रियाद,29 जून (युआईटीवी)- पश्चिम एशिया में बदलते भू-राजनीतिक हालात और ईरान-अमेरिका के बीच हालिया कूटनीतिक प्रयासों के बीच सऊदी अरब और फ्रांस ने क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर अपने सहयोग को और मजबूत करने के संकेत दिए हैं। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस और प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान बिन अब्दुलअजीज अल सऊद तथा फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के बीच टेलीफोन पर हुई महत्वपूर्ण बातचीत में पश्चिम एशिया की सुरक्षा,ईरान-अमेरिका के बीच हुए समझौता ज्ञापन,होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति और वैश्विक समुद्री व्यापार की सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई। दोनों नेताओं ने इस बात पर जोर दिया कि क्षेत्र में तनाव कम करने और स्थायी शांति स्थापित करने के लिए सैन्य विकल्पों के बजाय कूटनीतिक प्रयासों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
सऊदी प्रेस एजेंसी द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार,यह बातचीत ऐसे समय में हुई है,जब पश्चिम एशिया में हाल के घटनाक्रमों ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। दोनों नेताओं ने अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन से जुड़े ताजा घटनाक्रमों की समीक्षा की और इस बात पर विचार किया कि इस समझौते को क्षेत्रीय शांति और स्थिरता की दिशा में प्रभावी रूप से कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है।
बातचीत के दौरान मोहम्मद बिन सलमान और इमैनुएल मैक्रों ने इस बात पर सहमति जताई कि पश्चिम एशिया में स्थिरता केवल व्यापक संवाद,आपसी विश्वास और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से ही सुनिश्चित की जा सकती है। दोनों नेताओं ने कहा कि यदि क्षेत्र में तनाव कम होता है,तो इसका सकारात्मक प्रभाव न केवल संबंधित देशों पर पड़ेगा,बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर भी दिखाई देगा।
दोनों नेताओं ने विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य में नौवहन की स्वतंत्रता बनाए रखने के महत्व पर जोर दिया। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों में शामिल है,जहाँ से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति होती है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार और समुद्री व्यापार को प्रभावित कर सकता है। इसी कारण सऊदी अरब और फ्रांस ने अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुरूप जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने और किसी भी प्रकार के टकराव को रोकने के लिए कूटनीतिक प्रयासों का समर्थन किया।
बातचीत के दौरान दोनों देशों के नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों की भी समीक्षा की। उन्होंने रक्षा, ऊर्जा,निवेश,व्यापार,प्रौद्योगिकी और क्षेत्रीय सहयोग जैसे विभिन्न क्षेत्रों में साझेदारी को और मजबूत करने पर सहमति जताई। साथ ही पश्चिम एशिया से जुड़े अन्य अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर भी दोनों नेताओं ने अपने विचार साझा किए और भविष्य में लगातार संपर्क बनाए रखने की प्रतिबद्धता दोहराई।
यह बातचीत ऐसे समय में हुई है,जब अमेरिका और ईरान के बीच पिछले कुछ सप्ताहों में तनाव और संवाद दोनों साथ-साथ देखने को मिले हैं। दोनों देशों के राष्ट्रपतियों ने 17 जून को एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे,जिसका उद्देश्य कई महीनों से जारी विवादों को शांतिपूर्ण तरीके से समाप्त करने की दिशा में आगे बढ़ना था। इस समझौते को दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया,हालाँकि इसके बावजूद समय-समय पर दोनों पक्षों के बीच सीमित स्तर की झड़पें और आरोप-प्रत्यारोप जारी रहे हैं।
हाल के दिनों में होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़े तनाव ने एक बार फिर वैश्विक चिंता बढ़ा दी। अमेरिका और ईरान के बीच कुछ सैन्य घटनाओं के बाद यह आशंका जताई जाने लगी थी कि यदि स्थिति और बिगड़ती है,तो समुद्री व्यापार प्रभावित हो सकता है। इसी पृष्ठभूमि में दोनों देशों ने फिलहाल प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई रोकने और बातचीत के जरिए विवादों का समाधान तलाशने पर सहमति बनाई है।
अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार,अमेरिका और ईरान ने कतर की राजधानी दोहा में उच्चस्तरीय वार्ता करने का निर्णय लिया है। इस बैठक का उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना,जहाजों की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करना और भविष्य में किसी भी प्रकार के सैन्य टकराव से बचने के लिए व्यावहारिक समाधान तैयार करना है। दोनों पक्षों के बीच तकनीकी स्तर की बातचीत भी जारी रहेगी,ताकि सहमति से लिए गए निर्णयों को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके।
जानकारी के अनुसार,मूल रूप से यह वार्ता स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित थी और इसका प्रमुख विषय ईरान का परमाणु कार्यक्रम था,लेकिन होर्मुज जलडमरूमध्य में अचानक बढ़े तनाव और समुद्री सुरक्षा से जुड़े नए घटनाक्रमों के कारण बैठक का स्थान बदलकर दोहा कर दिया गया। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि वर्तमान समय में समुद्री सुरक्षा और व्यापारिक मार्गों की स्थिरता दोनों देशों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बन चुके हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोहा में होने वाली बातचीत सफल रहती है,तो इसका सकारात्मक प्रभाव पूरे पश्चिम एशिया पर पड़ सकता है। इससे न केवल अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने की संभावना बढ़ेगी,बल्कि खाड़ी क्षेत्र में निवेश,व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी चिंताओं में भी कमी आ सकती है। इसके अलावा,सऊदी अरब और फ्रांस जैसे प्रभावशाली देशों का कूटनीतिक समर्थन इस प्रक्रिया को और मजबूती प्रदान कर सकता है।
पश्चिम एशिया लंबे समय से विभिन्न राजनीतिक और सुरक्षा चुनौतियों का सामना करता रहा है। ऐसे में क्षेत्र के प्रमुख देशों और वैश्विक शक्तियों के बीच बढ़ता संवाद इस बात का संकेत है कि अब संघर्ष के बजाय समाधान की दिशा में अधिक गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं। सऊदी अरब और फ्रांस के बीच हुई यह बातचीत भी उसी व्यापक कूटनीतिक पहल का हिस्सा मानी जा रही है,जिसका उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता को मजबूत करना और संभावित संकटों को बातचीत के माध्यम से टालना है।
अब अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की निगाहें दोहा में प्रस्तावित अमेरिका-ईरान वार्ता पर टिकी हैं। यदि यह बैठक सकारात्मक परिणाम लेकर आती है,तो इससे न केवल होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव कम होगा,बल्कि पूरे पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता की नई संभावनाएँ भी मजबूत होंगी। वहीं सऊदी अरब और फ्रांस की सक्रिय कूटनीतिक भूमिका इस दिशा में एक महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप में उभरती दिखाई दे रही है।
