बेंगलुरु,8 सितंबर (युआईटीवी)– भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच तेजी से मजबूत हो रहे रणनीतिक और आर्थिक संबंधों का असर अब अंतरिक्ष क्षेत्र में भी साफ तौर पर दिखाई दे रहा है। दोनों देशों ने बीते कुछ वर्षों में व्यापार, तकनीक, साइबर सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिजों और रक्षा समेत कई क्षेत्रों में सहयोग को विस्तार दिया है। इसी कड़ी में अंतरिक्ष सहयोग भी द्विपक्षीय साझेदारी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर उभरा है। ऑस्ट्रेलियाई व्यापार एवं निवेश आयोग के आयुक्त नाथन डेविस ने भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच अंतरिक्ष सहयोग को लेकर कई अहम बातें साझा की हैं। उन्होंने कहा कि वर्ष 2022 में आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौता लागू होने के बाद दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार ने पहली बार 50 अरब ऑस्ट्रेलियाई डॉलर का ऐतिहासिक आँकड़ा पार किया है। इस आर्थिक साझेदारी के विस्तार ने अंतरिक्ष सहित तकनीकी क्षेत्रों में सहयोग के लिए भी नए अवसर पैदा किए हैं।
नाथन डेविस के मुताबिक भारत और ऑस्ट्रेलिया के संबंध केवल व्यापारिक हितों तक सीमित नहीं हैं,बल्कि दोनों देश व्यापक रणनीतिक साझेदार के रूप में आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों में महत्वपूर्ण विस्तार हुआ है, जबकि पिछले पाँच वर्षों के दौरान यह प्रक्रिया और अधिक तेज हुई है। वर्ष 2021 में भारत और ऑस्ट्रेलिया ने व्यापक रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाया था, जिसने दोनों देशों के बीच सहयोग के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया। इसके बाद व्यापार समझौते और विभिन्न क्षेत्रों में हुए समझौतों ने द्विपक्षीय संबंधों को और गहराई दी।
डेविस ने आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते को दोनों देशों के संबंधों में महत्वपूर्ण पड़ाव बताया। उनके अनुसार, इस समझौते के लागू होने के बाद भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच व्यापार में जिस तरह की वृद्धि देखने को मिली, वह अभूतपूर्व रही है। दोनों देशों ने पिछले एक वर्ष के दौरान 50 अरब ऑस्ट्रेलियाई डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार का महत्वाकांक्षी लक्ष्य हासिल किया है। यह पहली बार है जब दोनों देशों के बीच व्यापार इस स्तर तक पहुँचा है। उनके मुताबिक व्यापार में इस वृद्धि ने दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच संपर्क को मजबूत करने के साथ-साथ अंतरिक्ष और उन्नत तकनीक जैसे नए क्षेत्रों में सहयोग के लिए भी अनुकूल माहौल तैयार किया है।
अंतरिक्ष क्षेत्र की बात करें तो भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच सहयोग का आधार पहले से मौजूद है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन और ऑस्ट्रेलियाई अंतरिक्ष एजेंसी के बीच समझौता ज्ञापन दोनों देशों की अंतरिक्ष साझेदारी का महत्वपूर्ण स्तंभ है। नाथन डेविस ने इस समझौते को दोनों देशों के बीच ही नहीं,बल्कि ऑस्ट्रेलियाई अंतरिक्ष एजेंसी की वैश्विक साझेदारियों के संदर्भ में भी बेहद महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि दोनों अंतरिक्ष एजेंसियों के बीच हस्ताक्षरित प्रतिबद्धता वाला यह समझौता उन चुनिंदा द्विपक्षीय समझौतों में शामिल है,जो ऑस्ट्रेलियाई अंतरिक्ष एजेंसी ने दूसरे देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ किए हैं। इससे इसरो और ऑस्ट्रेलियाई अंतरिक्ष एजेंसी के संबंधों की अहमियत का अंदाजा लगाया जा सकता है।
डेविस के अनुसार,इसरो और ऑस्ट्रेलियाई अंतरिक्ष एजेंसी के बीच साझेदारी दोनों सरकारों के बीच व्यापक सहयोग का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। दोनों एजेंसियां अलग-अलग क्षेत्रों में मिलकर काम करने की संभावनाओं को लगातार तलाश रही हैं। भारत की अंतरिक्ष क्षमता और ऑस्ट्रेलिया के शोध,संसाधन तथा तकनीकी क्षेत्र के अनुभव को एक-दूसरे का पूरक माना जा रहा है। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच अंतरिक्ष सहयोग को केवल अंतरिक्ष अभियानों या उपग्रहों तक सीमित नहीं देखा जा रहा,बल्कि इसे व्यापक तकनीकी और औद्योगिक साझेदारी के हिस्से के रूप में विकसित किया जा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया ऑस्ट्रेलिया यात्रा के संदर्भ में भी दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय सहयोग को लेकर चर्चा हुई। नाथन डेविस ने कहा कि भारत और ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्थाओं और तकनीकी क्षमताओं में कई ऐसी विशेषताएँ हैं,जो एक-दूसरे के लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं। ऑस्ट्रेलिया के पास प्राकृतिक संसाधनों और कच्चे माल की पर्याप्त उपलब्धता है,जबकि भारत के पास विशाल विनिर्माण तंत्र और तेजी से विकसित हो रहा तकनीकी ढाँचा है। ऐसे में दोनों देशों के बीच आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने और उन्नत तकनीकों के विकास के लिए व्यापक अवसर मौजूद हैं।
उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलिया के पास ऐसे कई संसाधन हैं,जो भारत की विशाल विनिर्माण अर्थव्यवस्था की आपूर्ति श्रृंखला के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं। दूसरी ओर,ऑस्ट्रेलिया की प्रौद्योगिकी कंपनियाँ भारत के तकनीकी ढाँचे में नई क्षमताओं और विशेषज्ञता की परत जोड़ सकती हैं। इसी तरह भारत का मजबूत तकनीकी तंत्र ऑस्ट्रेलियाई कंपनियों और संस्थानों के लिए नए अवसर पैदा कर सकता है। इस तरह दोनों देशों की क्षमताएँ एक-दूसरे की प्रतिस्पर्धी होने के बजाय पूरक बन सकती हैं।
इस साझेदारी में भारतीय प्रवासी समुदाय की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। नाथन डेविस ने ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों की संख्या का उल्लेख करते हुए कहा कि वहाँ भारतीय समुदाय की आबादी 10 लाख से अधिक है। ऑस्ट्रेलिया की कुल आबादी के संदर्भ में यह संख्या काफी महत्वपूर्ण है। उनके मुताबिक यह समुदाय दोनों देशों के बीच सामाजिक,आर्थिक और कारोबारी संबंधों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारतीय और ऑस्ट्रेलियाई कारोबारी तथा तकनीकी समुदायों के बीच बढ़ती निकटता का असर अंतरिक्ष क्षेत्र पर भी दिखाई दे रहा है।
ऑस्ट्रेलिया की ओर से भारत में कंपनियों के प्रतिनिधिमंडल भेजे जाने को भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। नाथन डेविस ने बताया कि हाल में 12 ऑस्ट्रेलियाई कंपनियों को भारत लाया गया है। इन कंपनियों का उद्देश्य भारतीय कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करना नहीं,बल्कि ऐसी साझेदारी विकसित करना है जिसमें दोनों देशों की तकनीकी क्षमताएँ एक-दूसरे को मजबूत करें। प्रतिनिधिमंडल में शामिल कंपनियाँ ऑस्ट्रेलियाई अंतरिक्ष क्षेत्र की अलग-अलग क्षमताओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसका उद्देश्य भारत के साथ सहयोग के उन क्षेत्रों की पहचान करना है, जहाँ दोनों देशों की विशेषज्ञता मिलकर नई संभावनाएँ पैदा कर सकती है।
ऑस्ट्रेलियाई अंतरिक्ष क्षेत्र में अनुसंधान से लेकर व्यावसायिक गतिविधियों तक व्यापक क्षमताएँ मौजूद हैं। नाथन डेविस के मुताबिक भारत में लाए गए 12 कंपनियों के प्रतिनिधिमंडल में अंतरिक्ष क्षेत्र की पूरी श्रृंखला की झलक दिखाई देती है। इसमें विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों के माध्यम से किए जा रहे शुरुआती और गहन शोध से लेकर अंतरिक्ष प्रक्षेपण और पुनःप्रवेश से जुड़ी उन्नत तकनीकें शामिल हैं। इसके अलावा उपग्रह निर्माण और उससे संबंधित विनिर्माण क्षमताएँ भी ऑस्ट्रेलियाई अंतरिक्ष उद्योग की महत्वपूर्ण ताकत हैं।
अंतरिक्ष क्षेत्र में सहयोग की संभावनाएँ केवल उपग्रह और प्रक्षेपण तक सीमित नहीं हैं। ऑस्ट्रेलिया की कई कंपनियाँ पृथ्वी अवलोकन से जुड़ी क्षमताओं पर काम कर रही हैं। पृथ्वी की सतह, मौसम, प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण से संबंधित जानकारी जुटाने में पृथ्वी अवलोकन तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भारत के बढ़ते अंतरिक्ष कार्यक्रम और विभिन्न क्षेत्रों में अंतरिक्ष आधारित सेवाओं की माँग को देखते हुए इस क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सहयोग की बड़ी संभावना है।
इसके अलावा अंतरिक्ष में विनिर्माण भी भविष्य का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जा रहा है। अंतरिक्ष में उत्पादन और निर्माण से जुड़ी तकनीक अभी विकास के दौर में है,लेकिन आने वाले समय में यह अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को बदलने की क्षमता रखती है। ऑस्ट्रेलिया की कंपनियों के पास इस क्षेत्र में भी क्षमताएँ विकसित हो रही हैं। भारत अपने मजबूत प्रक्षेपण तंत्र, उपग्रह निर्माण क्षमता और बढ़ते निजी अंतरिक्ष उद्योग के साथ इन तकनीकों के लिए महत्वपूर्ण साझेदार बन सकता है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आँकड़ों के विश्लेषण का अंतरिक्ष क्षेत्र में बढ़ता इस्तेमाल भी भारत-ऑस्ट्रेलिया सहयोग के लिए एक अहम अवसर है। उपग्रहों से प्राप्त होने वाले विशाल आँकड़ों को उपयोगी जानकारी में बदलने के लिए उन्नत विश्लेषण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीकों की जरूरत होती है। ऑस्ट्रेलिया की कंपनियाँ इस क्षेत्र में भी काम कर रही हैं। भारत के मजबूत सूचना प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता तंत्र के साथ ऑस्ट्रेलिया की अंतरिक्ष विशेषज्ञता का मेल भविष्य में नई सेवाओं और तकनीकों को जन्म दे सकता है।
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच साइबर तकनीक के क्षेत्र में हुआ समझौता भी इस व्यापक तकनीकी सहयोग का हिस्सा है। नाथन डेविस ने एक ऐसे समझौते का उल्लेख किया, जिसे साइबर तकनीक पर केंद्रित बताया गया। इसमें अंतरिक्ष को भी महत्वपूर्ण साझेदारी के क्षेत्र के रूप में देखा गया। इससे स्पष्ट है कि दोनों देशों के बीच अंतरिक्ष सहयोग को साइबर सुरक्षा, डिजिटल तकनीक और उन्नत प्रौद्योगिकी से अलग करके नहीं देखा जा रहा है। आधुनिक अंतरिक्ष प्रणालियों में साइबर सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण है और उपग्रहों तथा जमीनी प्रणालियों की सुरक्षा के लिए दोनों देशों की विशेषज्ञता उपयोगी हो सकती है।
नाथन डेविस ने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत और ऑस्ट्रेलिया की साझेदारी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू दोनों देशों की क्षमताओं की पूरकता है। ऑस्ट्रेलिया के पास प्राकृतिक संसाधन, उच्चस्तरीय शोध संस्थान, अंतरिक्ष अनुसंधान और उन्नत तकनीक से जुड़ी कंपनियाँ हैं,जबकि भारत के पास विशाल बाजार, मजबूत विनिर्माण क्षमता, तकनीकी प्रतिभा और तेजी से विकसित हो रहा निजी अंतरिक्ष क्षेत्र है। दोनों की ताकतों को जोड़कर अंतरिक्ष क्षेत्र में नए उत्पाद, सेवाएँ और आपूर्ति श्रृंखलाएँ विकसित की जा सकती हैं।
भारत के लिए ऑस्ट्रेलिया के साथ अंतरिक्ष सहयोग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था तेजी से विस्तार कर रही है। अब अंतरिक्ष गतिविधियाँ केवल सरकारी अंतरिक्ष एजेंसियों तक सीमित नहीं हैं। निजी कंपनियाँ,विश्वविद्यालय, अनुसंधान संस्थान और स्टार्टअप भी अंतरिक्ष क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। भारत में निजी अंतरिक्ष उद्योग के विस्तार के साथ ऑस्ट्रेलियाई कंपनियों के लिए सहयोग और निवेश के नए रास्ते खुल सकते हैं। वहीं भारतीय कंपनियों को ऑस्ट्रेलिया के शोध और तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र से लाभ मिल सकता है।
आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते के बाद दोनों देशों के बीच बढ़ते व्यापार ने इस साझेदारी के लिए आर्थिक आधार भी मजबूत किया है। 50 अरब ऑस्ट्रेलियाई डॉलर के व्यापार का आंकड़ा केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं है,बल्कि यह इस बात का संकेत भी है कि दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएँ एक-दूसरे के साथ तेजी से जुड़ रही हैं। इसी बढ़ती आर्थिक निकटता का विस्तार अब उन्नत तकनीक और अंतरिक्ष जैसे भविष्य के क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है।
कुल मिलाकर भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच अंतरिक्ष सहयोग एक ऐसे चरण में पहुँच चुका है, जहाँ दोनों देश केवल मौजूदा परियोजनाओं को आगे बढ़ाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भविष्य की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के लिए साझेदारी के नए रास्ते तलाश रहे हैं। इसरो और ऑस्ट्रेलियाई अंतरिक्ष एजेंसी के बीच मजबूत संबंध,दोनों देशों के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी,बढ़ता व्यापार और तकनीकी कंपनियों की भागीदारी इस सहयोग को नई दिशा दे रही है। अनुसंधान, प्रक्षेपण, पुनःप्रवेश, उपग्रह निर्माण, पृथ्वी अवलोकन, अंतरिक्ष विनिर्माण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आँकड़ा विश्लेषण जैसे क्षेत्रों में सहयोग आने वाले वर्षों में और बढ़ सकता है। नाथन डेविस का बयान इस बात की ओर संकेत करता है कि भारत और ऑस्ट्रेलिया अंतरिक्ष क्षेत्र में एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी नहीं,बल्कि पूरक साझेदार के रूप में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। यही दृष्टिकोण दोनों देशों की अंतरिक्ष साझेदारी को वैश्विक स्तर पर एक मजबूत और दीर्घकालिक सहयोग में बदल सकता है।
