अनिल अंबानी (तस्वीर क्रेडिट@theapril29th)

रिलायंस एडीए समूह से जुड़े 7,623 करोड़ रुपए के बैंक ऋण घोटाले में सीबीआई की बड़ी कार्रवाई,दो पूर्व शीर्ष अधिकारियों की गिरफ्तारी

नई दिल्ली,23 जून (युआईटीवी)- रिलायंस एडीए समूह से जुड़े कथित बैंक ऋण अनियमितता मामलों की जाँच कर रही केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने एक महत्वपूर्ण कार्रवाई करते हुए समूह की दो वित्तीय कंपनियों के पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों को गिरफ्तार किया है। जाँच एजेंसी ने रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड के पूर्व निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी देवांग मोदी तथा रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड के पूर्व कार्यकारी निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी रवींद्र सुधालकर को हिरासत में लिया है। सीबीआई का आरोप है कि दोनों अधिकारियों ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए ऐसे वित्तीय निर्णय लिए,जिनसे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

सीबीआई द्वारा जारी बयान के अनुसार,जाँच में यह सामने आया है कि रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड और रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड से प्राप्त धनराशि को कथित तौर पर समूह की अन्य कंपनियों में स्थानांतरित किया गया। इनमें रिलायंस कैपिटल लिमिटेड, रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड और रिलायंस पावर लिमिटेड जैसी कंपनियों के नाम शामिल हैं। जाँच एजेंसी का दावा है कि इस प्रक्रिया के कारण सरकारी बैंकों को कुल 7,623 करोड़ रुपये का गलत नुकसान हुआ,जबकि संबंधित कंपनियों और आरोपियों को उतने ही मूल्य का अनुचित लाभ प्राप्त हुआ।

जाँच एजेंसी के अनुसार,रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड से जुड़े मामले में 13 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को लगभग 4,097 करोड़ रुपये का नुकसान पहुँचा। वहीं रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड से जुड़े मामले में 10 सरकारी बैंकों को करीब 3,526 करोड़ रुपये की क्षति हुई। सीबीआई का कहना है कि दोनों मामलों में ऋण वितरण और धन के उपयोग की प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएँ पाई गई हैं।

जाँच में सामने आया है कि अप्रैल 2017 से दिसंबर 2018 के बीच देवांग मोदी रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में कार्यरत थे। इस अवधि में कंपनी के संचालन और प्रमुख वित्तीय निर्णयों की जिम्मेदारी उनके पास थी। सीबीआई का आरोप है कि उन्होंने कई ऐसी मध्यस्थ कंपनियों को ऋण स्वीकृत किए, जिन्हें वित्तीय सहायता प्रदान करना भारतीय रिजर्व बैंक के नियमों और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से प्राप्त ऋण की शर्तों के अनुरूप नहीं था।

एजेंसी का दावा है कि संबंधित ऋणों को मंजूरी देने से पहले आवश्यक जोखिम मूल्यांकन और नियामकीय प्रक्रियाओं का समुचित पालन नहीं किया गया। इसके बावजूद बड़ी मात्रा में धनराशि जारी की गई,जिसे बाद में समूह की अन्य कंपनियों तक पहुँचाया गया। सीबीआई का कहना है कि यह पूरा लेनदेन वित्तीय नियमों और बैंकिंग मानकों के विरुद्ध था।

दूसरी ओर,रवींद्र सुधालकर की भूमिका भी जांच के केंद्र में है। वह एक अक्टूबर 2016 से 31 मार्च 2022 तक रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड में कार्यकारी निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पद पर रहे। सीबीआई के अनुसार,कंपनी के प्रमुख निर्णय लेने वाले अधिकारी होने के नाते उनकी जिम्मेदारी थी कि ऋण वितरण प्रक्रिया कंपनी की आंतरिक नीतियों और नियामकीय दिशा-निर्देशों के अनुरूप हो,लेकिन जाँच में आरोप लगाया गया है कि उन्होंने भी ऐसी मध्यस्थ कंपनियों को ऋण स्वीकृत किए,जो कंपनी की ऋण नीति, राष्ट्रीय आवास बैंक और भारतीय रिजर्व बैंक के नियमों तथा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से लिए गए ऋण की शर्तों के खिलाफ थे।

सीबीआई का मानना है कि इन ऋणों के माध्यम से धन को एक सुनियोजित तरीके से अन्य संस्थाओं तक पहुँचाया गया,जिससे बैंकिंग प्रणाली को गंभीर नुकसान हुआ। जाँच एजेंसी इस बात की भी पड़ताल कर रही है कि क्या इस प्रक्रिया में अन्य अधिकारियों या संस्थाओं की भी भूमिका थी।

यह मामला तब और महत्वपूर्ण हो गया,जब विभिन्न सरकारी बैंकों और भारतीय जीवन बीमा निगम से प्राप्त शिकायतों के आधार पर सीबीआई ने कई प्राथमिकी दर्ज कीं। इन शिकायतों में रिलायंस कम्युनिकेशंस लिमिटेड,रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड,रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड और रिलायंस टेलीकॉम लिमिटेड से जुड़े वित्तीय लेनदेन पर सवाल उठाए गए थे। इन्हीं शिकायतों के आधार पर एजेंसी ने सात अलग-अलग एफआईआर दर्ज कर विस्तृत जांच शुरू की।

इस पूरे मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसकी निगरानी देश का सर्वोच्च न्यायालय भी कर रहा है। न्यायिक निगरानी में चल रही जाँच के कारण एजेंसियों पर तथ्यों को निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से सामने लाने की जिम्मेदारी और बढ़ गई है।

सीबीआई ने 29 मई को रिलायंस कम्युनिकेशंस से जुड़े मामले में अपनी पहली आरोपपत्र भी दाखिल कर दी थी। इस आरोपपत्र में कंपनी के अलावा पाँच वरिष्ठ अधिकारियों और 10 बैंक अधिकारियों सहित कुल 16 लोगों को आरोपी बनाया गया था। एजेंसी का आरोप है कि इन लोगों ने विभिन्न स्तरों पर ऐसे निर्णय लिए या उन्हें मंजूरी दी,जिनसे बैंकिंग प्रणाली को नुकसान पहुँचा।

ताजा गिरफ्तारियों के बाद रिलायंस एडीए समूह से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किए गए लोगों की संख्या बढ़कर पाँच हो गई है। जाँच एजेंसी का कहना है कि यह केवल शुरुआती चरण है और अभी कई पहलुओं की जाँच जारी है। वित्तीय लेनदेन,ऋण स्वीकृति प्रक्रियाओं,धन के प्रवाह और विभिन्न कंपनियों के बीच हुए लेनदेन की बारीकी से पड़ताल की जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में कॉर्पोरेट ऋण प्रबंधन और निगरानी व्यवस्था पर भी महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से हजारों करोड़ रुपये के ऋण लेने वाली कंपनियों की गतिविधियों की समय-समय पर निगरानी और नियामकीय अनुपालन सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है। यदि ऋण का उपयोग स्वीकृत उद्देश्य से हटकर किया जाता है,तो उसका प्रभाव केवल बैंकिंग संस्थानों तक सीमित नहीं रहता,बल्कि व्यापक आर्थिक व्यवस्था पर भी पड़ता है।

फिलहाल सीबीआई की जाँच जारी है और एजेंसी ने संकेत दिए हैं कि आने वाले समय में और भी महत्वपूर्ण खुलासे हो सकते हैं। अधिकारियों का कहना है कि मामले से जुड़े सभी दस्तावेजों,वित्तीय रिकॉर्ड और डिजिटल साक्ष्यों की जाँच की जा रही है। साथ ही उन सभी व्यक्तियों और संस्थाओं की भूमिका का भी विश्लेषण किया जा रहा है,जिनका नाम इस कथित वित्तीय अनियमितता से जुड़कर सामने आया है।

इस बीच,देश के वित्तीय और कॉर्पोरेट क्षेत्र की निगाहें इस मामले पर टिकी हुई हैं। जाँच के अगले चरण में क्या नए तथ्य सामने आते हैं और क्या अन्य लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई होती है,यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। फिलहाल सीबीआई की यह कार्रवाई देश के सबसे चर्चित वित्तीय मामलों में से एक मानी जा रही है,जिसने बैंकिंग क्षेत्र और कॉर्पोरेट जगत में व्यापक चर्चा को जन्म दिया है।