वॉशिंगटन,2 मई (युआईटीवी)- अमेरिका की राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था के केंद्र में एक बार फिर डोनाल्ड ट्रंप आ गए हैं। शुक्रवार को उन्होंने एक अहम घोषणा करते हुए यूरोपीय संघ से आने वाली कारों और ट्रकों पर टैरिफ बढ़ाकर 25 प्रतिशत करने का फैसला किया। इस निर्णय को न केवल वैश्विक व्यापार के नजरिए से महत्वपूर्ण माना जा रहा है,बल्कि इससे अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच व्यापारिक तनाव भी बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
ट्रंप ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह कदम इसलिए उठाया गया है,क्योंकि यूरोपीय संघ मौजूदा व्यापार समझौते का पालन नहीं कर रहा था। उन्होंने पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि अमेरिका अब अपने हितों से समझौता नहीं करेगा और जो देश नियमों का पालन नहीं करेंगे, उनके खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएँगे। ट्रंप के इस बयान को उनकी पुरानी “अमेरिका फर्स्ट” नीति की निरंतरता के रूप में देखा जा रहा है,जिसमें वह घरेलू उद्योगों को प्राथमिकता देते रहे हैं।
टैरिफ बढ़ाने के इस फैसले का असर ऑटोमोबाइल सेक्टर पर सबसे अधिक पड़ने वाला है। यूरोप से अमेरिका में आयात होने वाली कारों और ट्रकों की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है,जिससे अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा का स्वरूप बदल जाएगा। ट्रंप का मानना है कि इससे विदेशी कंपनियों पर दबाव पड़ेगा कि वे अपने उत्पादन केंद्र अमेरिका में स्थापित करें। उन्होंने दावा किया कि इस नीति के चलते अमेरिका को अरबों डॉलर का राजस्व मिलेगा और घरेलू उद्योगों को मजबूती मिलेगी।
ट्रंप ने अपने बयान में यह भी कहा कि वर्तमान समय में अमेरिका में 100 अरब डॉलर से अधिक के ऑटोमोबाइल प्लांट निर्माणाधीन हैं,जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। उन्होंने इस उपलब्धि का श्रेय अपनी आर्थिक नीतियों को देते हुए कहा कि जापान,दक्षिण कोरिया,कनाडा और मेक्सिको जैसे देशों से भारी निवेश अमेरिका में आ रहा है। यह निवेश न केवल उद्योगों को बढ़ावा देगा,बल्कि रोजगार के अवसर भी बढ़ाएगा।
हालाँकि,विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के टैरिफ युद्ध से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। यूरोपीय संघ भी जवाबी कार्रवाई कर सकता है,जिससे व्यापारिक संबंध और अधिक तनावपूर्ण हो सकते हैं। इससे अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ने की आशंका है।
ट्रंप ने इस दौरान ईरान के साथ चल रही बातचीत पर भी अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि बातचीत जारी है, लेकिन अभी तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है। ट्रंप के अनुसार,ईरान समझौता करना चाहता है, लेकिन उसका नेतृत्व बिखरा हुआ है,जिससे निर्णय लेने में कठिनाई हो रही है। उन्होंने ईरानी नेतृत्व को असंगठित बताते हुए कहा कि वहाँ की सरकार प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पा रही है।
ट्रंप ने यह भी दावा किया कि ईरान की सैन्य क्षमता काफी कमजोर हो चुकी है। उन्होंने कहा कि ईरान के पास न तो प्रभावी नौसेना है और न ही वायुसेना,जिससे उसकी ताकत पहले की तुलना में कम हो गई है। हालाँकि,इस दावे को लेकर अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों के बीच मतभेद हैं,क्योंकि ईरान क्षेत्रीय राजनीति में अभी भी एक महत्वपूर्ण शक्ति माना जाता है।
इसके बावजूद ट्रंप ने यह साफ किया कि वह सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देते हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका के पास विकल्प है कि वह ईरान पर हमला कर उसे पूरी तरह समाप्त कर दे,लेकिन वह इंसानियत के आधार पर ऐसा नहीं करना चाहते। उनका मानना है कि बातचीत और समझौते के जरिए ही स्थायी समाधान संभव है।
ट्रंप ने सैन्य कार्रवाई के लिए कांग्रेस की मंजूरी न लेने के अपने फैसले का भी बचाव किया। उन्होंने कहा कि इतिहास में कई बार ऐसे फैसले बिना औपचारिक मंजूरी के लिए गए हैं और इसे पूरी तरह असंवैधानिक नहीं माना जा सकता। इस बयान से अमेरिकी राजनीति में एक नई बहस छिड़ सकती है,क्योंकि संविधान के तहत युद्ध जैसे बड़े फैसलों में कांग्रेस की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
घरेलू मुद्दों पर बात करते हुए ट्रंप ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत बताया। उन्होंने कहा कि शेयर बाजार रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच चुका है और रोजगार के अवसर भी ऐतिहासिक स्तर पर हैं। उनके अनुसार,आज जितने लोग अमेरिका में काम कर रहे हैं,उतने पहले कभी नहीं थे। यह उनकी आर्थिक नीतियों की सफलता का प्रमाण है।
हालाँकि,उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ईंधन की कीमतें अभी ऊँची बनी हुई हैं,लेकिन उनका मानना है कि वैश्विक तनाव कम होते ही इन कीमतों में गिरावट आएगी। ट्रंप ने कहा कि मौजूदा समय में कई प्रमुख समुद्री मार्गों से तेल का परिवहन बाधित है,जिससे कीमतों पर असर पड़ रहा है। जैसे ही स्थिति सामान्य होगी, पेट्रोल की कीमतें स्वतः कम हो जाएँगी।
ट्रंप ने अपनी “अमेरिका फर्स्ट” नीति को एक बार फिर दोहराते हुए कहा कि उनका उद्देश्य देश के हितों को सर्वोपरि रखना है। उन्होंने स्पिरिट एयरलाइंस को संभावित मदद के सवाल पर कहा कि सरकार नौकरियों को बचाने के लिए तैयार है,लेकिन यह तभी संभव होगा जब सौदा अमेरिका के हित में हो।
विदेश नीति के संदर्भ में ट्रंप ने पाकिस्तान को लेकर सकारात्मक रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि उन्हें पाकिस्तान के लिए बहुत सम्मान है और वहाँ का नेतृत्व क्षेत्रीय मुद्दों पर अमेरिका के साथ सहयोग कर रहा है। यह बयान दक्षिण एशिया की राजनीति में महत्वपूर्ण माना जा रहा है,क्योंकि इससे दोनों देशों के संबंधों में सुधार की संभावना नजर आती है।
इसके अलावा ट्रंप ने चीन की अपनी आगामी यात्रा की भी पुष्टि की और इसे एक “शानदार कार्यक्रम” बताया। उन्होंने कहा कि यह यात्रा दोनों देशों के बीच संबंधों को और मजबूत करेगी। साथ ही उन्होंने यह भी जानकारी दी कि लेबनान और इजरायल के नेता जल्द ही व्हाइट हाउस आने वाले हैं,जिससे मध्य पूर्व की राजनीति में नई हलचल देखने को मिल सकती है।
ट्रंप के इन बयानों और फैसलों से यह साफ है कि वह एक बार फिर आक्रामक और निर्णायक नेतृत्व की छवि प्रस्तुत कर रहे हैं। चाहे वह व्यापार नीति हो,विदेश नीति या घरेलू अर्थव्यवस्था,हर क्षेत्र में उनका फोकस अमेरिका के हितों को प्राथमिकता देना है। आने वाले समय में इन फैसलों का वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ता है,यह देखना बेहद दिलचस्प होगा।
