अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

कट्टर वामपंथी राजनीतिक आतंकवाद पर वैश्विक अभियान की अमेरिका की अपील,भारत समेत 67 देशों ने मंत्रीस्तरीय बैठक में लिया हिस्सा

वॉशिंगटन,17 जुलाई (युआईटीवी)- अमेरिका ने वैश्विक सुरक्षा के मुद्दे पर एक नई पहल करते हुए दुनिया के देशों से कट्टर वामपंथी राजनीतिक आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त अंतर्राष्ट्रीय अभियान चलाने की अपील की है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इस विषय पर आयोजित एक उच्चस्तरीय मंत्रीस्तरीय बैठक में कहा कि वैश्विक आतंकवाद का स्वरूप लगातार बदल रहा है और अब केवल पारंपरिक आतंकी संगठनों पर ध्यान केंद्रित करना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकारों को उन संगठित नेटवर्कों के खिलाफ भी एकजुट होकर कार्रवाई करनी होगी, जो राजनीतिक हिंसा और वैचारिक उग्रवाद के माध्यम से लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को चुनौती दे रहे हैं। इस महत्वपूर्ण बैठक में भारत सहित 67 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया,जिससे यह स्पष्ट संकेत मिला कि वैश्विक स्तर पर आतंकवाद और राजनीतिक हिंसा से जुड़े नए खतरों पर व्यापक चर्चा की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार,बैठक में भारत,ऑस्ट्रेलिया,जापान,इजरायल,ब्रिटेन, फ्रांस,जर्मनी,इटली,कनाडा,इंडोनेशिया,मलेशिया,फिलीपींस,दक्षिण कोरिया सहित यूरोप और लैटिन अमेरिका के अनेक देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। इस दौरान राजनीतिक नेताओं,कानून प्रवर्तन एजेंसियों के अधिकारियों और सुरक्षा विशेषज्ञों ने बदलते वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य, राजनीतिक हिंसा के नए स्वरूप तथा अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को और मजबूत बनाने के उपायों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया। बैठक का उद्देश्य केवल मौजूदा चुनौतियों का आकलन करना नहीं था,बल्कि भविष्य में साझा रणनीति विकसित करने के लिए विभिन्न देशों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना भी था।

विदेश विभाग में आयोजित इस बैठक को संबोधित करते हुए मार्को रुबियो ने कहा कि पिछले दो दशकों में दुनिया ने कट्टर इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। उन्होंने कहा कि 11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों के बाद अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने जिस प्रकार समन्वित रणनीति अपनाई,उसके कारण इस्लामिक स्टेट जैसे संगठनों की क्षमताओं को काफी हद तक कमजोर किया गया। उन्होंने कहा कि अमेरिका और यूरोप में जिहादी आतंकवादी हमलों की संख्या में भी उल्लेखनीय कमी आई है,जो अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का परिणाम है।

हालाँकि,रुबियो ने यह भी कहा कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक रणनीति में एक महत्वपूर्ण कमी बनी रही है। उनके अनुसार,राजनीतिक वामपंथ से जुड़े उग्रवादी संगठनों और हिंसक नेटवर्कों के खतरे को लंबे समय तक पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया गया। उन्होंने कहा कि आतंकवाद विरोधी नीतियों में यह एक प्रकार का “ब्लाइंड स्पॉट” रहा है, जिसके कारण इस दिशा में प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी। उन्होंने कहा कि आज भी कई लोग कट्टर वामपंथी राजनीतिक आतंकवाद को वास्तविक खतरा मानने से इनकार करते हैं और इसे केवल राजनीतिक बहस या वैचारिक मतभेद के रूप में देखते हैं।

रुबियो ने अपने संबोधन में कहा कि प्रत्येक सरकार की पहली जिम्मेदारी अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है और यह जिम्मेदारी किसी भी राजनीतिक विचारधारा या वैचारिक मतभेद से ऊपर होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि कोई संगठन राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हिंसा,डर और अस्थिरता का सहारा लेता है,तो उससे उसी गंभीरता के साथ निपटा जाना चाहिए,जिस प्रकार अन्य आतंकवादी संगठनों से निपटा जाता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आतंकवाद का मूल्यांकन किसी विशेष विचारधारा के आधार पर नहीं,बल्कि उसके हिंसक स्वरूप और समाज पर पड़ने वाले प्रभाव के आधार पर किया जाना चाहिए।

बैठक के दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि दुनिया की सुरक्षा चुनौतियाँ तेजी से बदल रही हैं। उनके अनुसार,आज कई ऐसे अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क सक्रिय हैं,जिनके सदस्य विभिन्न देशों में रहकर एक-दूसरे से संपर्क बनाए रखते हैं,प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं,यात्रा करते हैं और साझा उद्देश्यों के लिए समन्वित कार्रवाई करते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे संगठनों की गतिविधियाँ सीमाओं तक सीमित नहीं रहतीं,बल्कि वे वैश्विक स्तर पर जुड़े हुए हैं। इसलिए उनके खिलाफ किसी एक देश की कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी और इसके लिए बहुपक्षीय सहयोग अनिवार्य है।

मार्को रुबियो ने बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने राष्ट्रीय सुरक्षा राष्ट्रपति ज्ञापन संख्या-7 के तहत एंटीफा से जुड़े नेटवर्कों और उनके सहयोगियों की गतिविधियों की जाँच तथा उन्हें रोकने के लिए विशेष कदम उठाए हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिकी विदेश विभाग ने चार हिंसक वामपंथी उग्रवादी संगठनों को विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किया है। इसके अलावा उनकी आर्थिक सहायता रोकने के लिए सूचना देने वालों को इनाम देने की व्यवस्था भी की गई है। साथ ही अंतर्राष्ट्रीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ नए सहयोग कार्यक्रम शुरू किए गए हैं,ताकि इन नेटवर्कों की गतिविधियों पर प्रभावी निगरानी रखी जा सके।

उन्होंने स्पष्ट किया कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं हो सकती। इसके लिए खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान,वित्तीय निगरानी,कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच समन्वय और अंतर्राष्ट्रीय कानूनी सहयोग जैसे अनेक उपायों को समान महत्व देना होगा। रुबियो ने कहा कि आतंकवादी संगठनों की आर्थिक गतिविधियों पर रोक लगाना और उनके वित्तीय नेटवर्क को समाप्त करना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि उनके हिंसक अभियानों को रोकना। उन्होंने कहा कि यदि दुनिया के लोकतांत्रिक देश मिलकर साझा रणनीति अपनाते हैं,तो ऐसे नेटवर्कों को क्रमबद्ध तरीके से समाप्त किया जा सकता है।

इस उच्चस्तरीय बैठक में व्हाइट हाउस के उप प्रमुख स्टाफ स्टीफन मिलर और अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने भी भाग लिया। दोनों नेताओं ने आतंकवाद के खिलाफ बहुआयामी रणनीति की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि केवल सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी,बल्कि आर्थिक प्रतिबंधों, वित्तीय नियंत्रण और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को भी समान महत्व देना होगा। स्कॉट बेसेंट ने कहा कि अमेरिकी वित्त विभाग आतंकवादी संगठनों से जुड़े वित्तीय नेटवर्क की पहचान करने और उन्हें प्रतिबंधों के माध्यम से कमजोर करने के प्रयास जारी रखेगा। उन्होंने कहा कि आतंकवादी गतिविधियों को आर्थिक संसाधनों से वंचित करना उनकी क्षमताओं को सीमित करने का प्रभावी तरीका है।

बैठक में भाग लेने वाले विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने भी बदलते वैश्विक सुरक्षा वातावरण पर अपने विचार साझा किए। कानून प्रवर्तन एजेंसियों के अधिकारियों ने सीमा पार सहयोग,डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से फैलने वाले उग्रवादी प्रचार,साइबर नेटवर्क और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय लेनदेन की निगरानी जैसे विषयों पर चर्चा की। सुरक्षा विशेषज्ञों ने इस बात पर भी जोर दिया कि आधुनिक तकनीक का उपयोग आतंकवादी संगठनों द्वारा नए तरीके से किया जा रहा है,इसलिए सरकारों को अपनी सुरक्षा रणनीतियों को लगातार अद्यतन करना होगा।

भारत की इस बैठक में भागीदारी को भी विशेष महत्व दिया जा रहा है। भारत और अमेरिका के बीच आतंकवाद विरोधी सहयोग लंबे समय से दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी का महत्वपूर्ण आधार रहा है। वर्ष 2001 के बाद दोनों देशों ने खुफिया जानकारी साझा करने, कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच सहयोग बढ़ाने,सीमा पार आतंकवाद से निपटने और सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के लिए कई संयुक्त पहल की हैं। समय-समय पर दोनों देशों ने आतंकवादी संगठनों की फंडिंग रोकने,साइबर सुरक्षा बढ़ाने और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ साझा रुख अपनाने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।

भारत लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद का सामना करता रहा है और उसने लगातार यह रुख अपनाया है कि आतंकवाद को किसी भी रूप या विचारधारा के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में नहीं बाँटा जाना चाहिए। भारत का मानना रहा है कि आतंकवाद चाहे किसी भी उद्देश्य या वैचारिक पृष्ठभूमि से प्रेरित हो,उससे समान कठोरता के साथ निपटना आवश्यक है। यही कारण है कि भारत विभिन्न बहुपक्षीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ व्यापक वैश्विक सहयोग का समर्थन करता रहा है।

भारत और अमेरिका के बीच हाल के वर्षों में सुरक्षा सहयोग कई क्षेत्रों तक विस्तारित हुआ है। दोनों देशों ने संयुक्त कार्य समूहों के माध्यम से खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान, साइबर सुरक्षा,आतंकवाद की वित्तीय सहायता रोकने,सीमा सुरक्षा और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया है। इसके अलावा दोनों देश संयुक्त सैन्य अभ्यासों और रणनीतिक संवादों के माध्यम से भी अपनी सुरक्षा साझेदारी को मजबूत कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आतंकवाद का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। डिजिटल माध्यमों,सोशल मीडिया और अंतर्राष्ट्रीय संचार नेटवर्क के कारण विभिन्न उग्रवादी समूहों के बीच संपर्क पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हो गया है। ऐसे में केवल राष्ट्रीय स्तर पर बनाई गई रणनीतियाँ पर्याप्त नहीं होंगी। देशों को खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान,वित्तीय निगरानी,साइबर सुरक्षा और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच वास्तविक समय में सहयोग बढ़ाना होगा। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए इस मंत्रीस्तरीय बैठक का आयोजन किया गया।

हालाँकि,आतंकवाद की परिभाषा और विभिन्न संगठनों के वर्गीकरण को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग दृष्टिकोण भी मौजूद हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी संगठन को आतंकवादी घोषित करने की प्रक्रिया तथ्यों,साक्ष्यों और कानूनी मानकों पर आधारित होनी चाहिए ताकि वैश्विक सहयोग की विश्वसनीयता बनी रहे। इसी कारण ऐसे मुद्दों पर विभिन्न देशों के बीच निरंतर संवाद और कानूनी समन्वय भी आवश्यक माना जाता है।

अमेरिका द्वारा आयोजित यह बैठक इस बात का संकेत देती है कि वैश्विक सुरक्षा एजेंडा अब पारंपरिक आतंकवाद से आगे बढ़कर राजनीतिक हिंसा,अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क,साइबर गतिविधियों और वित्तीय तंत्र जैसे नए आयामों को भी शामिल कर रहा है। भारत सहित 67 देशों की भागीदारी ने यह स्पष्ट किया है कि बदलती सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस बैठक में हुई चर्चाओं और प्रस्तावित पहलों को विभिन्न देश किस प्रकार अपनी नीतियों और सहयोग तंत्र में शामिल करते हैं तथा वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ साझा प्रयासों को किस दिशा में आगे बढ़ाते हैं।