नई दिल्ली,16 अप्रैल (युआईटीवी)- पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच भारत में महँगाई को लेकर चिंताएँ एक बार फिर बढ़ने लगी हैं। खुदरा महँगाई के बाद अब थोक महँगाई दर में भी लगातार इजाफा दर्ज किया गया है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी ताजा आँकड़ों के मुताबिक,मार्च महीने में थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) आधारित महँगाई दर बढ़कर 3.88 प्रतिशत पर पहुँच गई है। यह लगातार पाँचवां महीना है,जब थोक महँगाई में वृद्धि दर्ज की गई है।
इससे पहले फरवरी में थोक महँगाई दर 2.13 प्रतिशत थी,जबकि मार्च 2025 में यह 2.25 प्रतिशत दर्ज की गई थी। इस तरह एक साल के भीतर महँगाई में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा रही है। मंत्रालय के अनुसार,इस बढ़ोतरी के पीछे मुख्य कारण ईंधन,बिजली और विनिर्मित वस्तुओं की कीमतों में आई तेजी है,जिसने थोक स्तर पर लागत को बढ़ा दिया है।
विशेष रूप से कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में तेज उछाल ने महँगाई को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। आँकड़ों के मुताबिक,कच्चे तेल की मुद्रास्फीति मार्च में बढ़कर 51.57 प्रतिशत तक पहुँच गई,जबकि फरवरी में इसमें 1.29 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी। यह अचानक आया उछाल वैश्विक बाजार में अस्थिरता और आपूर्ति संबंधी चिंताओं का परिणाम माना जा रहा है।
ईंधन और बिजली श्रेणी में भी उल्लेखनीय बदलाव देखा गया है। फरवरी में जहाँ इस श्रेणी में 3.78 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी,वहीं मार्च में यह बढ़कर 1.05 प्रतिशत पर पहुँच गई। इससे यह संकेत मिलता है कि ऊर्जा क्षेत्र में लागत बढ़ने लगी है,जिसका असर अन्य क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है।
विनिर्मित उत्पादों की महँगाई दर में भी वृद्धि दर्ज की गई है। फरवरी में यह 2.92 प्रतिशत थी,जो मार्च में बढ़कर 3.39 प्रतिशत हो गई। इसका मतलब है कि उत्पादन लागत में वृद्धि हो रही है,जो आगे चलकर उपभोक्ताओं तक पहुँच सकती है। खास तौर पर बेसिक मेटल, गैर-खाद्य वस्तुएँ और अन्य विनिर्माण उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी ने इस प्रवृत्ति को मजबूत किया है।
हालाँकि, खाद्य वस्तुओं के मामले में थोड़ी राहत देखने को मिली है। मार्च में खाद्य महँगाई दर घटकर 1.90 प्रतिशत रह गई,जो फरवरी में 2.19 प्रतिशत थी। सब्जियों की कीमतों में भी कमी आई है,जहाँ महँगाई दर 4.73 प्रतिशत से घटकर 1.45 प्रतिशत पर आ गई। यह गिरावट उपभोक्ताओं के लिए कुछ हद तक राहत लेकर आई है,लेकिन कुल मिलाकर महँगाई का दबाव बना हुआ है।
इससे पहले उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित खुदरा महँगाई दर भी मार्च में बढ़कर 3.4 प्रतिशत हो गई थी,जो फरवरी में 3.21 प्रतिशत थी। खुदरा महँगाई में यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि थोक स्तर पर बढ़ रही लागत धीरे-धीरे उपभोक्ताओं तक पहुँच रही है।
महँगाई के इन आँकड़ों के बीच भारतीय रिजर्व बैंक की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। आरबीआई ने इस महीने की शुरुआत में अपनी पहली द्वैमासिक मौद्रिक नीति की घोषणा करते हुए ब्याज दरों को यथावत रखा था। केंद्रीय बैंक मुख्य रूप से खुदरा महँगाई को ध्यान में रखते हुए नीतिगत दरों का निर्धारण करता है,लेकिन थोक महँगाई में लगातार वृद्धि भविष्य में उसकी रणनीति को प्रभावित कर सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ऊर्जा कीमतों में यह तेजी जारी रहती है,तो इसका असर आने वाले महीनों में और स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकता है। खासकर पश्चिम एशिया में जारी संकट के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति और कीमतों में अस्थिरता बनी हुई है,जो भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए चिंता का विषय है।
थोक महँगाई में लगातार पाँचवें महीने आई यह वृद्धि अर्थव्यवस्था के लिए एक चेतावनी संकेत के रूप में देखी जा रही है। हालाँकि,खाद्य वस्तुओं में कुछ राहत मिली है,लेकिन ऊर्जा और विनिर्माण क्षेत्र में बढ़ती लागत आने वाले समय में महँगाई के दबाव को और बढ़ा सकती है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और आरबीआई इस स्थिति से निपटने के लिए क्या कदम उठाते हैं और क्या आने वाले महीनों में महँगाई पर काबू पाया जा सकेगा।
