सुप्रीम कोर्ट

राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सुप्रीम कोर्ट पहुँचे,निष्पक्ष जाँच की माँग तेज

नई दिल्ली,9 जुलाई (युआईटीवी)- अयोध्या स्थित श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं और दान राशि के दुरुपयोग के आरोप अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुँच गए हैं। ट्रस्ट के धन के कथित गबन,वित्तीय अनियमितताओं और पारदर्शिता से जुड़े सवालों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है,जिसमें पूरे मामले की निष्पक्ष और समयबद्ध जाँच कराने की माँग की गई है। याचिका में यह भी आग्रह किया गया है कि यदि प्रथम दृष्टया आरोपों में आधार पाया जाता है,तो संबंधित लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर कानूनी कार्रवाई शुरू की जाए।

यह याचिका अधिवक्ता अजय कुमार राय और दिनेश कुमार यादव की ओर से दाखिल की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को देश और विदेश से करोड़ों रुपये का दान प्राप्त हुआ है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि इस धनराशि का उपयोग पूरी पारदर्शिता और निर्धारित नियमों के अनुसार हुआ हो। उनका तर्क है कि यदि धन के उपयोग को लेकर किसी प्रकार के संदेह या अनियमितता के आरोप सामने आए हैं,तो उनकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच कराई जानी चाहिए,ताकि सच्चाई सामने आ सके और जनता का विश्वास कायम रहे।

याचिका में सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया गया है कि कथित वित्तीय गड़बड़ियों की जाँच के लिए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के नेतृत्व में एक विशेष जाँच दल का गठन किया जाए। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि एक स्वतंत्र एजेंसी द्वारा जाँच होने से मामले की निष्पक्षता सुनिश्चित होगी और यह स्पष्ट हो सकेगा कि दान की राशि के उपयोग में किसी प्रकार का गबन,भ्रष्टाचार या वित्तीय अनियमितता हुई है अथवा नहीं।

याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि आरोपों की निष्पक्ष जाँच नहीं होती है,तो भविष्य में धार्मिक ट्रस्टों और सार्वजनिक दान से जुड़े मामलों में पारदर्शिता को लेकर लोगों के मन में संदेह उत्पन्न हो सकता है। इसलिए न्यायालय को इस मामले में हस्तक्षेप कर ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए,जिससे सभी तथ्यों की निष्पक्ष जाँच हो सके।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत से यह भी माँग की है कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट और उत्तर प्रदेश सरकार को ट्रस्ट की आय,व्यय और संपत्तियों की निगरानी के लिए मजबूत ऑडिट प्रणाली विकसित करने के निर्देश दिए जाएँ। उनका कहना है कि नियमित वित्तीय ऑडिट और प्रभावी निगरानी व्यवस्था से भविष्य में इस प्रकार के विवादों और शिकायतों की संभावना काफी हद तक कम की जा सकती है।

याचिका में जाँच से जुड़े साक्ष्यों की सुरक्षा को भी महत्वपूर्ण मुद्दा बनाया गया है। अदालत से आग्रह किया गया है कि जाँच पूरी होने तक मामले से जुड़े सभी महत्वपूर्ण दस्तावेजों और रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया जाए। इनमें बैंक खातों का पूरा विवरण, दान रजिस्टर,ऑडिट रिपोर्ट,कंप्यूटर डेटा,डिजिटल रिकॉर्ड,सीसीटीवी फुटेज तथा अन्य सभी संबंधित अभिलेख शामिल हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यदि इन दस्तावेजों को सुरक्षित नहीं रखा गया,तो जाँच प्रभावित हो सकती है और महत्वपूर्ण साक्ष्यों के नष्ट होने का खतरा रहेगा।

इसके साथ ही याचिका में अदालत से यह भी अनुरोध किया गया है कि किसी भी व्यक्ति या संस्था को मामले से जुड़े रिकॉर्ड,दस्तावेजों या अन्य साक्ष्यों को हटाने,नष्ट करने या उनमें किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ करने से रोका जाए। उनका कहना है कि निष्पक्ष जाँच के लिए सभी मूल अभिलेखों का सुरक्षित रहना आवश्यक है और अदालत को इस संबंध में स्पष्ट निर्देश जारी करने चाहिए।

इस पूरे मामले में पहले से कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आ चुके हैं। कथित वित्तीय अनियमितताओं को लेकर गठित विशेष जाँच दल की रिपोर्ट सार्वजनिक की जा चुकी है। रिपोर्ट सामने आने के बाद मामले ने और अधिक चर्चा बटोरी। इसके बाद श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की बैठक भी आयोजित की गई,जिसमें संगठनात्मक और प्रशासनिक स्तर पर कई मुद्दों पर विचार किया गया। बैठक के बाद ट्रस्ट से जुड़े चंपत राय और अनिल मिश्रा के इस्तीफे की जानकारी भी सामने आई,जिससे इस पूरे मामले को लेकर चर्चाएं और तेज हो गईं।

दूसरी ओर,अयोध्या पुलिस भी मामले की जाँच कर रही है। पुलिस ने जाँच के दौरान कई लोगों को गिरफ्तार किया है और उनसे पूछताछ जारी है। अधिकारियों का कहना है कि उपलब्ध साक्ष्यों और शिकायतों के आधार पर जाँच आगे बढ़ाई जा रही है तथा सभी पहलुओं की गहन पड़ताल की जा रही है। हालाँकि,अभी तक पुलिस की ओर से जाँच पूरी होने संबंधी कोई अंतिम निष्कर्ष सार्वजनिक नहीं किया गया है।

इस बीच अयोध्या के अधिवक्ताओं में भी नाराजगी देखने को मिल रही है। उनका आरोप है कि उनके द्वारा दी गई शिकायतों पर अब तक प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है। अधिवक्ताओं का कहना है कि यदि शिकायतों पर समय रहते कानूनी कार्रवाई नहीं होती है,तो इससे न्याय प्रक्रिया पर सवाल उठ सकते हैं। उन्होंने प्रशासन से जल्द से जल्द प्राथमिकी दर्ज कर निष्पक्ष जाँच शुरू करने की माँग की है।

वकीलों ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि उनकी शिकायतों पर प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई,तो वे व्यापक आंदोलन शुरू करने के लिए बाध्य होंगे। उनका कहना है कि यह केवल किसी एक व्यक्ति या संस्था का मामला नहीं है,बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और सार्वजनिक धन से जुड़ा विषय है। इसलिए इसकी जाँच पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ होनी चाहिए।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। यदि अदालत याचिका पर सुनवाई स्वीकार करती है,तो वह उपलब्ध तथ्यों, दस्तावेजों और संबंधित पक्षों की दलीलों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय कर सकती है। अदालत यह भी विचार कर सकती है कि क्या स्वतंत्र जाँच एजेंसी की आवश्यकता है अथवा मौजूदा जाँच प्रक्रिया पर्याप्त है।

फिलहाल यह मामला न्यायिक विचाराधीन होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं कि वह इस याचिका पर क्या रुख अपनाता है। अदालत के आगामी निर्णय से यह स्पष्ट होगा कि कथित वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों की जाँच किस प्रकार आगे बढ़ेगी और क्या इस मामले में किसी स्वतंत्र एजेंसी द्वारा जाँच कराने के निर्देश दिए जाएँगे। साथ ही यह भी तय होगा कि भविष्य में धार्मिक ट्रस्टों के वित्तीय प्रबंधन और पारदर्शिता को लेकर किस प्रकार के मानक विकसित किए जाएँगे।