अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और नाटो महासचिव मार्क रूटे (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

ईरान मुद्दे पर सहयोगियों से नाराज दिखे डोनाल्ड ट्रंप,बोले- अमेरिका को पैसे नहीं,सिर्फ वफादारी चाहिए

वाशिंगटन,25 जून (युआईटीवी)- अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ हालिया सैन्य संघर्ष के दौरान कई नाटो सहयोगी देशों के रवैये पर नाराजगी जताते हुए कहा है कि अमेरिका को उनकी सैन्य मदद की आवश्यकता नहीं थी,लेकिन वह अपने साझेदार देशों से अधिक वफादारी और समर्थन की अपेक्षा रखते थे। अंकारा में अगले महीने होने वाले नाटो शिखर सम्मेलन से पहले व्हाइट हाउस में नाटो महासचिव मार्क रूटे के साथ हुई बैठक के दौरान ट्रंप ने खुलकर अपनी भावनाएँ व्यक्त कीं और कई प्रमुख यूरोपीय देशों के रुख पर असंतोष जाहिर किया।

व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत करते हुए ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने ईरान के खिलाफ बेहद प्रभावी और निर्णायक कार्रवाई की। उन्होंने दावा किया कि संघर्ष के शुरुआती सप्ताह में ही अमेरिका ने अपने रणनीतिक लक्ष्य हासिल कर लिए थे। हालाँकि,उन्होंने कहा कि इस पूरे घटनाक्रम के दौरान कुछ ऐसे सहयोगी देश थे,जिनसे उन्हें अधिक राजनीतिक और नैतिक समर्थन की उम्मीद थी,लेकिन वह अपेक्षा पूरी नहीं हुई।

ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को किसी भी प्रकार की अतिरिक्त सैन्य सहायता की आवश्यकता नहीं थी,क्योंकि उसकी सेना दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेनाओं में से एक है। फिर भी उन्हें यह उम्मीद थी कि सहयोगी देश कम से कम सार्वजनिक रूप से अमेरिका के साथ मजबूती से खड़े होने का संदेश देते। उन्होंने कहा कि यदि सहयोगी देश यह कहते कि वे मदद के लिए तैयार हैं,तो यह एक महत्वपूर्ण संकेत होता और इससे गठबंधन की एकजुटता प्रदर्शित होती।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने विशेष रूप से इटली,ब्रिटेन,जर्मनी और फ्रांस का उल्लेख करते हुए कहा कि इन देशों की प्रतिक्रिया उन्हें संतोषजनक नहीं लगी। ट्रंप ने कहा कि वह इन देशों से निराश हैं क्योंकि अमेरिका वर्षों से नाटो और पश्चिमी सुरक्षा ढाँचे में सबसे बड़ी भूमिका निभाता आया है। उनके अनुसार,जब अमेरिका किसी बड़े सुरक्षा संकट का सामना कर रहा हो,तब सहयोगियों को अधिक स्पष्ट और दृढ़ समर्थन दिखाना चाहिए।

हालाँकि,नाटो महासचिव मार्क रूटे ने ट्रंप की चिंताओं को पूरी तरह खारिज नहीं किया, लेकिन उन्होंने यूरोपीय देशों की भूमिका का बचाव किया। रूटे ने कहा कि कुछ मामलों में अलग-अलग देशों की परिस्थितियाँ और नीतिगत सीमाएँ हो सकती हैं,लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्होंने अमेरिका का समर्थन नहीं किया। उन्होंने बताया कि कई यूरोपीय देशों ने अमेरिका को महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध कराई,जिसने पूरे अभियान को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई।

रूटे ने कहा कि यदि यूरोप में मौजूद सैन्य ढांचे और एयर बेस उपलब्ध नहीं होते,तो अमेरिका के लिए इतनी बड़ी सैन्य कार्रवाई को अंजाम देना कहीं अधिक कठिन हो सकता था। उन्होंने बताया कि संघर्ष के दौरान यूरोप स्थित विभिन्न एयर बेस से हजारों अमेरिकी विमानों ने उड़ान भरी और संचालन किया। उनके अनुसार,यह सहयोग किसी भी सैन्य अभियान की सफलता के लिए बेहद महत्वपूर्ण था और इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

बैठक के दौरान ट्रंप ने एक बार फिर नाटो देशों के रक्षा खर्च का मुद्दा भी उठाया। लंबे समय से वह इस बात पर जोर देते रहे हैं कि नाटो के सदस्य देशों को अपनी सुरक्षा पर अधिक निवेश करना चाहिए और अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता कम करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि छह महीने पहले कई देशों ने अपनी सकल घरेलू उत्पाद का पाँच प्रतिशत रक्षा और सुरक्षा पर खर्च करने की दिशा में काम करने की सहमति दी थी,लेकिन अधिकांश देश अभी भी उस लक्ष्य तक नहीं पहुँचे हैं।

ट्रंप ने कहा कि अमेरिका वर्षों से नाटो के वित्तीय बोझ का बड़ा हिस्सा उठाता रहा है। उनके अनुसार,यदि गठबंधन को भविष्य की चुनौतियों का सामना करना है,तो सभी सदस्य देशों को समान जिम्मेदारी निभानी होगी। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि केवल घोषणाएँ पर्याप्त नहीं हैं,बल्कि रक्षा बजट में वास्तविक वृद्धि दिखाई देनी चाहिए।

इसके जवाब में मार्क रूटे ने कहा कि कई यूरोपीय देश रक्षा खर्च बढ़ाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने जर्मनी,पोलैंड,डेनमार्क और बाल्टिक देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन देशों ने हाल के वर्षों में अपने रक्षा बजट में उल्लेखनीय वृद्धि की है। रूटे ने यह भी कहा कि यूरोप और कनाडा में रक्षा खर्च बढ़ाने के पीछे ट्रंप के लगातार दबाव और नेतृत्व की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

हालाँकि,ट्रंप ने स्पष्ट किया कि उनकी सबसे बड़ी चिंता वित्तीय योगदान नहीं है। उन्होंने कहा कि अमेरिका को सहयोगियों के पैसों की आवश्यकता नहीं है। उनके अनुसार,अमेरिका आर्थिक और सैन्य रूप से पर्याप्त मजबूत है। उन्होंने कहा कि उनकी प्राथमिक अपेक्षा केवल वफादारी और भरोसे की है। ट्रंप ने कहा कि जब सहयोगी देशों के बीच साझेदारी होती है,तो संकट के समय एक-दूसरे के प्रति प्रतिबद्धता दिखाई देनी चाहिए।

ईरान के मुद्दे पर चर्चा करते हुए नाटो महासचिव ने ट्रंप प्रशासन के रुख का समर्थन किया। रूटे ने कहा कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना वैश्विक सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि यदि ईरान परमाणु क्षमता प्राप्त कर लेता है,तो इसका प्रभाव केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि पूरी दुनिया की सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

रूटे ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय लंबे समय से इस बात पर सहमत रहा है कि ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। उन्होंने ट्रंप के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि अमेरिका इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है और यह वैश्विक सुरक्षा हितों के अनुरूप है।

इस बीच ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि ईरान के साथ कूटनीतिक बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत काफी अच्छी चल रही है और कुछ महत्वपूर्ण प्रगति देखने को मिल रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि ईरान वार्ता के दौरान कई महत्वपूर्ण रियायतें देने के लिए तैयार दिखाई दे रहा है।

हालाँकि,ट्रंप ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि कुछ मुद्दों पर अमेरिका किसी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं करेगा। जब उनसे पूछा गया कि क्या वह ऐसे किसी समझौते का समर्थन करेंगे,जिसमें ईरान को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क लगाने की अनुमति दी जाए,तो उन्होंने साफ शब्दों में इनकार कर दिया। ट्रंप ने कहा कि वह ऐसी किसी व्यवस्था की अनुमति नहीं देंगे क्योंकि यह वैश्विक व्यापार और समुद्री सुरक्षा के लिए नुकसानदायक हो सकती है।

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक माना जाता है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। इसलिए इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता या अतिरिक्त शुल्क व्यवस्था का प्रभाव अंतर्राष्ट्रीय बाजारों पर पड़ सकता है।

बैठक के दौरान ट्रंप ने तुर्किए के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन के साथ अपने संबंधों पर भी टिप्पणी की। उन्होंने एर्दोगन को अपना मित्र बताते हुए कहा कि वह अपने देश के हितों के लिए काम कर रहे हैं और अच्छा नेतृत्व प्रदान कर रहे हैं। ट्रंप के इस बयान को अंकारा में होने वाले नाटो शिखर सम्मेलन से पहले एक सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

तुर्किए और अमेरिका के बीच पिछले कुछ वर्षों में कई मुद्दों को लेकर मतभेद रहे हैं,जिनमें रक्षा सहयोग और हथियार खरीद से जुड़े विषय प्रमुख रहे हैं। इसी संदर्भ में तुर्किए की लंबे समय से लंबित एफ-35 लड़ाकू विमान कार्यक्रम में वापसी की माँग भी चर्चा का विषय बनी हुई है।

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस विषय पर कहा कि प्रशासन इस मामले की समीक्षा कर रहा है। उन्होंने बताया कि यह देखा जा रहा है कि क्या तुर्किए ने सभी आवश्यक कानूनी और नीतिगत शर्तों को पूरा किया है। वेंस के अनुसार,इस मामले में अमेरिकी कांग्रेस की भी महत्वपूर्ण भूमिका है और अंतिम निर्णय से पहले सभी कानूनी पहलुओं का मूल्यांकन किया जाएगा।

बैठक में यूक्रेन युद्ध का मुद्दा भी उठा। इस पर ट्रंप ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की की सराहना की। उन्होंने कहा कि जेलेंस्की कठिन परिस्थितियों में भी मजबूती से डटे हुए हैं और उन्होंने साहस का परिचय दिया है। ट्रंप ने कहा कि यूक्रेन के नेतृत्व ने बेहद चुनौतीपूर्ण हालात में संघर्ष जारी रखा है।

यूक्रेन को लेकर ट्रंप की यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि आने वाले नाटो शिखर सम्मेलन में यूक्रेन को समर्थन देने का मुद्दा प्रमुख एजेंडा में शामिल रहने की संभावना है। पश्चिमी देशों का मानना है कि यूक्रेन को निरंतर सैन्य,आर्थिक और राजनीतिक सहायता की आवश्यकता है।

अंकारा में 7 और 8 जुलाई को आयोजित होने वाला नाटो शिखर सम्मेलन कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस सम्मेलन में सदस्य देशों द्वारा पिछले वर्ष किए गए रक्षा निवेश संबंधी समझौतों की समीक्षा की जाएगी। साथ ही रक्षा उत्पादन क्षमता बढ़ाने, सैन्य सहयोग को मजबूत करने और यूक्रेन को निरंतर समर्थन देने जैसे मुद्दों पर भी चर्चा होगी।

नाटो देशों ने पहले ही यह लक्ष्य निर्धारित किया है कि वर्ष 2035 तक सदस्य राष्ट्र अपनी जीडीपी का पाँच प्रतिशत रक्षा और सुरक्षा से जुड़े क्षेत्रों में निवेश करने की दिशा में काम करेंगे। इसके अलावा रक्षा उद्योग को मजबूत बनाने और नई सुरक्षा चुनौतियों के अनुरूप सैन्य क्षमताओं का विकास भी प्राथमिकता में शामिल है।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी नाटो देशों की चिंता बनी हुई है। गठबंधन के नेताओं ने कई बार दोहराया है कि ईरान को कभी भी परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाने चाहिए। इसी कारण आगामी शिखर सम्मेलन में मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति और ईरान से जुड़े मुद्दों पर भी व्यापक चर्चा होने की संभावना है।

व्हाइट हाउस में हुई ट्रंप और मार्क रूटे की यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है,जब वैश्विक सुरक्षा वातावरण तेजी से बदल रहा है। यूक्रेन युद्ध,मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव,चीन की बढ़ती सैन्य क्षमता और ऊर्जा सुरक्षा जैसे मुद्दे अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में हैं। ऐसे में नाटो की एकजुटता और सदस्य देशों के बीच भरोसे का प्रश्न पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

ट्रंप के बयानों से स्पष्ट है कि वह केवल सैन्य शक्ति या आर्थिक योगदान को ही नहीं,बल्कि राजनीतिक निष्ठा और रणनीतिक समर्थन को भी गठबंधन की सफलता के लिए आवश्यक मानते हैं। वहीं रूटे ने यह संदेश देने की कोशिश की कि मतभेदों के बावजूद अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगी अभी भी साझा सुरक्षा हितों के लिए साथ मिलकर काम कर रहे हैं। आने वाले नाटो शिखर सम्मेलन में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सदस्य देश इन चुनौतियों का सामना करने के लिए किस प्रकार की सामूहिक रणनीति तैयार करते हैं और ट्रंप द्वारा उठाए गए मुद्दों पर किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं।