वाशिंगटन,16 मई (युआईटीवी)- डोनाल्ड ट्रंप का तीन दिवसीय चीन दौरा खत्म हो चुका है,लेकिन इस हाई-प्रोफाइल यात्रा के बाद दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी है कि आखिर अमेरिका और चीन के बीच संबंधों में क्या वास्तव में कोई बड़ा बदलाव आया है। ट्रंप की शी जिनपिंग के साथ हुई मुलाकात को दोनों देशों के बीच संवाद बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है,लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इस समिट से कोई ठोस रणनीतिक उपलब्धि हासिल नहीं हुई। व्यापार,ताइवान,तकनीक,आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रेयर अर्थ मिनरल्स और सैन्य प्रतिस्पर्धा जैसे मुद्दों पर मतभेद पहले की तरह कायम हैं।
काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के चीन विशेषज्ञों का मानना है कि यह समिट ज्यादा प्रतीकात्मक रही। इसका मकसद यह दिखाना था कि दोनों वैश्विक शक्तियाँ एक-दूसरे से संवाद बनाए रखना चाहती हैं,ताकि दुनिया को यह संदेश दिया जा सके कि तनाव के बावजूद बातचीत के रास्ते खुले हुए हैं। हालाँकि,जिन मुद्दों पर दुनिया किसी बड़े समझौते की उम्मीद कर रही थी,उन पर कोई निर्णायक प्रगति सामने नहीं आई।
सीएफआर के एशिया स्टडीज के वरिष्ठ फेलो और चाइना स्ट्रैटेजी इनिशिएटिव के निदेशक रश दोशी ने मीडिया ब्रीफिंग में कहा कि यह समिट वास्तविक नीतिगत बदलावों से ज्यादा राजनीतिक संकेतों पर आधारित थी। उनके अनुसार चीन का उद्देश्य फिलहाल अमेरिका के साथ टकराव को सीमित रखते हुए रणनीतिक स्थिरता हासिल करना है। उन्होंने कहा कि बीजिंग अपने आर्थिक और तकनीकी लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए समय खरीदना चाहता है और इस समिट से उसे कुछ हद तक वह स्थिरता मिलती दिखाई दे रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार पिछले साल अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध को रोकने के बाद दोनों देशों के संबंधों में थोड़ी नरमी जरूर आई थी,लेकिन वह केवल अस्थायी रही। अब भी दोनों देशों के बीच अविश्वास काफी गहरा है। खासकर ताइवान और हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लेकर दोनों देशों की रणनीतियाँ पूरी तरह अलग दिखाई देती हैं।
समिट में सबसे अधिक चर्चा ताइवान को लेकर हुई। चीन लंबे समय से ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और उसकी स्वतंत्रता की किसी भी कोशिश का विरोध करता रहा है। वहीं अमेरिका ताइवान को सैन्य और रणनीतिक समर्थन देता आया है। इसी वजह से यह मुद्दा अमेरिका-चीन संबंधों का सबसे संवेदनशील विषय बना हुआ है।
सीएफआर के एशिया स्टडीज फेलो डेविड सैक्स ने कहा कि समिट से पहले बीजिंग ने वाशिंगटन पर ताइवान नीति को लेकर दबाव बनाया था। चीन चाहता है कि अमेरिका अपनी पुरानी नीति में बदलाव करे और ताइवान को मिलने वाले समर्थन को सीमित करे। हालाँकि,अमेरिका की ओर से इस दिशा में कोई स्पष्ट प्रतिबद्धता सामने नहीं आई।
सैक्स के अनुसार,ताइवान ने इस समिट को “नुकसान नियंत्रण” की रणनीति के तौर पर देखा। उन्हें आशंका थी कि कहीं अमेरिका और चीन के बीच कोई ऐसा समझौता न हो जाए, जिससे ताइवान की सुरक्षा प्रभावित हो। इसी बीच ट्रंप के एक बयान ने नई बहस शुरू कर दी। एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा था कि वह ताइवान के राष्ट्रपति विलियम लाई से हथियारों की बिक्री को लेकर बात कर सकते हैं। इस बयान ने चीन की चिंता और बढ़ा दी।
विशेषज्ञों ने याद दिलाया कि 1979 में अमेरिका द्वारा चीन के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित करने के बाद किसी मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति ने ताइवान के राष्ट्रपति से सीधे बातचीत नहीं की। ऐसे में ट्रंप का बयान चीन के लिए संवेदनशील माना जा रहा है।
समिट का दूसरा बड़ा मुद्दा तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस रहा। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका ने चीन पर कई तकनीकी प्रतिबंध लगाए हैं,खासकर एडवांस्ड एआई चिप्स और सेमीकंडक्टर तकनीक को लेकर। अमेरिका को डर है कि चीन इन तकनीकों का इस्तेमाल सैन्य और रणनीतिक ताकत बढ़ाने के लिए कर सकता है।
सीएफआर के उभरती तकनीक विशेषज्ञ क्रिस मैकगायर ने कहा कि अगर अमेरिका चीन को एडवांस्ड एआई चिप्स की बिक्री की अनुमति देता है,तो इससे चीन की कंप्यूटिंग क्षमता कई गुना बढ़ सकती है। उनके मुताबिक इससे चीन की एआई क्षमता लगभग तीन गुना तक मजबूत हो सकती है। उन्होंने कहा कि चीन भले ही घरेलू तकनीकी विकल्प विकसित करने की कोशिश कर रहा हो,लेकिन उसकी कंपनियाँ अब भी अमेरिकी चिप्स और तकनीक पर काफी निर्भर हैं।
तकनीक के अलावा रेयर अर्थ मिनरल्स का मुद्दा भी समिट के केंद्र में रहा। रेयर अर्थ्स वे महत्वपूर्ण खनिज हैं जिनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक गाड़ियों,सेमीकंडक्टर्स,रक्षा उपकरणों और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों में होता है। इस क्षेत्र में चीन का दबदबा काफी मजबूत है।
सीएफआर की जियोइकोनॉमिक स्टडीज विशेषज्ञ हेइडी क्रेबो-रेडिकर ने कहा कि पिछले साल चीन द्वारा रेयर अर्थ्स और मैग्नेट्स के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों ने अमेरिका और यूरोप की औद्योगिक कमजोरियों को उजागर कर दिया। उन्होंने कहा कि चीन के पास इस समय वैश्विक एडवांस्ड इंडस्ट्रियल इकॉनमीज़ पर दबाव बनाने की क्षमता है।
उनके अनुसार अमेरिका अब भी रक्षा प्रणाली,इलेक्ट्रिक वाहनों और सेमीकंडक्टर निर्माण के लिए चीन नियंत्रित सप्लाई चेन पर बहुत ज्यादा निर्भर है। उन्होंने चेतावनी दी कि अमेरिका और उसके सहयोगियों को वैकल्पिक सप्लाई चेन विकसित करने में अभी कई साल लग सकते हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चीन कीमतों पर दबाव डालकर दूसरे देशों में विकसित हो रही वैकल्पिक रेयर अर्थ सप्लाई चेन को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है।
आर्थिक मोर्चे पर भी विशेषज्ञों ने समिट को सीमित सफलता वाला माना। सीएफआर फेलो जोंगयुआन जोई लियू ने कहा कि इस बैठक ने फिलहाल तनाव बढ़ने के खतरे को जरूर कम किया,लेकिन दोनों देशों के बीच मौजूद संरचनात्मक आर्थिक विवादों का कोई समाधान नहीं निकला।
उन्होंने कहा कि संबंध फिलहाल स्थिर जरूर हुए हैं,लेकिन समस्याओं का समाधान नहीं हुआ है। व्यापार असंतुलन,तकनीकी प्रतिबंध,टैरिफ और बाजार पहुँच जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच अभी भी गहरे मतभेद बने हुए हैं।
लियू ने चीन द्वारा अमेरिकी सामान खरीदने के कथित वादों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पहले भी व्यापार समझौतों में चीन ने बड़े आर्थिक वादे किए थे,लेकिन वे पूरी तरह लागू नहीं हुए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पहले चरण के व्यापार समझौते के दौरान चीन द्वारा किए गए 200 बिलियन डॉलर के खरीद लक्ष्य पूरे नहीं हो सके थे।
ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात ऐसे समय में हुई है,जब वैश्विक स्तर पर अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सैन्य गतिविधियाँ तेज हो रही हैं,जबकि व्यापार और तकनीक के क्षेत्र में दोनों देश एक-दूसरे को चुनौती देने में लगे हैं।
अमेरिका जहाँ अपने सहयोगियों के साथ मिलकर चीन के बढ़ते प्रभाव को सीमित करने की कोशिश कर रहा है,वहीं चीन भी वैश्विक सप्लाई चेन,व्यापार नेटवर्क और तकनीकी विकास में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा केवल व्यापार तक सीमित नहीं रह गई है,बल्कि यह रणनीतिक और सैन्य रूप भी ले चुकी है।
विश्लेषकों का कहना है कि इस समिट से यह जरूर स्पष्ट हुआ कि दोनों देश फिलहाल सीधे टकराव से बचना चाहते हैं,लेकिन साथ ही यह भी साफ हो गया कि उनके बीच मौजूद मूलभूत मतभेद इतने गहरे हैं कि केवल शिखर बैठकें उन्हें खत्म नहीं कर सकतीं।
समिट के दौरान कई सकारात्मक तस्वीरें और बयान सामने आए,लेकिन वास्तविकता यह है कि अमेरिका और चीन के बीच अविश्वास अब भी बरकरार है। ताइवान,तकनीक,एआई, रेयर अर्थ्स और सैन्य प्रभाव जैसे मुद्दे आने वाले वर्षों में दोनों देशों के संबंधों की दिशा तय करेंगे।
दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच यह प्रतिस्पर्धा अब केवल द्विपक्षीय संबंधों का विषय नहीं रह गई है,बल्कि इसका असर वैश्विक राजनीति,अर्थव्यवस्था,व्यापार और सुरक्षा व्यवस्था पर भी साफ दिखाई दे रहा है। ऐसे में ट्रंप-शी समिट भले ही तत्काल टकराव को कम करने में सफल रही हो,लेकिन इससे यह भी साबित हो गया कि अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक संघर्ष अभी लंबे समय तक जारी रहने वाला है।
