काठमांडू,2 सितंबर (युआईटीवी)- नेपाल में पिछले सप्ताह आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने पूरे देश को गहरे संकट में डाल दिया है। तिब्बत क्षेत्र में ग्लेशियर टूटने के बाद उत्पन्न बाढ़ ने नेपाल के कई जिलों में भारी तबाही मचाई है। लगातार चल रहे खोज, बचाव और राहत कार्यों के बीच मृतकों की संख्या अब 1100 के पार पहुँच गई है,जबकि हजारों लोगों का अब भी कोई पता नहीं चल सका है। नेपाल के आपदा प्रबंधन अधिकारियों के अनुसार,राहत और बचाव अभियान युद्धस्तर पर जारी है,लेकिन दुर्गम इलाकों, क्षतिग्रस्त सड़कों और नदी किनारे जमा मलबे के कारण अभियान को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
नेपाल के नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी ने बुधवार को ताजा आंकड़े जारी करते हुए बताया कि सुबह नौ बजे तक बाढ़ में बहकर गए 1,114 शव बरामद किए जा चुके हैं। अधिकारियों के अनुसार,यह संख्या अभी और बढ़ सकती है क्योंकि कई प्रभावित क्षेत्रों में अब भी खोज अभियान जारी है और लगातार नए शव बरामद हो रहे हैं।
सबसे अधिक तबाही दक्षिणी चितवन जिले में दर्ज की गई है, जहाँ से अब तक 348 शव बरामद किए गए हैं। इसके बाद नवलपरासी पूर्व जिले में 217, नवलपरासी पश्चिम में 190, नुवाकोट में 155, गोरखा में 66, धाडिंग में 59, रसुवा में 41 और तनहुं जिले में 38 शव बरामद किए गए हैं। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि इन आँकड़ों में विभिन्न स्थानों से मिले मानव शरीर के अंग भी शामिल हैं,जिससे त्रासदी की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
आपदा प्रबंधन एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती मृतकों की पहचान करना है। अब तक केवल 95 शवों की पहचान की जा सकी है और उन्हें उनके परिजनों को सौंप दिया गया है। बड़ी संख्या में शवों की स्थिति ऐसी है कि उनकी पहचान करना कठिन हो गया है। यही वजह है कि नेपाल सरकार ने डीएनए परीक्षण और फोरेंसिक सहायता का सहारा लिया है। इस कार्य में अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों की मदद भी ली जा रही है ताकि मृतकों की पहचान कर उनके परिवारों को उचित जानकारी दी जा सके।
बाढ़ के बाद लापता लोगों की संख्या को लेकर भी चिंता लगातार बढ़ रही है। नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी के अनुसार, 3,916 लोगों से अब भी संपर्क नहीं हो पा रहा है। इनमें सरकारी कर्मचारी, सुरक्षाकर्मी, स्थानीय जनप्रतिनिधि, विदेशी नागरिक, विदेशी पर्यटकों के साथ काम करने वाले नेपाली नागरिक, स्थानीय निवासी तथा विभिन्न पनबिजली परियोजनाओं में कार्यरत कर्मचारी शामिल हैं।
हालाँकि,लापता लोगों के आँकड़ों को लेकर अलग-अलग सरकारी एजेंसियों के बीच अंतर भी सामने आया है। नेपाल पुलिस द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार, 4,858 लोग अभी भी लापता हैं, जिनमें 583 विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। पुलिस ने बताया कि यह आँकड़े बुधवार सुबह आठ बजे तक उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर तैयार किए गए हैं। दोनों एजेंसियों के आँकड़ों में अंतर होने के बावजूद यह स्पष्ट है कि हजारों परिवार अब भी अपने प्रियजनों के बारे में किसी सूचना का इंतजार कर रहे हैं।
बाढ़ का सबसे गंभीर असर नेपाल की पनबिजली परियोजनाओं पर पड़ा है। देश के ऊर्जा क्षेत्र की कई महत्वपूर्ण परियोजनाएँ भोटेकोशी और त्रिशूली नदी कॉरिडोर के किनारे स्थित हैं, जहाँ बाढ़ ने व्यापक नुकसान पहुँचाया है। इंडिपेंडेंट पावर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन नेपाल के अनुसार, रसुवा और नुवाकोट जिलों में स्थित 11 पनबिजली परियोजनाओं से जुड़े 983 लोगों का अब तक कोई पता नहीं चल पाया है। इन परियोजनाओं में काम कर रहे कर्मचारियों और मजदूरों के परिवारों में गहरी चिंता व्याप्त है।
नेपाली सेना, पुलिस और आपदा राहत एजेंसियों के साथ-साथ भारत और चीन की विशेष सुरंग बचाव टीमें भी अभियान में शामिल हैं। कई परियोजनाओं में सुरंगों के भीतर गहराई तक जाकर तलाश की जा रही है,ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं लोग अंदर फँसे तो नहीं हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बाढ़ के दौरान कई सुरंगों में अचानक पानी भर गया था,जिसके कारण बड़ी संख्या में कर्मचारी अंदर फँस गए हो सकते हैं।
बचाव अभियान विशेष रूप से उन परियोजनाओं पर केंद्रित है जो सबसे अधिक प्रभावित हुई हैं। इनमें अपर त्रिशूली 3ए पनबिजली परियोजना, चिलिमे पनबिजली परियोजना, लांगटांग खोला पनबिजली परियोजना, त्रिशूली 3बी परियोजना और अपर त्रिशूली-1 पनबिजली परियोजना शामिल हैं। इन परियोजनाओं के आसपास का क्षेत्र बाढ़ के बाद भारी मलबे और भूस्खलन से प्रभावित हुआ है, जिससे राहत कार्यों की गति प्रभावित हुई है।
अपर त्रिशूली-1 पनबिजली परियोजना सबसे अधिक प्रभावित परियोजनाओं में शामिल है। इंडिपेंडेंट पावर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन नेपाल के अनुसार,बाढ़ आने के समय इस परियोजना पर कुल 1,433 लोग कार्यरत थे। इनमें से 876 लोगों को या तो सुरक्षित निकाल लिया गया है या उनसे संपर्क स्थापित हो चुका है। हालाँकि,बड़ी संख्या में कर्मचारी अब भी लापता हैं,जिससे आशंकाएँ बढ़ती जा रही हैं।
इस परियोजना से जुड़े जिन लोगों का अभी तक पता नहीं चल पाया है,उनमें परियोजना कंपनी के कर्मचारी, इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन ठेकेदार के कर्मचारी, हाइड्रो इंजीनियरिंग विशेषज्ञ, परामर्शदाता कंपनियों के अधिकारी और निर्माण कार्यों में लगे सैकड़ों श्रमिक शामिल हैं। अधिकारियों का कहना है कि लापता लोगों की सही संख्या और उनकी स्थिति का पता लगाने के लिए व्यापक स्तर पर जाँच की जा रही है।
रसुवागढ़ी पनबिजली परियोजना की स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है। मंगलवार तक इस परियोजना से जुड़े 91 लोगों का कोई सुराग नहीं मिल पाया था। नेपाली सेना के नेतृत्व में एक विशेष टीम ने सोमवार को परियोजना स्थल का निरीक्षण किया और सुरंगों के भीतर खोज अभियान चलाया। हालाँकि,टीम को वहाँ कोई व्यक्ति नहीं मिला। इसके बाद भी खोज अभियान जारी रखा गया है और उम्मीद की जा रही है कि मलबा हटने के बाद कुछ महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है।
नेपाल सरकार ने इस आपदा को हाल के वर्षों की सबसे बड़ी प्राकृतिक त्रासदियों में से एक बताया है। देश के कई जिलों में सड़कें, पुल, बिजली व्यवस्था और संचार नेटवर्क बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। हजारों लोग अस्थायी राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। कई गांवों का संपर्क बाहरी दुनिया से पूरी तरह टूट गया है, जिसके कारण राहत सामग्री पहुँचाने में भी कठिनाई हो रही है।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी नेपाल को सहायता मिल रही है। भारत ने राहत सामग्री, दवाइयाँ, बचाव दल और फोरेंसिक विशेषज्ञों की टीम भेजी है। चीन ने भी तकनीकी विशेषज्ञों और राहत संसाधनों के माध्यम से सहयोग दिया है। दोनों देशों की विशेष टीमें नेपाली एजेंसियों के साथ मिलकर सुरंगों और दुर्गम क्षेत्रों में खोज अभियान चला रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में मृतकों की संख्या और बढ़ सकती है, क्योंकि हजारों लोग अब भी लापता हैं और कई प्रभावित क्षेत्रों तक राहत दल पूरी तरह नहीं पहुँच पाए हैं। बाढ़ ने केवल जनहानि ही नहीं पहुँचाई,बल्कि नेपाल की ऊर्जा परियोजनाओं,स्थानीय अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढाँचे को भी गंभीर नुकसान पहुँचाया है।
इस भीषण आपदा ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन,ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और अचानक आने वाली बाढ़ के बढ़ते खतरे को लेकर चिंता बढ़ा दी है। फिलहाल नेपाल की प्राथमिकता लापता लोगों की तलाश,प्रभावित परिवारों को राहत पहुँचाना और सामान्य स्थिति बहाल करना है,लेकिन इस त्रासदी के घाव लंबे समय तक देश को प्रभावित करते रहेंगे। मृतकों की लगातार बढ़ती संख्या और हजारों लापता लोगों की अनिश्चितता ने पूरे नेपाल को शोक और चिंता के माहौल में डाल दिया है।
