संयुक्त राष्ट्र,23 अक्टूबर (युआईटीवी)- भारत ने संयुक्त राष्ट्र में धार्मिक या आस्था की स्वतंत्रता और अंतिम संस्कार के अधिकारों से संबंधित एक रिपोर्ट पर कड़ी आपत्ति जताई है। भारत का कहना है कि रिपोर्ट में तथ्यों को प्रस्तुत करने के दौरान पक्षपात दिखाई देता है और आतंकवाद के कारण होने वाले नुकसान तथा पीड़ितों के अधिकारों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है। भारत ने यह भी सवाल उठाया कि कोविड-19 महामारी के दौरान मृतकों को दफनाने से जुड़ी कथित भेदभावपूर्ण घटनाओं का उल्लेख करते समय विकासशील देशों पर ही ध्यान क्यों केंद्रित किया गया,जबकि विकसित देशों में हुई ऐसी घटनाओं को रिपोर्ट में जगह नहीं दी गई।
संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में भारत की ओर से प्रथम सचिव भाविका मंगलानंदन ने यह मुद्दा उठाया। वह धार्मिक या आस्था की स्वतंत्रता पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत नजीला घनेया की रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया दे रही थीं। इस रिपोर्ट का विषय असाधारण परिस्थितियों में धार्मिक या आस्था की स्वतंत्रता और अंतिम संस्कार के अधिकार से जुड़ा था। रिपोर्ट में कश्मीर में सुरक्षा अभियानों के दौरान मारे गए कुछ लोगों के शव उनके परिवारों को नहीं सौंपे जाने और उन्हें दूरदराज के इलाकों में दफनाए जाने का उल्लेख किया गया था। इसके अलावा,नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध प्रदर्शनों के दौरान मारे गए कुछ लोगों के अंतिम संस्कार पर कथित रूप से लगाए गए प्रतिबंधों का भी जिक्र किया गया था।
भारत ने रिपोर्ट में उठाए गए इन मुद्दों पर असहमति जताते हुए कहा कि मानवीय पीड़ा और नुकसान को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। भारतीय प्रतिनिधि ने आतंकवाद से प्रभावित परिवारों की स्थिति और उनके अधिकारों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता बताई। उनका कहना था कि किसी भी मानवाधिकार रिपोर्ट में सभी संबंधित पक्षों और घटनाओं को संतुलित तरीके से देखना जरूरी है। यदि किसी रिपोर्ट में एक पक्ष के अधिकारों पर विस्तार से चर्चा की जाती है,लेकिन आतंकवादी हिंसा के पीड़ितों की पीड़ा को पर्याप्त स्थान नहीं मिलता,तो उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
भाविका मंगलानंदन ने अपने संबोधन में कहा कि लोगों के दर्द और नुकसान से राजनीतिक फायदा उठाना किसी विशेष दूत की रिपोर्ट तैयार करने का आधार नहीं होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर हैरानी जताई कि आतंकवादियों के अधिकारों की वकालत तो जोरदार तरीके से की जाती है,लेकिन आतंकवाद के पीड़ितों के लिए वैसी चिंता दिखाई नहीं देती। भारत की आपत्ति का मुख्य आधार यही था कि मानवाधिकारों की चर्चा करते समय उन निर्दोष लोगों को भी केंद्र में रखा जाना चाहिए,जिनकी जान आतंकवादी घटनाओं में चली जाती है या जिनके परिवारों को लंबे समय तक उसके परिणाम भुगतने पड़ते हैं।
भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि आतंकवादी मानवाधिकारों के सबसे बुनियादी सिद्धांत, यानी जीवन के अधिकार,का उल्लंघन करते हैं। आतंकवादी गतिविधियाँ केवल लोगों की जान लेने तक सीमित नहीं रहतीं,बल्कि वे समाज और देश के मनोबल को भी प्रभावित करती हैं। ऐसी घटनाओं से प्रभावित परिवारों को अपूरणीय क्षति होती है और समुदायों में भय तथा असुरक्षा की भावना पैदा हो सकती है। भारत का तर्क था कि मानवाधिकारों पर चर्चा करते समय इन पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
भारत की ओर से यह टिप्पणी ऐसे समय में की गई,जब संयुक्त राष्ट्र के मंच पर धार्मिक स्वतंत्रता,अंतिम संस्कार की परंपराओं और मृतकों के सम्मानजनक निपटान जैसे विषयों पर चर्चा हो रही थी। अंतिम संस्कार कई समुदायों के लिए धार्मिक आस्था,सांस्कृतिक परंपरा और पारिवारिक सम्मान से जुड़ा विषय है। इसलिए किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके शव को परिवार को सौंपने,धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार करने और शोक मनाने के अधिकार को महत्वपूर्ण माना जाता है। हालाँकि,सुरक्षा संबंधी परिस्थितियों में अधिकारियों की कार्रवाई, सार्वजनिक व्यवस्था और परिवारों के अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर अलग-अलग पक्षों के विचार सामने आते रहे हैं।
विशेष दूत की रिपोर्ट में कश्मीर से जुड़े कुछ मामलों का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार,सुरक्षा अभियानों में मारे गए कुछ लोगों के शव उनके परिजनों को नहीं दिए गए और उन्हें दूरस्थ स्थानों पर दफनाया गया। रिपोर्ट में इसे अंतिम संस्कार के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े सवाल के रूप में उठाया गया। इसमें नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध प्रदर्शनों के दौरान मारे गए कुछ लोगों के अंतिम संस्कार पर अधिकारियों की ओर से कथित प्रतिबंध लगाए जाने का भी जिक्र था। इन प्रतिबंधों के लिए कानून-व्यवस्था से जुड़ी परिस्थितियों को आधार बनाए जाने की बात कही गई थी।
भारत ने रिपोर्ट की इन टिप्पणियों पर आपत्ति जताई। भारतीय पक्ष ने संकेत दिया कि ऐसे संवेदनशील विषयों पर निष्कर्ष निकालते समय व्यापक परिस्थितियों,सुरक्षा संबंधी चुनौतियों और घटनाओं के अलग-अलग पहलुओं पर विचार किया जाना चाहिए। भारत की आलोचना रिपोर्ट में प्रस्तुत तथ्यों के चयन और उनके संदर्भ को लेकर थी। हालाँकि, रिपोर्ट में उठाए गए आरोपों और भारत की आपत्तियों के बीच अंतर को समझना जरूरी है। रिपोर्ट में दर्ज बातें विशेष दूत के निष्कर्षों और संबंधित मामलों के आकलन को दर्शाती हैं, जबकि भारत ने उनके प्रस्तुतीकरण को पक्षपातपूर्ण बताया।
धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत मानवाधिकार परिषद की ओर से नियुक्त किए जाते हैं। वे स्वतंत्र रूप से काम करते हैं और विभिन्न देशों में धार्मिक या आस्था संबंधी अधिकारों की स्थिति पर रिपोर्ट प्रस्तुत करते हैं। नजीला घनेया ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून की प्रोफेसर हैं। उनकी रिपोर्ट का उद्देश्य असाधारण परिस्थितियों में धार्मिक स्वतंत्रता और अंतिम संस्कार के अधिकारों से जुड़े प्रश्नों का आकलन करना था। भारत की प्रतिक्रिया ने इस रिपोर्ट के निष्कर्षों और उसके दायरे को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मतभेद को सामने रखा।
भारत ने रिपोर्ट की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए कोविड-19 महामारी के दौरान मृतकों को दफनाने से संबंधित घटनाओं का मुद्दा भी उठाया। भाविका मंगलानंदन ने कहा कि रिपोर्ट को पढ़ने से ऐसा प्रतीत होता है कि महामारी के दौरान गलतियाँ और भेदभाव केवल विकासशील देशों में ही हुए थे। उन्होंने सवाल किया कि यदि विकसित देशों में भी इसी तरह की दुखद घटनाएँ हुई थीं,तो उनका उल्लेख नहीं करने से रिपोर्ट को क्या हासिल होता है।
भारतीय प्रतिनिधि ने न्यूयॉर्क शहर का उदाहरण देते हुए कहा कि कोविड-19 महामारी के दौरान वहाँ हजारों मृतकों को शहर से दूर एक अलग द्वीप पर सामूहिक कब्रों में दफनाया गया था। उनके अनुसार,रिपोर्ट में ऐसी घटनाओं का उल्लेख नहीं किया गया। भारत ने इस उदाहरण के जरिए यह तर्क दिया कि महामारी जैसी असाधारण परिस्थितियों का आकलन करते समय किसी एक क्षेत्र या देशों के समूह पर ध्यान केंद्रित करना पर्याप्त नहीं है। रिपोर्ट में समान प्रकृति की घटनाओं को शामिल करने से उसका तुलनात्मक दृष्टिकोण अधिक व्यापक हो सकता था।
कोविड-19 महामारी के शुरुआती दौर में दुनिया के अनेक देशों की स्वास्थ्य प्रणालियों पर भारी दबाव पड़ा था। बड़ी संख्या में लोगों की मौत होने के कारण कई स्थानों पर शवों के संरक्षण,पहचान,परिवहन और अंतिम संस्कार की व्यवस्थाओं को लेकर असाधारण चुनौतियाँ सामने आई थीं। कुछ जगहों पर धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करने और परिवारों को मृतकों के अंतिम दर्शन की अनुमति देने में भी कठिनाइयाँ आई थीं। ऐसी परिस्थितियों का आकलन करते समय स्थानीय स्वास्थ्य संबंधी नियमों,उपलब्ध संसाधनों और प्रशासनिक फैसलों को ध्यान में रखना जरूरी होता है।
भारत की आपत्ति का आशय था कि यदि रिपोर्ट का उद्देश्य असाधारण परिस्थितियों में अंतिम संस्कार के अधिकारों की स्थिति का वैश्विक आकलन करना है,तो उसमें विभिन्न देशों के अनुभवों को समान रूप से देखने का प्रयास होना चाहिए। भारतीय पक्ष ने विकसित देशों में हुई घटनाओं को शामिल नहीं किए जाने को रिपोर्ट के चयनात्मक दृष्टिकोण का उदाहरण बताया। हालाँकि,किसी रिपोर्ट में किसी घटना का उल्लेख न होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसके निष्कर्ष गलत हैं। ऐसे मामलों में रिपोर्ट के दायरे, इस्तेमाल किए गए साक्ष्यों और अपनाई गई पद्धति का आकलन महत्वपूर्ण होता है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के दौरान भारत ने पाकिस्तान की ओर से लगाए गए आरोपों का भी जवाब दिया। भाविका मंगलानंदन ने पाकिस्तान के रुख को विडंबनापूर्ण बताते हुए वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जिस देश ने युद्ध में मारे गए अपने कुछ सैनिकों के शव तक स्वीकार नहीं किए थे,वह आज धार्मिक स्वतंत्रता और दफनाने के अधिकारों पर बड़े उत्साह से बोल रहा है।
भारतीय प्रतिनिधि ने दावा किया कि कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना ने कई पाकिस्तानी सैनिकों के शवों को सैन्य सम्मान दिया और इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार उनका अंतिम संस्कार किया। भारत ने इस उदाहरण के जरिए पाकिस्तान के आरोपों पर सवाल उठाते हुए कहा कि धार्मिक परंपराओं और मृतकों के सम्मान से जुड़े विषयों पर चर्चा करते समय उसके अपने आचरण को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
भाविका मंगलानंदन ने पाकिस्तान से कहा कि भारत पर लगातार टिप्पणी करने के बजाय उसे उस कश्मीर क्षेत्र पर ध्यान देना चाहिए,जिस पर भारत अवैध कब्जा होने की बात कहता है। भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर का मुद्दा लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। दोनों देश इस क्षेत्र को लेकर अलग-अलग दावे करते हैं और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर एक-दूसरे की नीतियों की आलोचना करते रहे हैं। इस बैठक में भी धार्मिक स्वतंत्रता और अंतिम संस्कार के अधिकारों पर चर्चा के साथ दोनों देशों के बीच राजनीतिक मतभेद सामने आए।
भारत ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर भी चिंता जताई। भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकार लगातार सीमित हो रहे हैं और उनके साथ दुर्व्यवहार की घटनाएँ सामने आती रहती हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जो देश अपने यहाँ अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता,उसे भारत को मानवाधिकारों पर उपदेश देने का क्या अधिकार है।
यह टिप्पणी भारत और पाकिस्तान के बीच मानवाधिकारों को लेकर जारी आरोप-प्रत्यारोप का हिस्सा थी। दोनों देश अक्सर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर एक-दूसरे के यहां धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और नागरिक अधिकारों से जुड़े मुद्दे उठाते हैं। ऐसे आरोपों का निष्पक्ष आकलन करने के लिए स्वतंत्र साक्ष्यों,विश्वसनीय आँकड़ों और संबंधित घटनाओं की जाँच आवश्यक होती है।
संयुक्त राष्ट्र की तीसरी समिति में भारत के बयान ने यह स्पष्ट किया कि नई दिल्ली धार्मिक स्वतंत्रता और अंतिम संस्कार के अधिकारों पर तैयार रिपोर्ट को लेकर कई सवाल उठा रही है। भारत ने रिपोर्ट में आतंकवाद के पीड़ितों की स्थिति को अधिक महत्व देने,कोविड-19 के दौरान विकसित देशों के अनुभवों को शामिल करने और विभिन्न घटनाओं को व्यापक संदर्भ में देखने की माँग की। दूसरी ओर,विशेष दूत की रिपोर्ट ने कश्मीर और नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामलों को अंतिम संस्कार के अधिकारों के नजरिये से उठाया था।
इस पूरे विवाद के केंद्र में दो महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। पहला,असाधारण परिस्थितियों में धार्मिक आस्था,मृतकों के सम्मान और परिवारों के अधिकारों की रक्षा किस तरह सुनिश्चित की जाए। दूसरा,मानवाधिकारों से जुड़ी अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्टों में तथ्यों, आरोपों और अलग-अलग देशों के अनुभवों को किस तरह संतुलित रूप में प्रस्तुत किया जाए। भारत की प्रतिक्रिया ने इन सवालों पर अपना पक्ष रखा और संयुक्त राष्ट्र के मंच पर रिपोर्ट के दायरे तथा निष्पक्षता को लेकर बहस को आगे बढ़ाया।
