नई दिल्ली,19 मई (युआईटीवी)- भारत ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि उसकी ऊर्जा जरूरतें और राष्ट्रीय हित किसी भी बाहरी दबाव से ऊपर हैं। पेट्रोलियम मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि भारत अमेरिकी प्रतिबंधों या किसी अस्थायी छूट की परवाह किए बिना रूस से कच्चे तेल की खरीद जारी रखेगा। सरकार का कहना है कि तेल खरीद का फैसला पूरी तरह व्यावसायिक जरूरतों,पर्याप्त आपूर्ति और देश की ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर किया जाता है।
पेट्रोलियम मंत्रालय में संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने सोमवार को मीडिया ब्रीफिंग के दौरान इस मुद्दे पर भारत का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि भारत रूस से तेल पहले भी खरीद रहा था,अमेरिकी छूट मिलने के दौरान भी खरीद जारी रही और अब भी यह प्रक्रिया जारी है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि भारत के फैसले पर अमेरिकी प्रतिबंधों या छूट का कोई असर नहीं पड़ता।
सुजाता शर्मा ने कहा, “मैं यह स्पष्ट करना चाहती हूँ कि हम पहले भी रूस से तेल खरीद रहे थे। छूट से पहले भी,छूट के दौरान भी और अब भी।” उन्होंने कहा कि भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात व्यावसायिक समझ और देश की ऊर्जा जरूरतें हैं। इसी आधार पर तेल खरीद के फैसले लिए जाते हैं।
उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत के पास पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए लंबी अवधि के समझौते मौजूद हैं और फिलहाल कच्चे तेल की कोई कमी नहीं है। सरकार का मानना है कि दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत के लिए स्थिर और किफायती ऊर्जा आपूर्ति बेहद जरूरी है। ऐसे में सस्ते और उपलब्ध स्रोतों से तेल खरीदना राष्ट्रीय हित का हिस्सा है।
यह बयान ऐसे समय आया है,जब रूस से समुद्री रास्ते से भेजे जाने वाले कच्चे तेल की बिक्री और डिलीवरी पर अमेरिका द्वारा दी गई अस्थायी छूट 16 मई को समाप्त हो गई है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने यह अस्थायी राहत मार्च के मध्य में जारी की थी और बाद में अप्रैल में इसे बढ़ाया गया था। इसका उद्देश्य वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता बनाए रखना और ईरान युद्ध के बीच तेजी से बढ़ती तेल कीमतों को नियंत्रित करना था।
हालाँकि,भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि इस छूट के खत्म होने से उसकी खरीद नीति में कोई बदलाव नहीं आएगा। सुजाता शर्मा ने कहा कि छूट हो या न हो,भारत अपने राष्ट्रीय हित और व्यावसायिक लाभ को ध्यान में रखते हुए ही फैसले लेगा।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और बीते कुछ वर्षों में उसने रूस से तेल खरीद में उल्लेखनीय वृद्धि की है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण रूस ने एशियाई देशों,विशेषकर भारत और चीन को रियायती दरों पर तेल बेचना शुरू किया था। भारत ने इस अवसर का लाभ उठाया और रूसी कच्चे तेल की खरीद बढ़ा दी।
विशेषज्ञों का मानना है कि रूस से सस्ते तेल की खरीद ने भारत की घरेलू रिफाइनरियों को वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ती कीमतों के दबाव से राहत दी है। इससे पेट्रोलियम उत्पादों की लागत को नियंत्रित रखने में भी मदद मिली है। यही वजह है कि भारत लगातार रूस के साथ ऊर्जा व्यापार बनाए हुए है।
हाल के महीनों में अमेरिका ने रूस की कुछ ऊर्जा कंपनियों और शिपिंग नेटवर्क पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाए थे। इसके चलते कुछ समय के लिए भारतीय रिफाइनरियों ने सावधानी बरतते हुए खरीद में कमी की थी,लेकिन बाद में जब अमेरिका ने सीमित छूट दी, तो भारतीय कंपनियों ने फिर से रूसी तेल आयात बढ़ा दिया।
ऊर्जा बाजार पर नजर रखने वाली डेटा फर्म क्लेपर के अनुसार,मई महीने में भारत का रूसी तेल आयात लगभग रिकॉर्ड स्तर तक पहुँच सकता है। अनुमान है कि भारत इस महीने रूस से करीब 19 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल आयात करेगा। यह आँकड़ा दर्शाता है कि रूस भारत के प्रमुख ऊर्जा साझेदारों में बना हुआ है।
भारत ऐसे समय में रूस से तेल खरीद रहा है,जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुँच चुकी है। वैश्विक स्तर पर बढ़ती कीमतों के बीच रियायती रूसी तेल भारत के लिए आर्थिक रूप से काफी लाभकारी साबित हो रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत द्वारा रूस से तेल खरीदने से वैश्विक बाजार में माँग का दबाव कुछ कम हुआ है,जिससे कीमतों को स्थिर रखने में भी मदद मिली है।
भारत सरकार लगातार यह कहती रही है कि उसकी प्राथमिकता देश के 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना है। विदेश मंत्री और पेट्रोलियम मंत्री पहले भी कई बार कह चुके हैं कि भारत अपने नागरिकों के हितों की अनदेखी नहीं कर सकता और वह सबसे बेहतर शर्तों पर तेल खरीदने का अधिकार रखता है।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रूस से तेल खरीद को लेकर भारत को कई बार पश्चिमी देशों की आलोचना का सामना करना पड़ा है,लेकिन भारत ने हमेशा स्वतंत्र विदेश नीति और रणनीतिक संतुलन बनाए रखा है। भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह वैश्विक नियमों का सम्मान करता है,लेकिन अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर ही निर्णय लेता है।
विश्लेषकों का मानना है कि भविष्य में भी भारत के रूस से तेल आयात में किसी बड़े बदलाव की संभावना नहीं है। हालाँकि,प्रतिबंधों और वैश्विक निगरानी के कारण खरीद प्रक्रिया में दस्तावेजी जाँच और अनुपालन नियमों को लेकर अधिक सतर्कता बरती जा सकती है। फिर भी भारत अपने ऊर्जा स्रोतों में बड़े बदलाव की दिशा में फिलहाल जाता नहीं दिख रहा।
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार,भारत आने वाले वर्षों में अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए बहु-स्रोत रणनीति पर काम करता रहेगा। इसमें मध्य पूर्व,रूस,अमेरिका और अफ्रीकी देशों से तेल आयात का संतुलन बनाए रखने की कोशिश की जाएगी,लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में रूस भारत के लिए एक महत्वपूर्ण और किफायती आपूर्तिकर्ता बना रहेगा।
भारत का यह स्पष्ट संदेश ऐसे समय में आया है,जब वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजार दोनों ही अस्थिरता के दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में भारत ने एक बार फिर संकेत दिया है कि उसकी ऊर्जा नीति पूरी तरह राष्ट्रीय हित,आर्थिक लाभ और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा पर आधारित रहेगी।
