ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

ईरान-अमेरिका शांति समझौते पर बोले राष्ट्रपति पेजेश्कियन,कहा- दुश्मनों के सामने नहीं झुके, सम्मान और ताकत से हुआ समझौता

तेहरान, 7 अगस्त (युआईटीवी)- ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने ईरान और अमेरिका के बीच हाल में हुए शांति समझौता ज्ञापन को लेकर अपनी सरकार का बचाव किया है। उन्होंने कहा कि ईरान ने पूर्व सर्वोच्च नेता अली खामेनेई द्वारा बताए गए सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए अमेरिका के साथ यह समझौता ‘सम्मान’ और ‘ताकत’ के साथ किया है। राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि इस समझौते के लिए ईरान को किसी दबाव के आगे झुकना नहीं पड़ा,बल्कि विशेषज्ञों के साथ लंबी और विस्तृत चर्चा के बाद समझौते का प्रारूप तैयार किया गया।

मसूद पेजेश्कियन ने रविवार को शिक्षा मंत्री अलीरेजा काजेमी की मौजूदगी में हुई एक बैठक के दौरान ये बातें कहीं। उनके कार्यालय की ओर से जारी बयान के मुताबिक,बैठक में राष्ट्रपति ने ईरान और अमेरिका के बीच हुए समझौता ज्ञापन को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने समझौते का बचाव करते हुए कहा कि ईरान ने अपनी राष्ट्रीय गरिमा और हितों को ध्यान में रखते हुए बातचीत को आगे बढ़ाया।

राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने कहा कि ईरान ने हालिया समझौते को मजबूती के साथ आगे बढ़ाया और अपने दुश्मनों के सामने घुटने नहीं टेके। उनके मुताबिक,समझौता अचानक या जल्दबाजी में नहीं किया गया,बल्कि विशेषज्ञों के साथ सोच-समझकर और विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करने के बाद तैयार किया गया। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि ईरान की कूटनीतिक नीति में राष्ट्रीय हित और सम्मान को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।

ईरानी पक्ष के अनुसार,ईरान और अमेरिका ने 18 जून को क्षेत्र में जारी युद्ध को समाप्त करने के उद्देश्य से शांति समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते के तहत दोनों देशों को 60 दिनों की अवधि के भीतर बातचीत के जरिए किसी अंतिम समझौते तक पहुंचने की दिशा में काम करना था। यह अवधि सोमवार को समाप्त होने वाली थी। हालाँकि,हाल के सप्ताहों में दोनों देशों के बीच बढ़े तनाव के कारण आगे की बातचीत को लेकर अनिश्चितता पैदा हो गई है।

समझौता ज्ञापन को लेकर ईरान के राजनीतिक नेतृत्व की ओर से सकारात्मक प्रतिक्रिया भी सामने आई है। ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकर कालीबाफ ने शनिवार को इस समझौते को ईरान की शान और जीत का प्रमाण बताया। उन्होंने कहा कि यह कूटनीतिक क्षेत्र में देश की जीत को मजबूत करने की दिशा में एक कदम है। उनके बयान से संकेत मिलता है कि ईरान के राजनीतिक नेतृत्व का एक वर्ग इस समझौते को अपनी कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में देख रहा है।

हालाँकि,समझौते के बावजूद ईरान और अमेरिका के बीच तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। हाल के दिनों में दोनों देशों के बीच मतभेद और बयानबाजी बढ़ी है। ऐसे में 60 दिनों की बातचीत की अवधि खत्म होने के करीब पहुँचने के साथ ही यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या दोनों पक्ष किसी व्यापक और स्थायी समझौते तक पहुँच पाएँगे। मौजूदा परिस्थितियों में बातचीत की आगे की दिशा स्पष्ट नहीं है।

ईरान की ओर से जहाँ समझौते को राष्ट्रीय सम्मान और ताकत के साथ की गई कूटनीतिक पहल बताया जा रहा है,वहीं अमेरिका में इस संघर्ष और उससे जुड़ी नीतियों को लेकर सवाल उठने लगे हैं। अमेरिकी डेमोक्रेटिक सीनेटर रूबेन गैलेगो ने रविवार को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन की ईरान नीति पर गंभीर सवाल उठाए।

गैलेगो ने आरोप लगाया कि ट्रंप प्रशासन बिना किसी स्पष्ट योजना,बाहर निकलने की रणनीति और तय मिशन के ईरान युद्ध में शामिल हुआ। उन्होंने कहा कि इस स्थिति का खामियाजा अमेरिकी सैनिकों को भुगतना पड़ा। इराक युद्ध में हिस्सा ले चुके और मरीन कॉर्प्स में सेवा दे चुके गैलेगो ने संघर्ष को लेकर अमेरिकी सैन्य योजना और नेतृत्व में गंभीर कमियों का दावा किया।

अमेरिकी सीनेटर ने एक समाचार चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा कि प्रशासन ने युद्ध के लिए कोई योजना नहीं बनाई थी। उनके अनुसार,सरकार ने यह भी योजना नहीं बनाई कि संघर्ष से बाहर कैसे निकला जाएगा और न ही यह पूरी तरह समझा गया कि युद्ध किस तरह बढ़ सकता है। गैलेगो की यह टिप्पणी अमेरिकी प्रशासन की युद्ध संबंधी रणनीति पर तीखी राजनीतिक आलोचना के रूप में सामने आई है।

गैलेगो की टिप्पणी ऐसे समय आई जब अमेरिकी नौसेना के युद्धपोत यूएसएस अब्राहम लिंकन पर सैनिकों में थकान,गिरते मनोबल और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताओं की खबरों को लेकर सवाल उठाए जा रहे थे। उन्होंने इन परिस्थितियों को युद्ध की तैयारी और सैन्य नेतृत्व से जोड़ते हुए प्रशासन की रणनीति पर सवाल खड़े किए।

ईरान और अमेरिका के बीच मौजूदा घटनाक्रम ने एक बार फिर पश्चिम एशिया की जटिल राजनीतिक और सुरक्षा स्थिति को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। एक तरफ ईरान अपने समझौते को ताकत और सम्मान के साथ की गई कूटनीतिक पहल के तौर पर पेश कर रहा है,तो दूसरी ओर अमेरिका में युद्ध की रणनीति और उसके संभावित परिणामों को लेकर राजनीतिक बहस तेज होती दिखाई दे रही है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि 60 दिनों की निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद ईरान और अमेरिका बातचीत को किस दिशा में ले जाते हैं। यदि दोनों पक्ष किसी अंतिम समझौते तक पहुँचते हैं,तो इससे क्षेत्रीय तनाव कम करने में मदद मिल सकती है,लेकिन हालिया तनाव और दोनों देशों के बीच गहरे मतभेदों को देखते हुए बातचीत का भविष्य अभी भी अनिश्चित बना हुआ है। आने वाले दिनों में दोनों देशों के रुख और कूटनीतिक कदम यह तय करेंगे कि मौजूदा शांति समझौता व्यापक समाधान की दिशा में आगे बढ़ता है या फिर तनाव एक बार दोबारा बढ़ता है।