वॉशिंगटन,26 सितंबर (युआईटीवी)- अमेरिका में एच-1बी वीजा को लेकर ट्रंप प्रशासन के प्रस्ताव पर विवाद बढ़ गया है। 22 राज्यों और डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया के अटॉर्नी जनरल के एक गठबंधन ने एच-1बी वीजा याचिकाओं पर 1,03,265 डॉलर तक शुल्क लगाने के प्रस्ताव का विरोध किया है। गठबंधन ने अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा से प्रस्तावित नियम को वापस लेने की माँग करते हुए इसे कानूनी अधिकार क्षेत्र से बाहर और राज्यों के लिए नुकसानदायक बताया है। अटॉर्नी जनरल्स का कहना है कि इतनी बड़ी राशि का बोझ राज्य और स्थानीय संस्थानों के लिए कुशल विदेशी पेशेवरों को नियुक्त करना मुश्किल बना सकता है, खासकर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा जैसे क्षेत्रों में।
कैलिफोर्निया के अटॉर्नी जनरल रॉब बोंटा और मैसाचुसेट्स की अटॉर्नी जनरल एंड्रिया जॉय कैंपबेल के नेतृत्व में इस गठबंधन ने 24 सितंबर को प्रस्तावित नियम पर औपचारिक टिप्पणी दाखिल की। इसमें आरोप लगाया गया कि प्रस्तावित शुल्क से राज्यों की उन क्षेत्रों में कर्मचारियों की कमी दूर करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है, जहां पहले से ही शिक्षकों,चिकित्सकों और नर्सों जैसे प्रशिक्षित कर्मचारियों की आवश्यकता है। गठबंधन ने यह भी सवाल उठाया कि क्या अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा को कांग्रेस की स्पष्ट मंजूरी के बिना इतनी बड़ी राशि वसूलने का अधिकार है।
अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा ने 25 अगस्त 2026 को प्रस्तावित नियम बनाने का नोटिस जारी किया था। प्रस्ताव के तहत उन नियोक्ताओं की एच-1बी याचिकाओं पर 1,03,265 डॉलर का शुल्क लगाया जाना है,जो सालाना एच-1बी वीजा कोटे से छूट प्राप्त नहीं हैं। प्रस्तावित राशि पिछले वर्ष सामने आए 1,00,000 डॉलर के शुल्क से भी अधिक है। इस वजह से अमेरिकी राज्यों में काम करने वाले विदेशी पेशेवरों और उन संस्थानों के लिए यह मुद्दा महत्वपूर्ण हो गया है,जो विशेष योग्यता वाले कर्मचारियों की भर्ती के लिए एच-1बी कार्यक्रम का इस्तेमाल करते हैं।
गठबंधन में शामिल अटॉर्नी जनरल्स ने प्रस्तावित राशि को सामान्य प्रशासनिक शुल्क के बजाय कर के रूप में वर्णित किया है। उनका तर्क है कि कार्यपालिका शाखा कांग्रेस की अनुमति के बिना इस तरह का कर नहीं लगा सकती। उनके मुताबिक, यदि सरकार किसी शुल्क को इस स्तर तक बढ़ाती है कि उसका उद्देश्य केवल प्रशासनिक प्रक्रिया की लागत की भरपाई से आगे निकल जाए,तो उसके लिए अलग कानूनी आधार की जरूरत हो सकती है। अटॉर्नी जनरल्स ने इसी आधार पर प्रस्ताव को अमेरिकी संविधान और संघीय कानून के तहत चुनौती देने की स्थिति का संकेत दिया है।
गठबंधन ने यह भी दावा किया कि प्रस्तावित नियम आव्रजन एवं राष्ट्रीयता अधिनियम के तहत अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा को मिले अधिकार से आगे जाता है। इसके अलावा अटॉर्नी जनरल्स ने प्रशासनिक प्रक्रिया अधिनियम का हवाला देते हुए कहा कि एजेंसी ने राज्यों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का पर्याप्त आकलन नहीं किया है। उनके अनुसार,सरकार को कम नुकसानदायक विकल्पों पर भी विचार करना चाहिए था। प्रस्ताव पर केवल 30 दिनों की सार्वजनिक टिप्पणी अवधि रखे जाने पर भी गठबंधन ने आपत्ति जताई है। उसका कहना है कि इतने व्यापक प्रभाव वाले बदलाव के लिए यह अवधि पर्याप्त नहीं है।
वर्जीनिया के अटॉर्नी जनरल जे जोन्स ने इस मुद्दे पर कहा कि एच-1बी श्रेणी के लोग केवल कागजों पर मौजूद नाम नहीं हैं,बल्कि वे शिक्षक, डॉक्टर, नर्स और देखभाल से जुड़े कर्मचारी हैं। उन्होंने कहा कि इनमें से कई लोग अमेरिका में आने और वहाँ काम करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया से गुजरते हैं तथा सरकार की ओर से माँगी गई आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। जोन्स ने प्रशासन पर आरोप लगाया कि वह अपने कार्यकारी अधिकार का विस्तार करते समय स्थानीय समुदायों और सार्वजनिक सेवाओं पर पड़ने वाले प्रभाव को पर्याप्त महत्व नहीं दे रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि वर्जीनिया जैसे राज्यों में स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा से जुड़े संस्थानों को प्रशिक्षित कर्मचारियों की जरूरत है और प्रस्तावित शुल्क ऐसे संस्थानों के लिए भर्ती प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। हालाँकि,ये टिप्पणियाँ प्रस्ताव का विरोध करने वाले गठबंधन की स्थिति को दर्शाती हैं। प्रस्ताव के अंतिम प्रभाव और इसकी कानूनी वैधता का निर्धारण आगे की प्रशासनिक प्रक्रिया और संभावित न्यायिक समीक्षा पर निर्भर करेगा।
एच-1बी कार्यक्रम अमेरिकी नियोक्ताओं को उन विशेष व्यवसायों के लिए विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने की अनुमति देता है, जिनमें आम तौर पर विशेष ज्ञान और कम से कम स्नातक डिग्री या उसके समकक्ष योग्यता की आवश्यकता होती है। इस कार्यक्रम का इस्तेमाल प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कंपनियों के अलावा अस्पतालों, विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और स्कूलों द्वारा भी किया जाता है। इसलिए प्रस्तावित शुल्क का प्रभाव केवल तकनीकी कंपनियों तक सीमित रहने की बजाय सार्वजनिक सेवाओं और उच्च कौशल वाले रोजगार से जुड़े कई क्षेत्रों तक पहुँच सकता है।
भारतीय पेशेवरों के लिए भी यह मुद्दा महत्वपूर्ण है। भारत लंबे समय से एच-1बी कार्यक्रम के प्रमुख लाभार्थियों में शामिल रहा है और बड़ी संख्या में भारतीय तकनीकी विशेषज्ञ तथा अन्य उच्च कौशल वाले पेशेवर अमेरिकी कंपनियों में काम करते हैं। हालाँकि,प्रस्तावित नियम का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतिम नियम किस रूप में लागू होता है,किन याचिकाओं पर शुल्क लगाया जाता है और किन परिस्थितियों में छूट उपलब्ध रहती है। इसलिए फिलहाल इसे सभी एच-1बी आवेदनों पर समान रूप से लागू होने वाला शुल्क मानना सही नहीं होगा।
यह विवाद पिछले साल एच-1बी वीजा पर 1,00,000 डॉलर के शुल्क को लेकर हुए कानूनी संघर्ष की पृष्ठभूमि में भी सामने आया है। कैलिफोर्निया के अटॉर्नी जनरल के कार्यालय के अनुसार,सितंबर 2025 में ट्रंप प्रशासन ने नए एच-1बी वीजा याचिकाओं पर 1,00,000 डॉलर का शुल्क लगाने की नीति लागू की थी। इसके खिलाफ राज्यों और अन्य पक्षों ने कानूनी चुनौती दी। जून 2026 में एक संघीय अदालत ने उस नीति को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया। इसके बाद अब प्रस्तावित नया नियम एक बार फिर कानूनी अधिकार और शुल्क लगाने की शक्ति को लेकर बहस के केंद्र में है।
कैलिफोर्निया के अटॉर्नी जनरल कार्यालय के अनुसार,पहले लगाए गए 1,00,000 डॉलर के शुल्क के खिलाफ दायर मामले में यह सवाल भी उठाया गया था कि कार्यपालिका शाखा को कांग्रेस की मंजूरी के बिना इतनी बड़ी राशि लगाने का अधिकार है या नहीं। जून 2026 के अदालत के आदेश में शुल्क की प्रकृति और सरकार के अधिकार से जुड़े तर्कों पर विस्तार से विचार किया गया था। इस पृष्ठभूमि में मौजूदा प्रस्ताव को लेकर राज्यों की आपत्ति केवल शुल्क की राशि तक सीमित नहीं है,बल्कि यह भी सवाल है कि इस तरह की राशि तय करने के लिए एजेंसी के पास पर्याप्त वैधानिक अधिकार है या नहीं।
इस बार गठबंधन में वर्जीनिया के अलावा कैलिफोर्निया, मैसाचुसेट्स, एरिजोना, कोलोराडो, कनेक्टिकट, डेलावेयर, हवाई, इलिनॉय, मेन, मैरीलैंड, मिशिगन, मिनेसोटा, नेवाडा, न्यू जर्सी, न्यू मैक्सिको, न्यूयॉर्क, नॉर्थ कैरोलिना, ओरेगन, वॉशिंगटन, विस्कॉन्सिन और डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया के अटॉर्नी जनरल शामिल हैं।
गठबंधन का कहना है कि प्रस्तावित शुल्क का असर खास तौर पर उन सार्वजनिक संस्थानों पर पड़ सकता है,जिनके पास निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनियों की तुलना में सीमित भर्ती बजट होता है। स्कूलों, अस्पतालों, विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों को ऐसे पदों के लिए विशेषज्ञ कर्मचारियों की आवश्यकता होती है,जिन्हें स्थानीय स्तर पर भरना हमेशा आसान नहीं होता। अटॉर्नी जनरल्स ने इसी आधार पर चेतावनी दी है कि अत्यधिक शुल्क से विदेशी पेशेवरों की भर्ती की लागत बढ़ सकती है और कुछ संस्थानों के लिए एच-1बी कर्मचारियों को नियुक्त करना आर्थिक रूप से कठिन हो सकता है।
हालाँकि,प्रस्ताव अभी अंतिम नियम नहीं है। अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा द्वारा जारी प्रस्ताव पर सार्वजनिक टिप्पणियाँ माँगी गई हैं और इसके बाद एजेंसी को प्राप्त सुझावों और आपत्तियों पर विचार करना होगा। अंतिम नियम का स्वरूप मौजूदा प्रस्ताव से अलग हो सकता है। इसके अलावा,यदि अंतिम व्यवस्था को कानूनी चुनौती दी जाती है तो अदालतें भी इसकी वैधता और एजेंसी के अधिकार क्षेत्र पर निर्णय कर सकती हैं।
इस तरह एच-1बी वीजा पर 1,03,265 डॉलर के प्रस्तावित शुल्क ने अमेरिका में आव्रजन नीति, उच्च कौशल वाले विदेशी कर्मचारियों की भर्ती और संघीय बनाम राज्य हितों के बीच बहस को फिर सामने ला दिया है। एक ओर प्रशासन की प्रस्तावित व्यवस्था है,जबकि दूसरी ओर 22 अटॉर्नी जनरल का गठबंधन इसे राज्यों,नियोक्ताओं और सार्वजनिक सेवाओं पर संभावित बोझ के रूप में देख रहा है। अब आगे की सार्वजनिक टिप्पणी प्रक्रिया और प्रस्तावित नियम पर प्रशासन के अंतिम फैसले से यह स्पष्ट होगा कि एच-1बी वीजा व्यवस्था में यह बदलाव किस रूप में सामने आता है।
