प्रधानमंत्री ताकाइची (तस्वीर क्रेडिट@np_nationpress)

ताकाइची सरकार के खिलाफ टोक्यो में हजारों लोगों का प्रदर्शन,बोले- ‘शांतिवादी संविधान की रक्षा करो’

टोक्यो,20 अगस्त (युआईटीवी)- जापान की राजधानी टोक्यो में बुधवार शाम प्रधानमंत्री ताकाइची सरकार की सैन्य नीतियों और देश की सुरक्षा नीति में हो रहे बदलावों के खिलाफ हजारों लोगों ने जोरदार प्रदर्शन किया। नेशनल डाइट बिल्डिंग यानी जापान की संसद भवन के बाहर आयोजित इस विरोध प्रदर्शन में बड़ी संख्या में नागरिक,शांति समर्थक और सामाजिक संगठनों से जुड़े लोग शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने सरकार पर जापान के अतीत से सबक नहीं सीखने और देश को सैन्य विस्तार की दिशा में ले जाने का आरोप लगाया। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर सरकार इसी रास्ते पर आगे बढ़ती रही तो जापान की शांतिवादी पहचान और क्षेत्रीय स्थिरता दोनों पर गंभीर असर पड़ सकता है।

प्रदर्शन के आयोजकों के अनुसार,बुधवार शाम हुई रैली में करीब 15 हजार लोग प्रत्यक्ष रूप से शामिल हुए,जबकि लगभग 25 हजार लोगों ने ऑनलाइन माध्यम से इसमें हिस्सा लिया। संसद भवन के बाहर जुटे प्रदर्शनकारियों के हाथों में अलग-अलग संदेश लिखे बैनर और पोस्टर थे। कई प्रदर्शनकारियों ने सरकार की सैन्य नीतियों का विरोध करते हुए जापान के शांतिवादी संविधान की रक्षा करने की माँग की। इस दौरान ‘सेना के विस्तार का विरोध करें’, ‘शांतिवादी संविधान की रक्षा करें’ और ‘ताकाइची,अभी पद छोड़ें’ जैसे नारे लगाए गए।

प्रदर्शनकारियों का मुख्य आरोप था कि मौजूदा सरकार जापान के युद्धकालीन इतिहास और उसके दौरान की गई आक्रामक कार्रवाइयों से पर्याप्त सबक नहीं ले रही है। उनका कहना है कि जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जिस शांतिवादी नीति को अपनाया था, मौजूदा सरकार की कई पहलें उस बुनियादी सोच से दूर जाती दिखाई दे रही हैं। रैली में शामिल लोगों ने कहा कि देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने के नाम पर सैन्य क्षमता का लगातार विस्तार करना जापान को एक ऐसे रास्ते पर ले जा सकता है,जिससे भविष्य में संघर्ष की आशंका बढ़ेगी।

चीनी समाचार एजेंसी शिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार,जापान की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी की नेता मिज़ुहो फुकुशिमा ने सरकार की नीतियों को लेकर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि ताकाइची ने 15 अगस्त को युद्ध में मारे गए लोगों की स्मृति में आयोजित राष्ट्रीय समारोह में अपने संबोधन के दौरान जापान के पिछले आक्रामक युद्धों पर आत्ममंथन या विचार करने का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं किया। उनके मुताबिक,यह बेहद महत्वपूर्ण है कि जापान अपने अतीत को स्वीकार करे और यह सुनिश्चित करे कि इतिहास की गलतियाँ दोबारा न दोहराई जाएँ।

फुकुशिमा ने इस महीने हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए जाने की बरसी के अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में ताकाइची की टिप्पणियों पर भी सवाल उठाया। उन्होंने विशेष रूप से जापान के ‘तीन परमाणु-विरोधी सिद्धांतों’ को लेकर प्रधानमंत्री के रुख की आलोचना की। उनका कहना था कि ताकाइची ने यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया कि जापान इन सिद्धांतों का पालन आगे भी जारी रखेगा या नहीं। उन्होंने इसे बेहद गंभीर मुद्दा बताते हुए कहा कि परमाणु हथियारों से जुड़े जापान के रुख में किसी भी तरह की अस्पष्टता देश और दुनिया के लिए चिंता का विषय हो सकती है।

दक्षिणी द्वीप प्रान्त ओकिनावा से प्रदर्शन में शामिल हुए कियोमासा कोमेसु ने भी सरकार की सैन्य नीति पर कड़ा विरोध जताया। उन्होंने कहा कि ताकाइची सरकार देश को सैन्य विस्तार की दिशा में आगे ले जा रही है। उनके अनुसार,जापान की मौजूदा नीतियों में युद्ध की आक्रामक प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है। उन्होंने आशंका जताई कि सैन्य क्षमताओं के लगातार विस्तार से जापान की विदेश और सुरक्षा नीति में बड़ा बदलाव आ सकता है।

साकुमा नाम के एक अन्य प्रदर्शनकारी ने कहा कि वह हाल के महीनों में सरकार की ओर से उठाए गए कई कदमों का विरोध करते हैं। उन्होंने विशेष रूप से राष्ट्रीय खुफिया एजेंसी की स्थापना जैसी पहल का उल्लेख किया। उनका कहना था कि देश में सुरक्षा और खुफिया तंत्र को मजबूत करने के नाम पर किए जा रहे बदलावों पर नागरिक समाज की भी निगरानी होनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि उन्हें अब ‘युद्ध की आहट’ सुनाई दे रही है और सरकार को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए।

कानागावा प्रान्त से रैली में शामिल होने आईं शिक्षिका कोजिमा ने जापान के रक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात की आशंका है कि जापान की कुछ आम कंपनियाँ भी अपने वित्तीय संसाधनों और तकनीकी क्षमताओं का इस्तेमाल ड्रोन और हथियारों के विकास तथा उत्पादन में करने लगी हैं। उनके मुताबिक,अगर सैन्य उद्योग का विस्तार समाज के सामान्य आर्थिक ढाँचे का हिस्सा बन गया तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ सकता है।

प्रदर्शनकारियों की नाराजगी ऐसे समय में सामने आई है,जब ताकाइची सरकार ने जापान की सैन्य क्षमता बढ़ाने की दिशा में कई कदम तेज किए हैं। सरकार रक्षा बजट में बढ़ोतरी कर रही है और देश की सैन्य तैयारियों को मजबूत करने पर जोर दे रही है। इसके अलावा घातक हथियारों के निर्यात से संबंधित मौजूदा प्रतिबंधों में ढील देने,मध्यम और लंबी दूरी की मिसाइलों की तैनाती को आगे बढ़ाने तथा देश की आक्रामक सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने जैसी नीतियों को लेकर भी सरकार की आलोचना हो रही है।

जापान के शांतिवादी संविधान में बदलाव की कोशिशों को लेकर भी देश के भीतर लंबे समय से बहस जारी है। संविधान का अनुच्छेद नौ जापान की युद्ध न करने की नीति और सैन्य शक्ति के इस्तेमाल को लेकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शांति समर्थक समूहों का मानना है कि इसमें किसी भी तरह का बदलाव जापान की युद्धोत्तर पहचान को कमजोर कर सकता है। दूसरी ओर,सरकार और उसके समर्थकों का तर्क है कि बदलते क्षेत्रीय सुरक्षा माहौल में जापान को अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने की आवश्यकता है।

परमाणु नीति को लेकर भी सरकार का रुख चर्चा के केंद्र में है। जापान लंबे समय से ‘तीन परमाणु-विरोधी सिद्धांतों’ की नीति से जुड़ा रहा है,जिसके तहत देश परमाणु हथियार रखने, उनका उत्पादन करने और उन्हें अपने क्षेत्र में लाने का विरोध करता है। ताकाइची की ओर से इन सिद्धांतों के भविष्य को लेकर स्पष्ट स्थिति नहीं बताने पर शांति समर्थक संगठनों में चिंता बढ़ी है। हिरोशिमा और नागासाकी की परमाणु त्रासदी के ऐतिहासिक अनुभव को देखते हुए जापान में परमाणु हथियारों का मुद्दा बेहद संवेदनशील माना जाता है।

टोक्यो में हुआ यह प्रदर्शन बताता है कि जापान की सुरक्षा और रक्षा नीति में बदलावों को लेकर समाज के एक वर्ग में गंभीर चिंता मौजूद है। प्रदर्शनकारियों ने सरकार से सैन्य विस्तार के बजाय शांति,कूटनीति और ऐतिहासिक जिम्मेदारी को प्राथमिकता देने की मांग की। उनका कहना है कि जापान की सुरक्षा केवल हथियारों और सैन्य क्षमता बढ़ाने से सुनिश्चित नहीं हो सकती,बल्कि इसके लिए पड़ोसी देशों के साथ संवाद और क्षेत्रीय शांति को मजबूत करना भी जरूरी है।

रैली के दौरान उठे नारों और प्रदर्शनकारियों की चिंताओं से यह संकेत मिलता है कि ताकाइची सरकार के सामने अपनी रक्षा नीतियों को लेकर घरेलू स्तर पर राजनीतिक और सामाजिक चुनौती भी बढ़ सकती है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार सैन्य क्षमता बढ़ाने की अपनी योजनाओं और शांतिवादी नीतियों को लेकर नागरिकों की चिंताओं के बीच किस तरह संतुलन कायम करती है। जापान में शांति समर्थक समूहों का दबाव बढ़ने के साथ ही परमाणु नीति,संविधान और सैन्य विस्तार का मुद्दा देश की राजनीति में और अधिक महत्वपूर्ण बन सकता है।