नई दिल्ली,4 अगस्त (युआईटीवी)- संसद के मानसून सत्र के दौरान जारी गतिरोध मंगलवार को भी खत्म नहीं हो सका। लोकसभा की कार्यवाही शुरू होने के कुछ ही मिनटों के भीतर विपक्षी सदस्यों के जोरदार हंगामे और नारेबाजी के कारण सदन की कार्यवाही दोपहर 2 बजे तक स्थगित करनी पड़ी। विपक्ष लगातार जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई और कथित फायरिंग की घटना को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से सदन में जवाब देने की माँग कर रहा है। इसी मुद्दे पर विपक्ष ने प्रश्नकाल के दौरान भी अपना विरोध जारी रखा,जिसके चलते सदन की कार्यवाही सामान्य रूप से नहीं चल सकी।
मंगलवार सुबह जैसे ही लोकसभा की कार्यवाही शुरू हुई,विपक्षी सांसद अपनी सीटों से उठकर नारेबाजी करने लगे। उनका कहना था कि जंतर-मंतर पर हुए घटनाक्रम को लेकर सरकार को संसद के भीतर जवाब देना चाहिए और गृह मंत्री स्वयं सदन में उपस्थित होकर स्थिति स्पष्ट करें। विपक्ष के इस विरोध के कारण सदन में लगातार शोर-शराबा होता रहा, जिससे प्रश्नकाल की कार्यवाही प्रभावित हुई।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कई बार विपक्षी सांसदों से अपनी-अपनी सीटों पर लौटने और सदन की गरिमा बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि प्रश्नकाल लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसमें जनता से जुड़े अनेक अहम मुद्दों पर चर्चा होती है। उन्होंने सांसदों से आग्रह किया कि वे प्रश्नकाल को बाधित न करें और सदन की कार्यवाही को सुचारु रूप से चलने दें। हालाँकि,विपक्षी सदस्यों ने अपनी मांगों पर अड़े रहते हुए नारेबाजी जारी रखी। लगातार बढ़ते शोर-शराबे के बीच अध्यक्ष को अंततः सदन की कार्यवाही दोपहर 2 बजे तक स्थगित करनी पड़ी।
मानसून सत्र के दौरान यह लगातार कई अवसर है,जब विपक्ष के विरोध के कारण लोकसभा की कार्यवाही बाधित हुई है। इस सत्र में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा यानी नीट पेपर लीक मामले के साथ-साथ 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनकर सामने आई है। विपक्ष का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों के साथ कठोर व्यवहार किया गया और पुलिस की कार्रवाई पर सरकार को संसद में जवाब देना चाहिए। इसी माँग को लेकर विपक्ष लगातार सदन के भीतर विरोध दर्ज करा रहा है।
इस बीच,सोमवार को भी लोकसभा का माहौल काफी हंगामेदार रहा। विपक्षी सांसदों के विरोध और नारेबाजी के बीच सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026 का स्थान लेने वाला विधेयक ध्वनि मत से पारित कर दिया गया। केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने सदन में यह विधेयक पेश किया। विधेयक पेश किए जाने के दौरान भी विपक्षी सदस्य जंतर-मंतर की घटना को लेकर गृह मंत्री अमित शाह से जवाब की माँग करते हुए लगातार नारेबाजी करते रहे।
सोमवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे कृष्णा प्रसाद टेनेटी ने भी कई बार विपक्षी सांसदों से शांत रहने और सदन को व्यवस्थित ढंग से चलने देने की अपील की। उन्होंने कहा कि संसद में विधायी कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं और सदस्यों को अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए चर्चा में भाग लेना चाहिए। इसके बावजूद विपक्ष का विरोध जारी रहा और सदन में लगातार शोर-शराबा होता रहा। अंततः हंगामे के बीच ही विधेयक को ध्वनि मत से पारित कर दिया गया।
सरकार का कहना है कि इस विधेयक का उद्देश्य देश की सर्वोच्च अदालत में लंबित मामलों के बढ़ते बोझ को कम करना और न्यायिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना है। पिछले कुछ वर्षों में सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ी है,जिसके कारण मामलों के निपटारे में अधिक समय लग रहा है। न्यायपालिका पर बढ़ते कार्यभार को देखते हुए सरकार ने न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का निर्णय लिया है,ताकि मामलों का तेजी से निस्तारण हो सके और आम नागरिकों को समय पर न्याय मिल सके।
प्रस्तावित कानून के अनुसार,भारत के मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 33 से बढ़ाकर 37 कर दी जाएगी। इसके परिणामस्वरूप शीर्ष अदालत में कुल न्यायाधीशों की संख्या 34 से बढ़कर 38 हो जाएगी। सरकार का मानना है कि अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति से संविधान पीठों के गठन में सुविधा होगी,महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई तेजी से हो सकेगी और लंबित मामलों का बोझ कम करने में मदद मिलेगी।
यह विधेयक उस अध्यादेश का स्थान लेगा जिसे केंद्र सरकार ने मई 2026 में जारी किया था। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार,अध्यादेश को कानून का रूप देने के लिए संसद की मंजूरी आवश्यक होती है। इसी प्रक्रिया के तहत सरकार ने संसद में यह विधेयक पेश किया,जिसे लोकसभा ने ध्वनि मत से पारित कर दिया।
दूसरी ओर, विपक्ष का कहना है कि सरकार संसद के भीतर उठाए जा रहे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा से बच रही है। विपक्षी दलों का आरोप है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई गंभीर विषय है और इस पर विस्तृत चर्चा कराई जानी चाहिए। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले लोगों के साथ हुई घटनाओं पर सरकार को सदन के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। इसी कारण विपक्ष गृह मंत्री के बयान की लगातार माँग कर रहा है।
संसद का मानसून सत्र अब तक कई बार हंगामे की भेंट चढ़ चुका है। सत्ता पक्ष जहाँ विधायी कार्यों को आगे बढ़ाने पर जोर दे रहा है,वहीं विपक्ष विभिन्न मुद्दों पर सरकार को घेरने की रणनीति अपनाए हुए है। ऐसे में सदन की कार्यवाही बार-बार बाधित होने से महत्वपूर्ण विधायी और संसदीय कार्य प्रभावित हो रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध समाप्त होता है या नहीं तथा संसद का मानसून सत्र सुचारु रूप से चल पाता है या फिर राजनीतिक टकराव के कारण कार्यवाही लगातार बाधित होती रहती है।
