नई दिल्ली,5 अगस्त (युआईटीवी)- सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स पर बढ़ते साइबर अपराध,ऑनलाइन सुरक्षा और आपत्तिजनक सामग्री के प्रसार को लेकर केंद्र सरकार अब अधिक सक्रिय रुख अपनाती नजर आ रही है। इसी कड़ी में केंद्र सरकार 5 अगस्त को मेटा के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक करने की तैयारी में है। इस बैठक में बाल यौन शोषण सामग्री (सीएसएएम) की रोकथाम,व्हाट्सएप के प्रस्तावित यूजरनेम फीचर,कंटेंट मॉडरेशन की प्रक्रिया,वेरिफाइड और हाई-प्रोफाइल अकाउंट्स से जुड़े पोस्ट हटाने की नीति तथा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही जैसे कई अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा होने की संभावना है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा के प्रति अधिक जिम्मेदार बनें और उनकी नीतियाँ पारदर्शी तथा प्रभावी हों।
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव एस. कृष्णन ने मंगलवार को संकेत दिया कि सरकार पिछले कुछ समय से उठ रही विभिन्न चिंताओं के संबंध में मेटा से विस्तृत स्पष्टीकरण चाहती है। उन्होंने यह जानकारी ‘वॉयस ऑफ इंडिया’ नामक स्वतंत्र मल्टीमॉडल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मूल्यांकन प्लेटफॉर्म के शुभारंभ के अवसर पर दी। यह प्लेटफॉर्म एआई4भारत और जोश टॉक्स एआई द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया गया है। इस दौरान उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार का उद्देश्य केवल सवाल उठाना नहीं है,बल्कि यह समझना भी है कि मेटा ने अब तक इन संवेदनशील मुद्दों पर क्या कदम उठाए हैं और उनकी प्रभावशीलता कितनी है।
बैठक का सबसे महत्वपूर्ण विषय बाल यौन शोषण सामग्री यानी सीएसएएम को लेकर रहेगा। इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इस प्रकार की आपत्तिजनक सामग्री का प्रसार लंबे समय से वैश्विक चिंता का विषय रहा है। भारत सरकार भी इस मामले को अत्यंत गंभीरता से देख रही है। सरकार यह जानना चाहती है कि मेटा ने अपने विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर ऐसी सामग्री की पहचान करने,उसे हटाने और उसके प्रसार को रोकने के लिए कौन-कौन से तकनीकी और प्रशासनिक उपाय अपनाए हैं। साथ ही यह भी पूछा जाएगा कि इन उपायों से अब तक कितनी सफलता मिली है और भविष्य में कंपनी इस दिशा में क्या अतिरिक्त कदम उठाने की योजना बना रही है।
सरकार का मानना है कि केवल आपत्तिजनक सामग्री हटाना पर्याप्त नहीं है,बल्कि उसके प्रसार को शुरुआती स्तर पर रोकना और ऐसे नेटवर्क की पहचान करना भी आवश्यक है, जो इस प्रकार की सामग्री साझा करते हैं। डिजिटल सुरक्षा विशेषज्ञ भी लंबे समय से इस बात पर जोर देते रहे हैं कि सोशल मीडिया कंपनियों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता,मशीन लर्निंग और मानव निगरानी के बेहतर संयोजन के माध्यम से ऐसी सामग्री पर तेजी से कार्रवाई करनी चाहिए। इसी संदर्भ में सरकार मेटा की मौजूदा व्यवस्था का विस्तृत आकलन करना चाहती है।
बैठक में व्हाट्सएप के प्रस्तावित यूजरनेम फीचर को लेकर भी गंभीर चर्चा होने की संभावना है। सरकार पहले ही व्हाट्सएप को यह स्पष्ट कर चुकी है कि जब तक पहचान की चोरी,ऑनलाइन धोखाधड़ी और साइबर अपराध से जुड़े संभावित जोखिमों का प्रभावी समाधान नहीं किया जाता,तब तक इस फीचर को लागू नहीं किया जाना चाहिए। सरकार का मानना है कि यदि यूजरनेम प्रणाली पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना लागू की गई,तो साइबर अपराधियों के लिए लोगों की पहचान का दुरुपयोग करना आसान हो सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार,यदि कोई व्यक्ति किसी प्रसिद्ध नाम या किसी सामान्य व्यक्ति के समान यूजरनेम बनाकर लोगों से संपर्क करता है,तो इससे फर्जीवाड़ा,वित्तीय धोखाधड़ी और पहचान की चोरी जैसी घटनाएँ बढ़ सकती हैं। ऐसे मामलों में आम उपयोगकर्ता आसानी से भ्रमित हो सकते हैं। इसलिए सरकार चाहती है कि व्हाट्सएप पहले ऐसी तकनीकी व्यवस्था विकसित करे,जिससे किसी भी प्रकार की पहचान संबंधी धोखाधड़ी की संभावना न्यूनतम हो सके।
कंटेंट मॉडरेशन की प्रक्रिया भी बैठक का एक प्रमुख विषय होगी। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर हर दिन बड़ी मात्रा में सामग्री प्रकाशित होती है,जिनमें से कुछ पोस्ट प्लेटफॉर्म की नीतियों के उल्लंघन के आधार पर हटाई जाती हैं। हालाँकि,कई बार ऐसी शिकायतें सामने आती हैं कि कुछ वैध या सार्वजनिक महत्व की सामग्री भी गलती से हटा दी जाती है। सरकार इसी प्रक्रिया को लेकर मेटा से विस्तृत जानकारी चाहती है।
विशेष रूप से वेरिफाइड और प्रमुख सार्वजनिक हस्तियों के अकाउंट्स से जुड़े पोस्ट हटाने की प्रक्रिया पर सरकार का ध्यान केंद्रित रहेगा। सरकार का मानना है कि किसी भी वेरिफाइड उपयोगकर्ता की सामग्री हटाने से पहले पर्याप्त समीक्षा और बहुस्तरीय जाँच होनी चाहिए। यदि स्वचालित प्रणाली किसी पोस्ट को हटाती है,तो उसके बाद मानवीय स्तर पर भी उसकी समीक्षा की जानी चाहिए,ताकि तकनीकी त्रुटियों के कारण महत्वपूर्ण या सार्वजनिक हित से जुड़ी सामग्री प्रभावित न हो।
सरकारी अधिकारियों के अनुसार,बैठक में मेटा से यह भी पूछा जा सकता है कि उसकी आंतरिक कंटेंट मॉडरेशन प्रणाली किस प्रकार काम करती है,किन परिस्थितियों में पोस्ट हटाए जाते हैं,स्वचालित और मानवीय समीक्षा के बीच क्या संतुलन है तथा किन क्षेत्रों में कंपनी को तकनीकी या संचालन संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सरकार यह भी जानना चाहती है कि भविष्य में ऐसी त्रुटियों को रोकने के लिए कंपनी किन सुधारात्मक कदमों पर काम कर रही है।
यह बैठक ऐसे समय में आयोजित होने जा रही है,जब हाल के दिनों में मेटा की कंटेंट मॉडरेशन नीति को लेकर सरकार और कंपनी के बीच मतभेद सामने आए हैं। कुछ दिन पहले सरकार ने मेटा के ग्लोबल अफेयर्स प्रमुख जोएल कपलान को तलब कर कंपनी की नीतियों पर स्पष्टीकरण माँगा था। सरकार ने यह स्पष्ट किया था कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को पारदर्शिता और जवाबदेही के उच्च मानकों का पालन करना चाहिए, विशेषकर तब जब मामला सार्वजनिक महत्व की जानकारी से जुड़ा हो।
विवाद की शुरुआत उस समय हुई,जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक सोशल मीडिया पोस्ट प्लेटफॉर्म से हटा दी गई थी। उस पोस्ट में उन्होंने परीक्षा प्रश्नपत्र लीक की घटनाओं के विरोध में प्रदर्शन कर रहे छात्रों को संबोधित करते हुए सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदमों की जानकारी दी थी। पोस्ट हटने के बाद इस मुद्दे ने व्यापक चर्चा को जन्म दिया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की स्वचालित मॉडरेशन प्रणाली पर सवाल उठने लगे।
बाद में मेटा ने इस घटना पर सफाई देते हुए कहा कि पोस्ट को उसकी स्वचालित कंटेंट मॉडरेशन प्रणाली में आई तकनीकी त्रुटि के कारण हटाया गया था। कंपनी ने इस गलती के लिए खेद व्यक्त किया और स्वीकार किया कि पोस्ट को अनजाने में हटाया गया। हालाँकि, इस घटना ने यह बहस तेज कर दी कि क्या केवल कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित मॉडरेशन प्रणाली पर निर्भर रहना पर्याप्त है या संवेदनशील मामलों में मानव समीक्षा को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए।
पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की भूमिका लगातार बढ़ी है। सूचना के प्रसार,संवाद और सार्वजनिक विमर्श के प्रमुख माध्यम बनने के साथ-साथ इन प्लेटफॉर्म्स पर फर्जी खबरों,साइबर अपराध,ऑनलाइन ठगी,पहचान की चोरी,घृणास्पद सामग्री और आपत्तिजनक पोस्ट जैसी चुनौतियाँ भी बढ़ी हैं। ऐसे में सरकार का मानना है कि बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों को केवल तकनीकी सेवा प्रदाता के रूप में नहीं,बल्कि जिम्मेदार डिजिटल मंच के रूप में भी अपनी भूमिका निभानी चाहिए।
भारत सरकार लगातार इस दिशा में प्रयास कर रही है कि सोशल मीडिया कंपनियां देश के कानूनों और नियामकीय व्यवस्थाओं का पूरी तरह पालन करें। सरकार का जोर इस बात पर है कि उपयोगकर्ताओं की गोपनीयता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सुरक्षा,पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत किया जाए। इसके लिए समय-समय पर कंपनियों के साथ संवाद,समीक्षा बैठकें और आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए जाते रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल दुनिया में तेजी से बदलती तकनीक के साथ सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ भी लगातार विकसित हो रही हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियाँ जहाँ बड़ी मात्रा में सामग्री की निगरानी करने में सक्षम हैं,वहीं कई बार तकनीकी त्रुटियों के कारण गलत निर्णय भी सामने आ सकते हैं। इसलिए भविष्य की कंटेंट मॉडरेशन व्यवस्था में उन्नत तकनीक के साथ मानवीय समीक्षा,पारदर्शी अपील प्रक्रिया और स्पष्ट जवाबदेही का संतुलन आवश्यक होगा।
5 अगस्त को प्रस्तावित बैठक को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है। यह केवल एक कंपनी और सरकार के बीच होने वाली औपचारिक बैठक नहीं होगी,बल्कि भारत में डिजिटल सुरक्षा,सोशल मीडिया नियमन और ऑनलाइन जवाबदेही से जुड़े भविष्य के दृष्टिकोण को भी दिशा दे सकती है। यदि इस बैठक में सरकार की प्रमुख चिंताओं पर सकारात्मक चर्चा होती है और मेटा अपनी नीतियों तथा तकनीकी प्रणालियों में आवश्यक सुधारों का भरोसा देता है,तो इससे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा और विश्वास दोनों को मजबूती मिल सकती है। वहीं यह बैठक अन्य सोशल मीडिया कंपनियों के लिए भी एक स्पष्ट संदेश होगी कि भारत में संचालन करते समय उन्हें सुरक्षा,पारदर्शिता और कानूनों के अनुपालन को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।
