नई दिल्ली,19 मई (युआईटीवी)- भारत और नॉर्वे के बीच रणनीतिक और आर्थिक सहयोग को नई मजबूती देते हुए नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया यात्रा ने दोनों देशों के संबंधों को और अधिक गहरा किया है। उन्होंने कहा कि भारत और नॉर्वे के बीच बनी ‘ग्रीन स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप’ आने वाले समय में स्वच्छ ऊर्जा,सतत विकास,ब्लू इकॉनमी और ग्रीन शिपिंग जैसे क्षेत्रों में सहयोग को नई दिशा देगी। नॉर्वे के प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं में मौजूद पूरकता और भारत की तेजी से बढ़ती युवा एवं ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था इस साझेदारी की सबसे बड़ी ताकत है।
मीडिया से बातचीत के दौरान जोनास गहर स्टोर ने कहा कि जब दोनों देशों ने ग्रीन स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप की शुरुआत की थी,तब सबसे बड़ा सवाल यह था कि इसे सफलतापूर्वक कैसे आगे बढ़ाया जाए। उन्होंने कहा कि इस सवाल का जवाब भारत की तेज आर्थिक प्रगति और बदलती वैश्विक भूमिका में छिपा हुआ है। नॉर्वे के प्रधानमंत्री ने कहा, “भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और अब वह अधिक ज्ञान-आधारित बनती जा रही है। भारत की आबादी युवा है और इसकी अर्थव्यवस्था बेहद गतिशील है। इन रुझानों और हमारी अर्थव्यवस्थाओं के बीच की पूरकता के आधार पर हमें विश्वास है कि हम अपने साझा लक्ष्यों को हासिल कर सकते हैं।”
उन्होंने कहा कि नॉर्वे और भारत के बीच सहयोग केवल व्यापार तक सीमित नहीं है,बल्कि यह जलवायु परिवर्तन,पर्यावरण संरक्षण और हरित विकास जैसे वैश्विक मुद्दों पर साझा दृष्टिकोण को भी दर्शाता है। नॉर्वे लंबे समय से ग्रीन टेक्नोलॉजी,समुद्री उद्योग और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाता रहा है,जबकि भारत तेजी से दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह मजबूत कर रहा है। ऐसे में दोनों देशों की साझेदारी भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर ने आतंकवाद के मुद्दे पर भी भारत के प्रति एकजुटता जताई। उन्होंने कहा कि आतंकवाद किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता और इसके खिलाफ पूरी दुनिया को सख्त रुख अपनाना होगा। उन्होंने कहा कि नॉर्वे खुद भी आतंकवाद की पीड़ा झेल चुका है और इसलिए वह उन देशों और लोगों के दर्द को अच्छी तरह समझता है,जो ऐसी घटनाओं से प्रभावित होते हैं।
उन्होंने कहा, “करीब 15 वर्ष पहले हमने भी आतंकवाद का दर्द महसूस किया था। यहाँ सरकारी इमारतों को एक आतंकवादी हमले में उड़ा दिया गया था। जिन देशों ने ऐसे अनुभवों का सामना किया है,वे इससे होने वाले दर्द को समझते हैं। हम आतंकवाद से प्रभावित देशों और लोगों के प्रति अपनी एकजुटता व्यक्त करते हैं।”
विशेषज्ञों का मानना है कि नॉर्वे की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है,जब भारत लगातार वैश्विक मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ सख्त अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की माँग करता रहा है। भारत लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद और कट्टरपंथ के खिलाफ वैश्विक एकजुटता की जरूरत पर जोर देता रहा है। नॉर्वे के प्रधानमंत्री का यह बयान भारत के दृष्टिकोण के प्रति समर्थन के रूप में देखा जा रहा है।
रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर पूछे गए सवाल पर भी नॉर्वे के प्रधानमंत्री ने संतुलित प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि भारत और रूस के बीच ऐतिहासिक संबंध रहे हैं और नॉर्वे इसका सम्मान करता है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि भारत एक विशाल देश है, जिसकी ऊर्जा संबंधी आवश्यकताएँ बहुत बड़ी हैं। हालाँकि,उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नॉर्वे का मानना है कि यूक्रेन में जारी युद्ध को समाप्त करने के लिए रूस पर अधिक दबाव बनाया जाना चाहिए।
जोनास गहर स्टोर ने कहा, “हमारा मानना है कि यूक्रेन में चल रहे इस भयानक युद्ध को समाप्त करने के लिए रूस पर और अधिक दबाव डाला जाना चाहिए,ताकि वह बातचीत की मेज पर आए और युद्ध समाप्त करने की दिशा में गंभीरता से काम करे। यह युद्ध लगातार लोगों की जान ले रहा है,तबाही फैला रहा है और वैश्विक अस्थिरता पैदा कर रहा है।”
उनके इस बयान को नॉर्वे की उस नीति के रूप में देखा जा रहा है,जिसमें वह यूक्रेन युद्ध को लेकर पश्चिमी देशों के साथ खड़ा है,लेकिन साथ ही भारत जैसे रणनीतिक साझेदार देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना चाहता है।
नॉर्वे के प्रधानमंत्री ने आर्कटिक क्षेत्र और जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि आर्कटिक दुनिया का बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्र है,जहाँ जलवायु परिवर्तन का प्रभाव तेजी से दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि फिलहाल आर्कटिक काउंसिल का कामकाज प्रभावित हुआ है,क्योंकि रूस यूरोप में पूर्ण स्तर का युद्ध लड़ रहा है। इस वजह से क्षेत्रीय सहयोग में कई तरह की बाधाएं आई हैं।
उन्होंने कहा, “आर्कटिक बहुत विशाल क्षेत्र है। मैं उस हिस्से की बात कर सकता हूँ,जो नॉर्वे के अंतर्गत आता है। वर्तमान में सबसे बड़ी समस्या यह है कि रूस के युद्ध के कारण आर्कटिक काउंसिल का सहयोग प्रभावित हुआ है और इसके कामकाज पर सीमाएँ लग गई हैं।”
प्रधानमंत्री स्टोर ने भारत की वैज्ञानिक क्षमताओं की भी सराहना की और कहा कि नॉर्वे चाहता है कि भारत आर्कटिक जलवायु अनुसंधान में अधिक सक्रिय भूमिका निभाए। उन्होंने कहा कि भारत की वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता लगातार बढ़ रही है और यह सहयोग दोनों देशों के लिए लाभकारी हो सकता है। उन्होंने कहा कि आर्कटिक में हो रहे जलवायु परिवर्तन का प्रभाव केवल यूरोप तक सीमित नहीं है,बल्कि इसका असर भारत जैसे देशों की जलवायु पर भी पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार,भारत और नॉर्वे के बीच बढ़ता सहयोग वैश्विक राजनीति और आर्थिक रणनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। एक ओर भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और हरित विकास लक्ष्यों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है,वहीं नॉर्वे स्वच्छ ऊर्जा और समुद्री अर्थव्यवस्था में अपनी विशेषज्ञता के जरिए वैश्विक साझेदारियों को मजबूत कर रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नॉर्वे यात्रा को इसी व्यापक रणनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में दोनों देशों के बीच ऊर्जा,तकनीक, समुद्री सहयोग और जलवायु अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में साझेदारी और अधिक मजबूत होगी।
