अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (तस्वीर क्रेडिट@amethiya_anup)

ईरान से वार्ता में ‘काफी प्रगति’ का दावा,लेकिन परमाणु मुद्दे पर अड़ा अमेरिका; जेडी वेंस ने रखीं सख्त शर्तें

वॉशिंगटन/तेहरान,14 अप्रैल (युआईटीवी)- अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनावपूर्ण संबंधों के बीच हालिया उच्च स्तरीय वार्ता को लेकर अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा कि बातचीत में “काफी प्रगति” हुई है,लेकिन अभी तक कोई ठोस समझौता नहीं हो सका है। वेंस ने साफ संकेत दिया कि अमेरिका अपनी प्रमुख माँगों पर पूरी तरह अडिग है और बिना ठोस आश्वासन के आगे बढ़ने को तैयार नहीं है।

फॉक्स न्यूज को दिए एक साक्षात्कार में वेंस ने बताया कि हाल ही में पाकिस्तान में हुई उच्च स्तरीय वार्ता ने दोनों पक्षों के रुख को और स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने कहा कि इस बैठक में जहां कुछ मुद्दों पर लचीलापन देखने को मिला, वहीं अमेरिका की “रेड लाइन्स” भी साफ तौर पर सामने रखी गईं। वेंस के अनुसार,यह पहली बार था,जब अमेरिकी और ईरानी सरकारें इतने उच्च स्तर पर आमने-सामने आईं,जिससे बातचीत को एक नया आयाम मिला।

वेंस ने कहा कि वह यह नहीं कहेंगे कि वार्ता विफल रही,बल्कि कई पहलुओं पर सकारात्मक प्रगति भी हुई है। हालाँकि,उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मुख्य विवाद का मुद्दा अब भी वही है—ईरान का परमाणु कार्यक्रम। अमेरिका का स्पष्ट रुख है कि ईरान किसी भी स्थिति में परमाणु हथियार विकसित नहीं कर सकता और यही शर्त सभी वार्ताओं का आधार बनी हुई है।

अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने दो ऐसी माँगों का जिक्र किया,जिन्हें उन्होंने “गैर-समझौताकारी” बताया। पहली माँग यह है कि ईरान अपने समृद्ध यूरेनियम को देश से बाहर करे। दूसरी माँग यह है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित न करने की ठोस और निर्णायक प्रतिबद्धता दे, जिसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सत्यापन योग्य तंत्र के माध्यम से सुनिश्चित किया जा सके। वेंस ने जोर देकर कहा कि केवल मौखिक आश्वासन पर्याप्त नहीं होगा,बल्कि इसकी पुष्टि के लिए मजबूत निगरानी प्रणाली जरूरी है।

उन्होंने कहा कि ईरानी प्रतिनिधियों ने बातचीत के दौरान कुछ हद तक अमेरिका की दिशा में कदम बढ़ाए,लेकिन वह पर्याप्त नहीं थे। इसी कारण दोनों पक्षों ने बातचीत को फिलहाल रोकने और अपने-अपने देशों में लौटकर आगे की रणनीति पर विचार करने का फैसला किया। वेंस ने यह भी कहा कि अब आगे की प्रगति काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि तेहरान अमेरिकी शर्तों को स्वीकार करने के लिए कितना तैयार है।

वेंस के बयान से यह भी स्पष्ट हुआ कि अमेरिका इस वार्ता को केवल परमाणु मुद्दे तक सीमित नहीं देख रहा है,बल्कि इसे क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा से भी जोड़ रहा है। उन्होंने विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य का जिक्र किया,जो दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है। उन्होंने कहा कि अमेरिका चाहता है कि यह जलमार्ग पूरी तरह खुला रहे और जहाजों की आवाजाही में किसी प्रकार की बाधा न हो।

वेंस ने आरोप लगाया कि ईरान ने वार्ता के दौरान अपने रुख में बदलाव करते हुए “लक्ष्य बदलने” की कोशिश की। उन्होंने कहा कि हालाँकि,जहाजों की आवाजाही में कुछ सुधार हुआ है,लेकिन अभी भी स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जलडमरूमध्य को पूरी तरह से नहीं खोला गया,तो इससे वार्ता की दिशा पर गंभीर असर पड़ सकता है और यह पूरी प्रक्रिया को “मौलिक रूप से बदल” सकता है।

इस बीच,वेंस ने अमेरिकी रणनीति के सैन्य और आर्थिक पहलुओं पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने पुष्टि की कि अमेरिकी नौसैनिक अभियान केवल ईरानी झंडे वाले जहाजों तक सीमित नहीं हैं,बल्कि उन सभी जहाजों को निशाना बना रहे हैं,जो ईरानी बंदरगाहों से जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका के पास इतनी उन्नत खुफिया क्षमताएँ हैं कि वह ऐसे जहाजों की गतिविधियों पर करीबी नजर रख सकता है।

वेंस ने ईरान पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि वह वैश्विक शिपिंग को खतरे में डालकर “पूरी दुनिया के खिलाफ आर्थिक आतंकवाद” कर रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ईरान इस तरह की गतिविधियाँ जारी रखता है,तो अमेरिका भी कड़े कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में अमेरिका इस सिद्धांत पर काम करेगा कि कोई भी ईरानी जहाज अंतर्राष्ट्रीय जलक्षेत्र में स्वतंत्र रूप से नहीं चल सकेगा।

हालाँकि,इस बढ़ते तनाव के बीच वेंस ने यह भी कहा कि एक व्यापक समझौते की संभावना अभी खत्म नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चाहते हैं कि ईरान एक सामान्य देश की तरह व्यवहार करे और उसके नागरिक समृद्धि हासिल कर सकें। इसके लिए जरूरी है कि ईरान परमाणु हथियारों और आतंकवाद से दूरी बनाए।

वेंस ने यह भी स्वीकार किया कि ईरानी प्रतिनिधियों को किसी भी समझौते से पहले तेहरान में अपने वरिष्ठ नेतृत्व से मंजूरी लेनी होगी। उन्होंने कहा कि यह एक जटिल प्रक्रिया है और इसमें समय लग सकता है,लेकिन यदि ईरान सकारात्मक रुख अपनाता है,तो आगे बढ़ने की संभावना बनी रह सकती है।

अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने यह भी दावा किया कि इस समय अमेरिका की स्थिति मजबूत है। उन्होंने “सैन्य बढ़त” और “आर्थिक नाकाबंदी” का जिक्र करते हुए कहा कि अमेरिका के पास कई ऐसे विकल्प हैं,जिनके जरिए वह ईरान पर दबाव बना सकता है। उन्होंने कहा, “हमारे पास बहुत सारे पत्ते हैं, हमारे पास बढ़त है,” जो यह दर्शाता है कि अमेरिका बातचीत में खुद को मजबूत स्थिति में मानता है।

इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि अमेरिका और ईरान के बीच रिश्ते अभी भी बेहद संवेदनशील और जटिल बने हुए हैं। जहाँ एक ओर बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश जारी है,वहीं दूसरी ओर दोनों पक्ष अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े हुए हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या दोनों देश किसी साझा रास्ते पर पहुँच पाते हैं या फिर यह गतिरोध और गहरा होता है।

फिलहाल,जेडी वेंस के बयान ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिका किसी भी कीमत पर अपनी सुरक्षा और वैश्विक स्थिरता से समझौता करने को तैयार नहीं है। वहीं ईरान के रुख पर भी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं,क्योंकि इस वार्ता का असर केवल इन दो देशों तक सीमित नहीं,बल्कि पूरे अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य पर पड़ सकता है।