राघव चड्ढा (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

दिल्ली हाई कोर्ट से राघव चड्ढा को आंशिक राहत,पाँच कथित मानहानिकारक सोशल मीडिया पोस्ट हटाने का आदेश

नई दिल्ली,1 जुलाई (युआईटीवी)- दिल्ली हाई कोर्ट ने राज्यसभा सदस्य राघव चड्ढा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्हें आंशिक राहत प्रदान की है। अदालत ने सोशल मीडिया पर साझा की गई पाँच ऐसी पोस्ट हटाने का निर्देश दिया है,जिन्हें प्रथमदृष्टया मानहानिकारक माना गया। हालाँकि,अदालत ने राघव चड्ढा के पर्सनैलिटी और पब्लिसिटी राइट्स की व्यापक सुरक्षा देने से इनकार कर दिया और बाकी सोशल मीडिया पोस्ट पर किसी प्रकार का अंतरिम प्रतिबंध लगाने से भी मना कर दिया। अदालत का कहना था कि पहली नजर में यह मामला पर्सनैलिटी राइट्स के उल्लंघन का नहीं बल्कि राजनीतिक आलोचना और कथित मानहानि से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है।

न्यायमूर्ति सुब्रमोनियम प्रसाद की एकल पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर केवल पाँच पोस्ट ऐसी हैं,जिन्हें प्रथमदृष्टया मानहानिकारक माना जा सकता है। इसलिए उन्हें हटाने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने कहा कि अन्य पोस्ट को देखने के बाद प्रथमदृष्टया ऐसा नहीं लगता कि वे मानहानिकारक हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में पर्सनैलिटी राइट्स के उल्लंघन का प्रश्न फिलहाल नहीं बनता।

अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि इस मामले में पर्सनैलिटी राइट्स लागू होने जैसी स्थिति नहीं दिखाई देती। न्यायालय ने कहा कि उसने केवल पाँच दस्तावेज या पोस्ट हटाने का आदेश दिया है और शेष सामग्री को प्रथमदृष्टया मानहानिकारक नहीं माना जा सकता। इस टिप्पणी के साथ अदालत ने यह भी संकेत दिया कि किसी सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्ति को राजनीतिक आलोचना का सामना करना पड़ सकता है और हर आलोचनात्मक टिप्पणी को पर्सनैलिटी राइट्स के उल्लंघन की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

राघव चड्ढा ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि आम आदमी पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद सोशल मीडिया पर उनके नाम,तस्वीर,पहचान और सार्वजनिक छवि का उनकी अनुमति के बिना इस्तेमाल किया गया। उनका कहना था कि सोशल मीडिया पर कई ऐसे पोस्ट प्रसारित किए गए,जिनमें यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि उन्होंने राजनीतिक लाभ या धन के लिए अपना पक्ष बदल लिया। याचिका में दावा किया गया कि इस प्रकार की सामग्री का उद्देश्य उनकी सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुँचाना और लोगों के बीच उनकी प्रतिष्ठा को धूमिल करना था।

याचिका में यह भी कहा गया था कि सोशल मीडिया पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से तैयार किए गए वीडियो,डीपफेक सामग्री,मॉर्फ्ड तस्वीरें,कृत्रिम आवाज के जरिए तैयार किए गए भाषण और अन्य भ्रामक सामग्री भी प्रसारित की गई। राघव चड्ढा की ओर से अदालत से अनुरोध किया गया था कि ऐसी सभी सामग्री को हटाने का निर्देश दिया जाए और उनके व्यक्तित्व तथा सार्वजनिक पहचान के दुरुपयोग पर रोक लगाई जाए। उनका तर्क था कि आधुनिक तकनीक के माध्यम से तैयार की जा रही ऐसी सामग्री न केवल उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचा रही है,बल्कि लोगों के बीच भ्रम भी फैला रही है।

इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पहले भी यह संकेत दिया था कि प्रथमदृष्टया यह विवाद किसी व्यक्ति के पर्सनैलिटी राइट्स से अधिक राजनीतिक निर्णय की आलोचना से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। मई महीने में जब अदालत ने अंतरिम राहत पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था,तब भी न्यायमूर्ति सुब्रमोनियम प्रसाद ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा था कि पहली नजर में यहाँ पर्सनैलिटी राइट्स का मामला नहीं बनता। उन्होंने कहा था कि राजनीतिक क्षेत्र में लिए गए निर्णयों की आलोचना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है और केवल इस आधार पर किसी सामग्री पर रोक नहीं लगाई जा सकती कि उससे संबंधित व्यक्ति असहज महसूस करता है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा था कि आलोचना और मानहानि के बीच की सीमा कई बार बेहद पतली होती है। किसी सार्वजनिक व्यक्ति के राजनीतिक निर्णयों पर तीखी टिप्पणी या व्यंग्य लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा हो सकता है,लेकिन यदि कोई सामग्री किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को अनुचित तरीके से नुकसान पहुँचाती है,तब वह मानहानि के दायरे में आ सकती है। अदालत ने संकेत दिया कि इस मामले में भी दोनों पहलुओं को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखना आवश्यक है।

राघव चड्ढा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव नायर ने अदालत में दलील दी कि सोशल मीडिया पर प्रसारित कुछ पोस्ट सामान्य राजनीतिक आलोचना से कहीं आगे बढ़ गए हैं। उन्होंने कहा कि कई तस्वीरें और पोस्ट इस तरह तैयार किए गए हैं,जिनका उद्देश्य केवल राजनीतिक टिप्पणी करना नहीं,बल्कि उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाना है। उन्होंने अदालत के समक्ष कुछ ऐसी तस्वीरों का भी उल्लेख किया,जिनमें प्रधानमंत्री को राघव चड्ढा पर नोटों की बारिश करते हुए दिखाया गया था। इसके अलावा कुछ अन्य मॉर्फ्ड तस्वीरों और संपादित सामग्री का भी हवाला दिया गया,जिन्हें लेकर उनका कहना था कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे से बाहर जाकर किसी व्यक्ति की छवि को नुकसान पहुँचाने का प्रयास है।

राजीव नायर ने अदालत से कहा कि इस प्रकार की सामग्री अशोभनीय है और इससे उनके मुवक्किल की सार्वजनिक प्रतिष्ठा को गंभीर क्षति पहुँची है। उनका तर्क था कि आधुनिक डिजिटल माध्यमों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस्तेमाल से तैयार की गई भ्रामक सामग्री का प्रभाव पारंपरिक मानहानिकारक सामग्री की तुलना में कहीं अधिक व्यापक और गंभीर हो सकता है। इसलिए अदालत को ऐसे मामलों में प्रभावी हस्तक्षेप करना चाहिए।

हालाँकि,अदालत ने इस तर्क को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। न्यायमूर्ति सुब्रमोनियम प्रसाद ने मौखिक रूप से स्पष्ट किया कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह मामला मुख्य रूप से मानहानि से संबंधित प्रतीत होता है, न कि पर्सनैलिटी राइट्स के उल्लंघन से। उन्होंने कहा कि यदि राघव चड्ढा अपनी प्रतिष्ठा को हुए कथित नुकसान के आधार पर कानूनी कार्रवाई करना चाहते हैं,तो वे अपनी याचिका में आवश्यक संशोधन कर मानहानि का दावा प्रस्तुत कर सकते हैं।

अदालत के इस आदेश को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्तियों के मामले में अदालतें अक्सर इस बात पर विशेष ध्यान देती हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक आलोचना और व्यंग्य की पर्याप्त स्वतंत्रता बनी रहे,लेकिन साथ ही किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को अनावश्यक रूप से नुकसान पहुँचाने वाली सामग्री को भी कानूनी जाँच के दायरे में लाया जाए।

डिजिटल युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता,डीपफेक तकनीक और मॉर्फ्ड सामग्री के बढ़ते इस्तेमाल ने न्यायालयों के सामने नए कानूनी प्रश्न भी खड़े किए हैं। ऐसे मामलों में यह तय करना चुनौतीपूर्ण होता है कि कौन-सी सामग्री वैध अभिव्यक्ति की श्रेणी में आती है और कौन-सी किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को अनुचित तरीके से नुकसान पहुँचाने वाली मानी जाएगी। दिल्ली हाई कोर्ट का यह आदेश इसी बदलते डिजिटल परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण कानूनी दृष्टिकोण के रूप में देखा जा रहा है।

फिलहाल अदालत ने केवल पांच कथित मानहानिकारक पोस्ट हटाने का निर्देश देकर सीमित अंतरिम राहत दी है,जबकि बाकी सामग्री पर कोई रोक लगाने से इनकार कर दिया है। साथ ही अदालत ने यह रास्ता भी खुला रखा है कि यदि राघव चड्ढा चाहें तो अपनी याचिका में संशोधन कर इसे मानहानि के मुकदमे के रूप में आगे बढ़ा सकते हैं। अब इस मामले की आगे की कानूनी कार्यवाही पर सभी की नजरें बनी रहेंगी,क्योंकि यह विवाद केवल एक राजनीतिक नेता की प्रतिष्ठा का नहीं,बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता,मानहानि और पर्सनैलिटी राइट्स जैसे महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों से भी जुड़ा हुआ है।