वॉशिंगटन,19 मई (युआईटीवी)- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने रूस से जुड़े तेल प्रतिबंधों को लेकर बड़ा यू-टर्न लिया है। ट्रंप प्रशासन ने समुद्र में फँसे रूसी कच्चे तेल की खरीद पर पहले दी गई छूट को एक बार फिर बढ़ा दिया है। यह फैसला उस अस्थायी राहत की अवधि समाप्त होने के केवल दो दिन बाद लिया गया,जो 16 मई 2026 को खत्म हो गई थी। इस नए कदम को वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ती अस्थिरता और कच्चे तेल की ऊँची कीमतों के बीच बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अमेरिका ने मार्च 2026 की शुरुआत में पहली बार रूसी क्रूड ऑयल पर लगे कुछ प्रतिबंधों में अस्थायी राहत दी थी। उस समय वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही थीं और कई विकासशील तथा ऊर्जा संकट से जूझ रहे देशों पर इसका सीधा असर पड़ रहा था। अमेरिकी प्रशासन ने तब कहा था कि यह अस्थायी राहत वैश्विक तेल बाजार में संतुलन बनाए रखने और कमजोर देशों को ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने के उद्देश्य से दी जा रही है।
अब ट्रंप प्रशासन ने उसी राहत को दोबारा बढ़ाने का फैसला लिया है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इसकी जानकारी साझा की। उन्होंने कहा कि अमेरिकी ट्रेजरी विभाग 30 दिनों के लिए एक नया अस्थायी जनरल लाइसेंस जारी कर रहा है,जिसके तहत समुद्र में फँसे रूसी तेल तक कुछ देशों की पहुँच जारी रहेगी।
स्कॉट बेसेंट ने कहा कि यह फैसला उन देशों को राहत देने के लिए लिया गया है,जो गंभीर ऊर्जा संकट का सामना कर रहे हैं। उनके मुताबिक,कई देशों के लिए तत्काल ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है और यही वजह है कि अमेरिका ने यह अतिरिक्त समय देने का फैसला किया है।
उन्होंने अपने बयान में कहा कि इस विस्तार से संबंधित देशों को अधिक लचीलापन मिलेगा और जरूरत पड़ने पर विशेष लाइसेंस भी जारी किए जाएँगे। बेसेंट ने कहा कि यह कदम वैश्विक कच्चे तेल बाजार को स्थिर रखने और ऊर्जा के लिहाज से सबसे कमजोर देशों तक तेल पहुँच सुनिश्चित करने में मदद करेगा।
अमेरिकी वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि इस फैसले का एक रणनीतिक उद्देश्य चीन को बड़े पैमाने पर सस्ते रूसी तेल का भंडारण करने से रोकना भी है। उन्होंने कहा कि अमेरिका चाहता है कि मौजूदा तेल आपूर्ति जरूरतमंद देशों तक पहुँचे,न कि केवल बड़े आर्थिक और सामरिक भंडार तैयार करने के लिए इस्तेमाल हो।
विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन का यह कदम वैश्विक तेल बाजार की वास्तविक परिस्थितियों को देखते हुए लिया गया है। रूस पर प्रतिबंधों के बावजूद दुनिया की ऊर्जा जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं और तेल की ऊँची कीमतों ने कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ा दिया है। ऐसे में अमेरिका पूरी तरह कठोर रुख अपनाने के बजाय सीमित राहत देकर बाजार में संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
रूस और यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कई आर्थिक और ऊर्जा प्रतिबंध लगाए थे। इसका उद्देश्य रूस की आय सीमित करना और उस पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ाना था। हालाँकि,इन प्रतिबंधों का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ा और तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। कई देशों ने चिंता जताई थी कि लंबे समय तक आपूर्ति बाधित रहने से ऊर्जा संकट और गहरा सकता है।
इसी बीच भारत ने भी रूस से तेल खरीद को लेकर अपना रुख एक बार फिर साफ कर दिया है। भारत सरकार ने कहा है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा और व्यावसायिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए रूस से कच्चे तेल का आयात जारी रखेगा।
पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने सोमवार को कहा कि भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और तेल आयात का फैसला पूरी तरह व्यावसायिक व्यवहार्यता और देश की जरूरतों के आधार पर लिया जाएगा।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत ने रूस से तेल खरीद पहले भी जारी रखी थी,छूट के दौरान भी जारी रखी और आगे भी खरीद जारी रहेगी। उनके अनुसार अमेरिकी प्रतिबंधों में छूट हो या न हो,भारत अपनी ऊर्जा नीति राष्ट्रीय हितों और आर्थिक आवश्यकताओं के अनुसार तय करेगा।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और पिछले कुछ वर्षों में उसने रूस से तेल खरीद में तेजी से बढ़ोतरी की है। रूस द्वारा रियायती दरों पर तेल उपलब्ध कराए जाने से भारतीय रिफाइनरियों को काफी लाभ मिला है और इससे घरेलू बाजार में ईंधन कीमतों के दबाव को नियंत्रित रखने में मदद मिली है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि भारत जैसे बड़े उपभोक्ता देश के लिए सस्ते और स्थिर तेल स्रोत बेहद महत्वपूर्ण हैं। यही वजह है कि भारत ने पश्चिमी दबावों के बावजूद रूस के साथ ऊर्जा व्यापार बनाए रखा है। भारत लगातार यह कहता रहा है कि उसकी प्राथमिकता अपने नागरिकों और अर्थव्यवस्था की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना है।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ट्रंप प्रशासन के इस फैसले को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम अमेरिका की व्यावहारिक नीति को दर्शाता है,जहाँ वैश्विक ऊर्जा संकट और बाजार स्थिरता को भी ध्यान में रखा जा रहा है। वहीं कुछ आलोचकों का कहना है कि इससे रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों की प्रभावशीलता कमजोर हो सकती है।
फिलहाल वैश्विक ऊर्जा बाजार की नजर अमेरिका के अगले कदमों और रूस से तेल खरीद को लेकर अंतर्राष्ट्रीय रुख पर बनी हुई है। आने वाले हफ्तों में यह स्पष्ट होगा कि ट्रंप प्रशासन इस अस्थायी राहत को आगे बढ़ाता है या फिर कोई नई रणनीति अपनाता है। वहीं भारत ने यह संकेत दे दिया है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए तेल आयात संबंधी फैसले लेता रहेगा।
