अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट (तस्वीर क्रेडिट@AIRNewsHindi)

ईरान पर अमेरिका के सबसे बड़े आर्थिक अभियान की तैयारी,ट्रंप की चेतावनी के बाद तेहरान ने दी तेल निर्यात रोकने की धमकी

नई द‍िल्‍ली,24 अगस्त (युआईटीवी)- अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अब सैन्य कार्रवाई से आगे बढ़कर आर्थिक मोर्चे पर भी तेज होता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने दावा किया है कि अमेरिका ने ईरान के खिलाफ अब तक के सबसे बड़े आर्थिक अभियान की तैयारी पूरी कर ली है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य ईरान के आर्थिक संसाधनों और वित्तीय रास्तों को बंद करना तथा उसकी सरकार को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक रूप से अलग-थलग करना बताया गया है। अमेरिकी प्रशासन की इस घोषणा के जवाब में ईरान ने भी बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए चेतावनी दी है कि अगर आर्थिक युद्ध जारी रहा तो वह तेल निर्यात पूरी तरह रोक सकता है।

अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट के जरिए अमेरिकी योजना की जानकारी दी। उन्होंने दावा किया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने ईरान की सैन्य क्षमताओं को काफी कमजोर किया है। बेसेंट के अनुसार,ईरान की लगभग सभी सैन्य उत्पादन सुविधाओं को नष्ट कर दिया गया है और उसके परमाणु कार्यक्रम को भी गंभीर झटका पहुँचाया गया है। उन्होंने कहा कि अब संघर्ष निर्णायक चरण में पहुँच रहा है और इसके बाद आर्थिक मोर्चे पर बड़ा अभियान शुरू होगा।

बेसेंट ने इस अभियान को आर्थिक ‘डी-डे’ बताया और दावा किया कि यह किसी दुश्मन देश के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा आर्थिक हमला होगा। उनके मुताबिक,अमेरिका का लक्ष्य ईरान की सरकार को वित्तीय रूप से मिलने वाले हर प्रमुख स्रोत और रास्ते को बंद करना है। इसके लिए अमेरिकी प्रशासन उपलब्ध कानूनी अधिकारों और सरकारी एजेंसियों की शक्तियों का इस्तेमाल करेगा।

अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी ने कहा कि ईरान लंबे समय से सुरक्षा की गारंटी के नाम पर दबाव बनाकर अपने हितों को आगे बढ़ाता रहा है। उनके अनुसार,ईरान की ताकत इस धारणा पर आधारित रही है कि वह किसी भी अमेरिकी कार्रवाई का जवाब जरूर देगा, जबकि अमेरिका के कदमों को बातचीत के जरिए प्रभावित किया जा सकता है। बेसेंट ने दावा किया कि राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में अब यह स्थिति बदल चुकी है।

उन्होंने उन देशों और पक्षों को भी चेतावनी दी,जो ईरान का विरोध करने से डरते हैं। बेसेंट ने कहा कि ऐसे लोगों को वॉशिंगटन की ताकत को कम करके नहीं आँकना चाहिए। उनका कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने ऐसी परिस्थितियाँ तैयार कर दी हैं,जिनमें सरकार की हर एजेंसी,उपलब्ध कानूनी अधिकार और वे उपाय भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं,जिन्हें पहले लागू करना मुश्किल या असंभव माना जाता था।

अमेरिकी योजना का मूल उद्देश्य ईरान की अर्थव्यवस्था को दबाव में लाना है। बेसेंट के मुताबिक,अभियान के तहत उन सभी आर्थिक रास्तों और संसाधनों को बंद करने की कोशिश की जाएगी, जो ईरानी सरकार को आर्थिक सहारा देते हैं। इसका अंतिम लक्ष्य तेहरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करना है,ताकि उसकी सरकार के लिए अपनी गतिविधियों को वित्तीय समर्थन देना मुश्किल हो जाए।

इससे पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी ईरान को समर्थन देने वाले देशों को कड़ी चेतावनी दी थी। उन्होंने बुधवार को ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक पोस्ट में कहा था कि ईरान का समर्थन करने वाले किसी भी देश के खिलाफ अब तक की सबसे कड़ी आर्थिक कार्रवाई की जाएगी। ट्रंप ने इस प्रस्तावित कार्रवाई को अभूतपूर्व स्तर का आर्थिक युद्ध और अलगाव बताया था। उन्होंने भी इसे आर्थिक ‘डी-डे’ के रूप में पेश किया।

अमेरिका की ओर से लगातार आ रहे इन बयानों के बीच ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई की धमकी दी है। ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसिन रेजाई ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए चेतावनी दी कि यदि आर्थिक युद्ध जारी रहा,तो ईरान तेल निर्यात पूरी तरह रोक सकता है। उन्होंने कहा कि एक भी बूँद तेल का निर्यात नहीं होगा, चाहे वह होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते हो या पर्शियन गल्फ के किसी अन्य हिस्से से।

ईरान की यह चेतावनी वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा परिवहन मार्गों में शामिल है। इस जलमार्ग के जरिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों का परिवहन होता है। यदि यहाँ से तेल निर्यात बाधित होता है,तो वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित हो सकती है और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

मोहसिन रेजाई ने अमेरिका को एक और कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि ईरान अपने लोगों के खिलाफ चलाए जा रहे अमेरिकी आर्थिक युद्ध में किसी भी देश की भागीदारी या समर्थन को युद्ध की कार्रवाई मानेगा। इस बयान से संकेत मिलता है कि तेहरान अमेरिकी आर्थिक दबाव का जवाब केवल राजनयिक विरोध तक सीमित नहीं रखना चाहता,बल्कि जरूरत पड़ने पर रणनीतिक और आर्थिक स्तर पर भी कठोर कदम उठाने के लिए तैयार है।

अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा तनाव का एक प्रमुख केंद्र ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी है। अमेरिकी प्रशासन लगातार आरोप लगाता रहा है कि ईरान परमाणु हथियार हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। दूसरी ओर,ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को अपने अधिकार और राष्ट्रीय हितों से जोड़ता रहा है। सैन्य कार्रवाई और परमाणु ढाँचे को लेकर बढ़ते तनाव ने दोनों देशों के बीच किसी संभावित समझौते की संभावनाओं को भी जटिल बना दिया है।

आर्थिक दबाव बढ़ाने की अमेरिकी रणनीति का असर केवल ईरान तक सीमित नहीं रह सकता। यदि ईरान के तेल निर्यात और वित्तीय गतिविधियों पर व्यापक प्रतिबंध लगाए जाते हैं,तो यूरोप और एशिया के कई देशों को भी अपनी ऊर्जा और व्यापार नीतियों में बदलाव करना पड़ सकता है। ईरान के साथ कारोबार करने वाली कंपनियों और वित्तीय संस्थानों पर भी अमेरिकी कार्रवाई का खतरा बढ़ सकता है।

दूसरी ओर,ईरान के पास होर्मुज स्ट्रेट जैसी रणनीतिक स्थिति का लाभ उठाने की क्षमता है। यही कारण है कि तेल निर्यात रोकने की उसकी धमकी को हल्के में नहीं देखा जा रहा है। यदि दोनों देशों के बीच आर्थिक टकराव और बढ़ता है तथा ईरान वास्तव में समुद्री मार्ग से ऊर्जा निर्यात को रोकने की कोशिश करता है,तो इसका असर वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है।

फिलहाल दोनों पक्षों के बयानों से स्पष्ट है कि अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। अमेरिका आर्थिक संसाधनों और वित्तीय नेटवर्क को निशाना बनाने की तैयारी कर रहा है,जबकि ईरान तेल निर्यात और समुद्री मार्गों को संभावित जवाबी हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की चेतावनी दे रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिकी आर्थिक अभियान किस स्तर तक जाता है और ईरान इसके जवाब में कितने कठोर कदम उठाता है। दोनों देशों के बीच बढ़ता यह आर्थिक टकराव यदि व्यापक हुआ तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया पर नहीं,बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।