नई दिल्ली,9 मई (युआईटीवी)- सैयद अब्बास अराघची ने अमेरिका की सैन्य नीतियों पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि जब भी कूटनीति और बातचीत की संभावना बनती है,वॉशिंगटन सैन्य कार्रवाई का रास्ता चुन लेता है। ईरानी विदेश मंत्री ने कहा कि अमेरिका की यह रणनीति केवल दबाव बनाने की कोशिश नहीं,बल्कि ऐसी नीति का हिस्सा है, जो क्षेत्र में तनाव और अस्थिरता को लगातार बढ़ाती है। उन्होंने यह भी दावा किया कि तमाम सैन्य हमलों और दबाव के बावजूद ईरान की मिसाइल क्षमता पहले की तुलना में और मजबूत हुई है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर किए गए एक विस्तृत पोस्ट में अराघची ने अमेरिका की नीतियों को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने लिखा कि जब भी कूटनीतिक समाधान का रास्ता खुलता है,अमेरिका एक जोखिम भरा सैन्य अभियान शुरू कर देता है। ईरानी विदेश मंत्री ने पूछा कि क्या यह दबाव बनाने की एक क्रूर रणनीति है या फिर किसी ऐसी साजिश का हिस्सा,जो अमेरिकी राष्ट्रपति को एक बार फिर क्षेत्रीय संघर्षों के दलदल में धकेल देती है। उन्होंने कहा कि कारण चाहे जो भी हों, उसका परिणाम हमेशा एक जैसा होता है,क्योंकि ईरानी लोग कभी दबाव के आगे नहीं झुकते और अंततः कूटनीति ही इसकी सबसे बड़ी शिकार बनती है।
अराघची का यह बयान ऐसे समय में आया है,जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है। परमाणु कार्यक्रम,क्षेत्रीय सुरक्षा,सैन्य गतिविधियों और प्रतिबंधों को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से टकराव बना हुआ है। हाल के दिनों में पश्चिम एशिया में बढ़ी सैन्य गतिविधियों और समुद्री मार्गों पर तनाव ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है।
ईरानी विदेश मंत्री ने अपने बयान में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के आकलन को भी चुनौती दी। उन्होंने दावा किया कि ईरान की मिसाइल क्षमता को लेकर अमेरिकी एजेंसियों द्वारा पेश की जा रही जानकारी वास्तविकता से मेल नहीं खाती। अराघची ने कहा कि 28 फरवरी की तुलना में ईरान के मिसाइल भंडार और लॉन्चर क्षमता में कमी नहीं आई है, बल्कि यह 75 प्रतिशत नहीं बल्कि 120 प्रतिशत तक मजबूत हुई है। उन्होंने कहा कि ईरान ने अपनी सैन्य तैयारियों को लगातार बेहतर बनाया है और देश की रक्षा क्षमता पहले से अधिक प्रभावी है।
अपनी बात को मजबूत करने के लिए अराघची ने अमेरिकी इंटेलिजेंस कम्युनिटी से जुड़ी एक रिपोर्ट का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार,अमेरिकी विश्लेषण में यह माना गया है कि हफ्तों तक चली अमेरिका और इजरायल की बमबारी के बावजूद तेहरान के पास अभी भी बड़ी मात्रा में बैलिस्टिक मिसाइलें और लॉन्चर मौजूद हैं। रिपोर्ट के हवाले से उन्होंने कहा कि ईरान ने अपने अधिकतर भूमिगत भंडारण केंद्रों को दोबारा सक्रिय कर लिया है और कई क्षतिग्रस्त मिसाइलों की मरम्मत भी कर ली गई है।
रिपोर्ट में एक अमेरिकी अधिकारी के हवाले से कहा गया कि ईरान के पास युद्ध से पहले मौजूद मोबाइल लॉन्चरों का लगभग 75 प्रतिशत और मिसाइलों का लगभग 70 प्रतिशत भंडार अब भी सुरक्षित है। अधिकारी ने यह भी स्वीकार किया कि ईरान ने कुछ नई मिसाइलों को अपने सैन्य ढाँचे में शामिल करने में सफलता हासिल की है। बताया गया कि ये मिसाइलें युद्ध शुरू होने के समय लगभग तैयार अवस्था में थीं और अब उन्हें सक्रिय कर दिया गया है।
ईरानी विदेश मंत्री के बयान के साथ ही क्षेत्रीय तनाव को लेकर नई चिंताएँ भी सामने आई हैं। शुक्रवार को ईरान की मुख्य सैन्य कमान खातम अल-अनबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर्स ने आरोप लगाया कि अमेरिकी सेना ने होर्मुज जलडमरूमध्य के पास दो ईरानी जहाजों को निशाना बनाया। ईरान का दावा है कि इन हमलों में कुछ क्षेत्रीय देशों का भी सहयोग लिया गया और दक्षिणी ईरान के नागरिक इलाकों पर हवाई हमले किए गए।
ईरानी मीडिया के अनुसार,मुख्यालय के प्रवक्ता इब्राहिम जोल्फागरी ने अमेरिकी कार्रवाई को आक्रामक बताते हुए कहा कि यह ईरान और अमेरिका के बीच पहले से लागू युद्धविराम समझौते का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि अमेरिका की यह कार्रवाई क्षेत्र में तनाव को और बढ़ाने वाली है तथा इससे शांति प्रयासों को नुकसान पहुँचेगा।
जोल्फागरी के मुताबिक जिन जहाजों को निशाना बनाया गया उनमें एक तेल टैंकर शामिल था,जो जस्क के पास ईरानी समुद्री सीमा से होर्मुज जलडमरूमध्य की ओर जा रहा था। दूसरा जहाज संयुक्त अरब अमीरात के फुजैराह क्षेत्र के पास इस रणनीतिक जलमार्ग में प्रवेश कर रहा था। ईरान का कहना है कि दोनों जहाज सामान्य समुद्री गतिविधियों में लगे हुए थे और उन पर हमला अंतर्राष्ट्रीय समुद्री नियमों का उल्लंघन है।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में गिना जाता है,जहाँ से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और वैश्विक व्यापार पर सीधा असर डाल सकता है। यही वजह है कि यहां बढ़ती गतिविधियों पर दुनिया भर की नजर बनी रहती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ती बयानबाजी आने वाले समय में क्षेत्रीय हालात को और जटिल बना सकती है। जहाँ एक ओर अमेरिका ईरान की सैन्य गतिविधियों और परमाणु कार्यक्रम को लेकर दबाव बनाए हुए है,वहीं ईरान लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि वह किसी भी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है।
अराघची के हालिया बयान को इसी रणनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान बातचीत और कूटनीति का समर्थन करता है,लेकिन यदि उस पर सैन्य दबाव बनाया गया तो वह अपनी रक्षा क्षमता को और मजबूत करने से पीछे नहीं हटेगा। ऐसे में पश्चिम एशिया की स्थिति आने वाले दिनों में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का एक बड़ा केंद्र बनी रह सकती है।
