान के साथ युद्धविराम ढांचे को अंतिम रूप देने की दिशा में कदम बढ़ाया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि इस पूरे समझौते में इजरायल की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है।
ट्रंप ने अपने बयान में यह भी कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच कई मुद्दों पर बातचीत जारी है और 15 में से कई बिंदुओं पर पहले ही सहमति बन चुकी है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में दोनों देश टैरिफ और प्रतिबंधों में राहत जैसे मुद्दों पर मिलकर काम कर सकते हैं। यह बयान जहाँ एक ओर सहयोग की संभावना दिखाता है,वहीं दूसरी ओर टैरिफ की सख्त चेतावनी एक विरोधाभासी स्थिति पैदा करती है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी दावा किया कि ईरान में एक सफल सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और अब वहाँ यूरेनियम संवर्धन नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका ईरान के साथ मिलकर परमाणु कार्यक्रम से जुड़े अवशेषों को खत्म करने के लिए काम करेगा और इस पूरी प्रक्रिया पर सख्त सैटेलाइट निगरानी रखी जा रही है। हालाँकि,इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हो सकी है।
विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की रणनीति “कूटनीति और दबाव” के मिश्रण पर आधारित है। एक तरफ वह युद्धविराम और सहयोग की बात कर रहे हैं,वहीं दूसरी तरफ टैरिफ जैसे कड़े कदमों की चेतावनी देकर अपने विरोधियों पर दबाव बनाए रखना चाहते हैं। यह रणनीति अल्पकालिक रूप से प्रभावी हो सकती है,लेकिन दीर्घकाल में इसके परिणाम अनिश्चित हो सकते हैं।
वैश्विक स्तर पर इस घटनाक्रम का असर साफ दिखाई दे रहा है। ऊर्जा बाजार,शेयर बाजार और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार सभी इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। खासकर उन देशों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है,जो एक साथ अमेरिका और ईरान दोनों के साथ संबंध बनाए रखना चाहते हैं।
ईरान और अमेरिका के बीच युद्धविराम की घोषणा ने जहां शांति की उम्मीद जगाई थी,वहीं ट्रंप के नए टैरिफ बयान ने एक बार फिर अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या दोनों देश इस अवसर का उपयोग स्थायी समाधान की दिशा में करते हैं या फिर यह तनाव एक बार फिर नए रूप में सामने आता है।
