वाशिंगटन,8 अगस्त (युआईटीवी)- अमेरिका में एच-1बी वीजा और ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया को लेकर एक बार फिर नई बहस शुरू हो गई है। रिपब्लिकन सीनेटर एरिक श्मिट ने अमेरिकी श्रम विभाग से स्थायी रोजगार प्रमाणन यानी पीईआरएम प्रक्रिया में बड़े बदलाव करने की माँग की है। उनका कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में सुधार की जरूरत है,ताकि अमेरिकी नागरिकों को नौकरियों में प्राथमिकता मिले और विदेशी श्रमिकों से जुड़े कार्यक्रमों के कथित दुरुपयोग को रोका जा सके। प्रस्तावित बदलावों का असर खास तौर पर उन भारतीय टेक प्रोफेशनल्स पर पड़ सकता है,जो एच-1बी वीजा के बाद नियोक्ता द्वारा प्रायोजित ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया में प्रवेश करते हैं।
सीनेटर एरिक श्मिट ने कार्यवाहक श्रम सचिव कीथ सॉन्डरलिंग को पत्र लिखकर पीईआरएम यानी प्रोग्राम इलेक्ट्रॉनिक रिव्यू मैनेजमेंट प्रक्रिया को आधुनिक बनाने की माँग की है। अमेरिका में नियोक्ता आमतौर पर किसी विदेशी कर्मचारी को स्थायी नौकरी के लिए ग्रीन कार्ड दिलाने की प्रक्रिया में पीईआरएम को शुरुआती महत्वपूर्ण चरण के रूप में इस्तेमाल करते हैं। इस प्रक्रिया में नियोक्ता को यह साबित करना होता है कि संबंधित पद के लिए पर्याप्त योग्य अमेरिकी कर्मचारी उपलब्ध नहीं था और विदेशी कर्मचारी को नियुक्त करने से अमेरिकी श्रम बाजार पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
एरिक श्मिट ने आरोप लगाया है कि पीईआरएम और एच-1बी कार्यक्रमों का दुरुपयोग करके कुछ कंपनियाँ अमेरिकी कर्मचारियों की जगह कम लागत वाले विदेशी श्रमिकों को नियुक्त कर सकती हैं। उन्होंने श्रम विभाग से इस कथित दुरुपयोग को रोकने और इन कार्यक्रमों के मूल उद्देश्य को बहाल करने के लिए नियमों में बदलाव करने को कहा है। हालाँकि,उनके पत्र में भारत का सीधे तौर पर उल्लेख नहीं किया गया है और न ही एच-1बी या ग्रीन कार्ड के मौजूदा नियमों को तत्काल बदलने या किसी वीजा को रद्द करने का प्रस्ताव रखा गया है।
सीनेटर ने मुख्य रूप से श्रम विभाग से पीईआरएम प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले भर्ती दस्तावेजों को अधिक सख्त बनाने,ऑडिट की व्यवस्था मजबूत करने और संदिग्ध धोखाधड़ी की जाँच से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करने की माँग की है। इसके अलावा उन्होंने पीईआरएम आवेदकों के पूर्व ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग और एच-1बी वीजा के इस्तेमाल से संबंधित आँकड़े भी सार्वजनिक करने का सुझाव दिया है। उनका मानना है कि अधिक पारदर्शिता और सख्त निगरानी से यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि कहीं विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए भर्ती प्रक्रिया केवल औपचारिकता बनकर तो नहीं रह गई है।
भारतीय पेशेवरों के लिए यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका के एच-1बी कार्यक्रम में भारतीय नागरिकों की बड़ी हिस्सेदारी है। अमेरिकी नागरिकता और आव्रजन सेवा की रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2025 में स्वीकृत सभी एच-1बी याचिकाओं में लगभग 70 प्रतिशत भारतीय नागरिकों से संबंधित थीं। बड़ी संख्या में भारतीय छात्र पहले छात्र वीजा के जरिए अमेरिका पहुँचते हैं और इसके बाद ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग के माध्यम से काम करने का अवसर प्राप्त करते हैं। आगे चलकर कई लोग नियोक्ता के माध्यम से एच-1बी वीजा हासिल करते हैं और फिर स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड के लिए प्रायोजन की प्रक्रिया में प्रवेश करते हैं।
यही वजह है कि पीईआरएम प्रक्रिया में किसी भी बड़े बदलाव का प्रभाव भारतीय तकनीकी और पेशेवर कर्मचारियों पर पड़ सकता है। यदि नियोक्ताओं के लिए भर्ती संबंधी दस्तावेज और प्रमाण जुटाने की आवश्यकताएँ अधिक कठोर हो जाती हैं,तो कंपनियों पर अनुपालन का अतिरिक्त बोझ बढ़ सकता है। इससे विदेशी कर्मचारियों को स्थायी निवास के लिए प्रायोजित करने की प्रक्रिया अधिक लंबी और जाँच आधारित हो सकती है।
एरिक श्मिट ने अपने पत्र में कहा है कि पीईआरएम के मौजूदा नियमों में दो दशक से अधिक समय से कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। उनके अनुसार,जिस समय ये नियम बनाए गए थे, उस समय नौकरी खोजने और कर्मचारियों की भर्ती का तरीका आज से काफी अलग था। उन्होंने विशेष रूप से अखबारों में नौकरी के विज्ञापन देने की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाया है। उनका तर्क है कि आज नौकरी तलाशने वाले अधिकांश लोग ऑनलाइन माध्यमों का इस्तेमाल करते हैं,जबकि मौजूदा पीईआरएम नियम अभी भी पुराने भर्ती तरीकों पर काफी हद तक निर्भर हैं।
गैर-पेशेवर पदों के लिए मौजूदा प्रक्रिया में आम तौर पर दो अखबारों में नौकरी का विज्ञापन और संबंधित राज्य की रोजगार एजेंसी में पंजीकरण जैसी आवश्यकताएँ शामिल होती हैं। वहीं पेशेवर पदों के लिए ऑनलाइन विज्ञापन अनिवार्य नहीं है। सीनेटर का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था की कमियों का फायदा उठाकर कुछ नियोक्ता अमेरिकी कर्मचारियों से नौकरियों को प्रभावी रूप से छिपा सकते हैं और बाद में यह दिखा सकते हैं कि उन्होंने घरेलू स्तर पर योग्य उम्मीदवार तलाशने की पूरी कोशिश की थी।
प्रस्तावित बदलावों में नियोक्ताओं के लिए अमेरिकी आवेदकों से जुड़ा विस्तृत रिकॉर्ड रखना भी शामिल है। इसके तहत हर अमेरिकी उम्मीदवार के आवेदन और उसकी स्थिति का रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की माँग की गई है। इसके अलावा यदि किसी अमेरिकी आवेदक को नौकरी के लिए नहीं चुना जाता है,तो नियोक्ता को उसके चयन न होने का कारण भी दर्ज करना होगा। नियोक्ता को यह प्रमाणित करना होगा कि संबंधित पद किसी विदेशी कर्मचारी के लिए पहले से तय नहीं था।
प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि हाल में नौकरी गंवा चुके ऐसे योग्य अमेरिकी नागरिकों को रिक्त पद के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए,जिनके पास उस पद के लिए आवश्यक योग्यता है। इसके अलावा जिन उम्मीदवारों के पास जरूरी योग्यताएँ हैं,उनका वास्तविक रूप से साक्षात्कार लिया जाना चाहिए। यदि उन्हें नियुक्त नहीं किया जाता है,तो नियोक्ता को इसका लिखित कारण देना होगा।
एरिक श्मिट का तर्क है कि मौजूदा नियम अमेरिकी आवेदकों के साथ वास्तविक प्रतिस्पर्धा के बजाय केवल औपचारिक भर्ती प्रक्रिया पूरी करने की अनुमति देते हैं। उनका कहना है कि व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें बेरोजगार या नौकरी तलाश रहे अमेरिकी नागरिकों को संबंधित पद के लिए वास्तविक अवसर मिले। इसी उद्देश्य से वह श्रम विभाग से पीईआरएम प्रक्रिया में व्यापक सुधार करने की माँग कर रहे हैं।
हालाँकि, यह समझना जरूरी है कि पीईआरएम और एच-1बी दो अलग-अलग कार्यक्रम हैं। एच-1बी वीजा विशेष पेशेवर योग्यताओं वाली नौकरियों में विदेशी कर्मचारियों को अस्थायी रूप से काम करने की अनुमति देता है। दूसरी ओर,पीईआरएम प्रक्रिया आमतौर पर नियोक्ता द्वारा किसी विदेशी कर्मचारी के स्थायी रोजगार और आगे ग्रीन कार्ड के लिए इस्तेमाल की जाती है। इसलिए पीईआरएम में बदलाव का मतलब यह नहीं है कि एच-1बी वीजा व्यवस्था तुरंत समाप्त या रद्द हो जाएगी।
एरिक श्मिट के पत्र में किसी मौजूदा वीजा,आवेदन या वर्तमान आव्रजन स्थिति को तत्काल रद्द करने का प्रस्ताव भी नहीं है। उनकी माँग मुख्य रूप से भर्ती प्रक्रिया को सख्त और पारदर्शी बनाने तथा अमेरिकी कर्मचारियों को अधिक अवसर देने से जुड़ी है। इसलिए भारतीय पेशेवरों के लिए फिलहाल इसका तत्काल प्रभाव स्पष्ट नहीं है। वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी श्रम विभाग प्रस्तावित बदलावों में से कितने सुझाव स्वीकार करता है और उन्हें किस तरह लागू करता है।
विशेषज्ञों के अनुसार,यदि पीईआरएम प्रक्रिया में दस्तावेजी आवश्यकताएं बढ़ाई जाती हैं और प्रत्येक अमेरिकी आवेदक के रिकॉर्ड तथा अस्वीकृति के कारणों की विस्तृत जानकारी देना जरूरी किया जाता है,तो नियोक्ताओं के लिए प्रक्रिया अधिक जटिल हो सकती है। इससे विदेशी कर्मचारियों के ग्रीन कार्ड प्रायोजन में अतिरिक्त समय और संसाधन लग सकते हैं। पहले से ही लंबी और जटिल मानी जाने वाली रोजगार-आधारित आव्रजन प्रक्रिया और कठिन हो सकती है।
भारतीय टेक प्रोफेशनल्स के लिए यह बदलाव खास महत्व रखता है,क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय कर्मचारी एच-1बी से रोजगार-आधारित स्थायी निवास की दिशा में आगे बढ़ते हैं। यदि कंपनियों को पीईआरएम के तहत अमेरिकी उम्मीदवारों की भर्ती को लेकर ज्यादा विस्तृत प्रमाण देना पड़ेगा,तो कुछ नियोक्ता विदेशी कर्मचारियों के लिए ग्रीन कार्ड प्रायोजन करने से पहले अधिक सावधानी बरत सकते हैं। इससे नई नियुक्तियों और मौजूदा कर्मचारियों की स्थायी निवास प्रक्रिया दोनों पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है।
फिलहाल सीनेटर एरिक श्मिट की माँग एक प्रस्ताव के स्तर पर है और इसे लागू करने का अंतिम अधिकार अमेरिकी श्रम विभाग तथा संबंधित प्रशासनिक प्रक्रिया के पास होगा। इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इससे भारतीयों के एच-1बी वीजा या ग्रीन कार्ड पर कितना प्रभाव पड़ेगा,लेकिन प्रस्ताव ने अमेरिका में विदेशी श्रमिकों, रोजगार आधारित आव्रजन और घरेलू कर्मचारियों को प्राथमिकता देने की बहस को फिर से तेज कर दिया है।
आने वाले समय में श्रम विभाग इस प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाता है,यह भारतीय पेशेवरों और अमेरिकी कंपनियों दोनों के लिए महत्वपूर्ण होगा। यदि नियमों में बदलाव किए जाते हैं,तो नियोक्ताओं को भर्ती प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और दस्तावेजी अनुपालन सुनिश्चित करना होगा। वहीं भारतीय टेक प्रोफेशनल्स के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि नई व्यवस्था उनके एच-1बी रोजगार से लेकर ग्रीन कार्ड तक के लंबे सफर को कितना प्रभावित करती है।
