नई दिल्ली,15 मई (युआईटीवी)- देशभर में शुक्रवार से पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की नई कीमतें लागू हो गई हैं,जिससे आम लोगों की जेब पर अतिरिक्त बोझ बढ़ने वाला है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी और मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच सरकारी तेल कंपनियों ने ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का फैसला लिया है। राजधानी नई दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 3.14 रुपये प्रति लीटर बढ़ाकर 97.77 रुपये कर दी गई है,जबकि डीजल 3.11 रुपये महँगा होकर 90.67 रुपये प्रति लीटर पहुँच गया है। इसके साथ ही सीएनजी की कीमतों में भी 2 रुपये प्रति किलोग्राम की वृद्धि की गई है,जिसके बाद दिल्ली में सीएनजी की नई कीमत 79.09 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई है।
ईंधन की कीमतों में यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है,जब देश पहले से ही महँगाई के दबाव का सामना कर रहा है। पेट्रोल और डीजल के महंगे होने का असर केवल वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहता,बल्कि इसका सीधा प्रभाव परिवहन लागत,खाद्य पदार्थों की कीमतों और रोजमर्रा की वस्तुओं पर भी पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में माल ढुलाई महँगी होने से बाजार में कई आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं।
सरकारी तेल कंपनियों का कहना है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित होने से उन्हें भारी वित्तीय दबाव का सामना करना पड़ रहा है। इंडियन ऑयल,भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने स्पष्ट किया है कि लंबे समय से खुदरा कीमतों को स्थिर बनाए रखने की कोशिश की जा रही थी,लेकिन लगातार बढ़ती लागत के कारण अब कीमतों में संशोधन करना जरूरी हो गया था।
केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी पहले ही संकेत दे चुके थे कि तेल कंपनियों को प्रतिदिन 1000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान उठाना पड़ रहा है। उनका कहना था कि यदि खुदरा स्तर पर कीमतें नहीं बढ़ाई गईं तो तेल कंपनियों का घाटा एक तिमाही में 1 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक हो सकता है। सरकार और तेल कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती वैश्विक कीमतों और घरेलू उपभोक्ताओं के हितों के बीच संतुलन बनाए रखने की है।
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के आँकड़ों के अनुसार भारतीय बास्केट में कच्चे तेल की औसत कीमत पिछले तीन महीनों से लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी हुई है। अप्रैल 2026 में यह औसत 114 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गया था,जबकि मई में भी इसकी कीमत करीब 104 डॉलर प्रति बैरल दर्ज की गई। विशेषज्ञों का कहना है कि मध्य पूर्व में जारी संकट के कारण वैश्विक बाजार में आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है,जिससे कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का दौर जारी है।
मध्य पूर्व क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक क्षेत्रों में से एक माना जाता है। वहाँ बढ़ते तनाव और संभावित आपूर्ति बाधाओं की वजह से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में निवेशकों और तेल कंपनियों के बीच चिंता का माहौल है। इसी का असर भारतीय बाजार पर भी दिखाई दे रहा है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है,इसलिए अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में किसी भी बदलाव का सीधा असर घरेलू ईंधन दरों पर पड़ता है।
सीएनजी की कीमतों में बढ़ोतरी ने भी आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। पिछले कुछ वर्षों में पेट्रोल और डीजल की तुलना में सस्ता विकल्प होने के कारण बड़ी संख्या में लोग सीएनजी वाहनों की ओर बढ़े थे,लेकिन अब सीएनजी के दाम बढ़ने से ऑटो,टैक्सी और सार्वजनिक परिवहन से जुड़े लोगों की लागत भी बढ़ जाएगी। माना जा रहा है कि आने वाले समय में किराए में भी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से ईंधन के विवेकपूर्ण उपयोग की अपील की थी। उन्होंने विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव को देखते हुए लोगों से गैर-जरूरी विदेश यात्राएँ टालने,सोने की खरीद में सावधानी बरतने और ऊर्जा की बचत करने जैसे कदम अपनाने का आग्रह किया था। सरकार का मानना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के इस दौर में संसाधनों का संतुलित उपयोग बेहद जरूरी है।
ईंधन संकट के साथ-साथ रुपये में गिरावट ने भी चिंता बढ़ा दी है। हाल के दिनों में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95 रुपये प्रति डॉलर के स्तर को पार कर गया है। रुपये के कमजोर होने से तेल आयात और महँगा हो जाता है,क्योंकि भारत को कच्चे तेल का भुगतान डॉलर में करना पड़ता है। इससे तेल कंपनियों की लागत और बढ़ जाती है,जिसका असर अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो आने वाले समय में ईंधन की कीमतों में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकते हैं। पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में केवल कच्चे तेल की लागत ही शामिल नहीं होती,बल्कि इसमें एक्साइज ड्यूटी, राज्य सरकारों का वैट,डीलर कमीशन और अन्य शुल्क भी जोड़े जाते हैं। यही कारण है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में थोड़ी बढ़ोतरी भी घरेलू कीमतों पर बड़ा असर डालती है।
ईंधन की कीमतों में वृद्धि का असर सबसे ज्यादा मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग पर पड़ता है। रोजाना वाहन इस्तेमाल करने वाले लोग पहले ही बढ़ती महँगाई से परेशान हैं और अब पेट्रोल-डीजल के महँगे होने से उनका मासिक बजट और प्रभावित होगा। वहीं परिवहन लागत बढ़ने से फल,सब्जियाँ,दूध और अन्य जरूरी सामान भी महँगे हो सकते हैं।
आर्थिक जानकारों का कहना है कि सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह आम लोगों को राहत देने और तेल कंपनियों के घाटे को नियंत्रित करने के बीच संतुलन बनाए। फिलहाल वैश्विक परिस्थितियाँ तेजी से बदल रही हैं और ऐसे में तेल बाजार में स्थिरता लौटने में समय लग सकता है। तब तक देशवासियों को महँगे ईंधन और बढ़ती महँगाई का असर झेलना पड़ सकता है।
