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अमेरिकी चुनाव से पहले मेटा पर उठे सवाल, ‘नो किंग्स कोएलिशन’ का इंस्टाग्राम अकाउंट बंद होने पर 14 राज्यों के अटॉर्नी जनरल्स ने माँगा जवाब

वाशिंगटन,27 अक्टूबर (युआईटीवी)- अमेरिका में तीन नवंबर को होने वाले कांग्रेस चुनावों से पहले सोशल मीडिया कंपनी मेटा एक नए विवाद में घिर गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के विरोध में सक्रिय संगठन ‘नो किंग्स कोएलिशन’ का इंस्टाग्राम अकाउंट अस्थायी रूप से निलंबित किए जाने के बाद राजनीतिक अभिव्यक्ति और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही को लेकर सवाल उठने लगे हैं। इस मामले में 14 राज्यों के अटॉर्नी जनरल्स ने कंपनी से स्पष्टीकरण मांगा है। अधिकारियों ने जानना चाहा है कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान संगठन का अकाउंट किस वजह से बंद किया गया और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए मेटा क्या कदम उठाएगी।

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है,जब अमेरिका में चुनाव प्रचार और मतदान से जुड़ी गतिविधियां तेज हैं। राजनीतिक दलों,सामाजिक संगठनों और मतदाता समूहों के लिए सोशल मीडिया लोगों तक पहुँचने,कार्यक्रमों की जानकारी साझा करने और समर्थकों को संगठित करने का प्रमुख माध्यम बन चुका है। ऐसे में किसी राजनीतिक संगठन के अकाउंट का अचानक बंद होना उसके प्रचार और संवाद की क्षमता को प्रभावित कर सकता है।

मेटा ने स्वीकार किया है कि अकाउंट को निलंबित करना एक गलती थी। कंपनी के अनुसार, संगठन के अकाउंट पर अचानक गतिविधियाँ काफी बढ़ गई थीं। उसके स्वचालित सुरक्षा तंत्र ने इस असामान्य गतिविधि को संदिग्ध समझ लिया और कार्रवाई कर दी। हालाँकि,इस मामले में अब तक ऐसा कोई प्रमाण सामने नहीं आया है कि संगठन को उसकी राजनीतिक विचारधारा के कारण जानबूझकर निशाना बनाया गया था।

‘नो किंग्स कोएलिशन’ के अनुसार,17 अक्टूबर को देशभर में विरोध प्रदर्शन आयोजित किए जा रहे थे। इसी दौरान पूर्वी अमेरिकी समय के अनुसार दोपहर करीब 1:30 बजे संगठन का इंस्टाग्राम अकाउंट निलंबित कर दिया गया। उस समय संगठन अपने समर्थकों तक प्रदर्शन से जुड़ी सूचनाएँ पहुँचाने और गतिविधियों का समन्वय करने में लगा हुआ था।

अकाउंट बंद होने के लगभग 90 मिनट बाद वह फिर से सार्वजनिक रूप से दिखाई देने लगा। हालाँकि,संगठन के संचालक कई घंटों तक अपने अकाउंट में प्रवेश नहीं कर पाए। पूरी तरह पहुँच बहाल होने में चार घंटे से अधिक समय लग गया। इस दौरान संगठन को अपने समर्थकों तक संदेश पहुँचाने और जरूरी जानकारियाँ साझा करने में परेशानी हुई।

राजनीतिक प्रदर्शनों के दौरान समय पर जानकारी पहुंचाना महत्वपूर्ण होता है। प्रदर्शन स्थल,कार्यक्रम के समय,प्रतिभागियों के समन्वय और अन्य आवश्यक सूचनाओं में बदलाव होने पर आयोजक सोशल मीडिया के माध्यम से समर्थकों को अपडेट करते हैं। ऐसे समय अकाउंट की पहुँच बाधित होने से संगठन की गतिविधियाँ प्रभावित हो सकती हैं।

इस घटना ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या सोशल मीडिया कंपनियों की स्वचालित निगरानी प्रणालियाँ वास्तविक राजनीतिक गतिविधियों और संदिग्ध ऑनलाइन व्यवहार के बीच पर्याप्त अंतर कर पाती हैं। किसी अकाउंट पर अचानक बड़ी संख्या में लोग पहुँचें, पोस्ट साझा करें या टिप्पणियाँ करें,तो यह किसी लोकप्रिय अभियान का परिणाम भी हो सकता है,लेकिन यही गतिविधि स्वचालित सुरक्षा प्रणाली को असामान्य लग सकती है।

कनेक्टिकट के अटॉर्नी जनरल विलियम टोंग के नेतृत्व में 14 राज्यों के अधिकारियों ने मेटा को पत्र लिखकर इस मामले पर विस्तृत जानकारी माँगी है। इस समूह में कैलिफोर्निया, मैरीलैंड, न्यूयॉर्क, मैसाचुसेट्स और वॉशिंगटन सहित कई राज्यों के अटॉर्नी जनरल शामिल हैं।

अधिकारियों ने कंपनी से पूछा है कि उसे अकाउंट के निलंबन की जानकारी कब मिली, कार्रवाई किस आधार पर की गई और अकाउंट को बहाल करने के लिए कौन-कौन से कदम उठाए गए। उन्होंने यह भी जानना चाहा है कि क्या अकाउंट को बंद करने से पहले किसी मानव समीक्षक ने मामले की जाँच की थी या यह फैसला पूरी तरह स्वचालित प्रणाली के आधार पर लिया गया था।

इसके अलावा,अधिकारियों ने मेटा से पूछा है कि क्या चुनावों से संबंधित दूसरे वैध अकाउंट भी ऐसी ही कार्रवाई से प्रभावित हुए हैं। वे यह समझना चाहते हैं कि कंपनी की सुरक्षा व्यवस्था में किस तरह के संकेतों को संदिग्ध माना जाता है और किसी अकाउंट के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले उसकी गतिविधियों का आकलन कैसे किया जाता है।

राज्य अधिकारियों ने कंपनी से 29 अक्टूबर तक जवाब देने को कहा है। यह तारीख कांग्रेस चुनावों से पाँच दिन पहले पड़ती है। जवाब की समय-सीमा को देखते हुए इस मामले में चुनाव से पहले स्पष्टीकरण मिलने की संभावना महत्वपूर्ण हो जाती है। हालाँकि, कंपनी की ओर से इस समय-सीमा के भीतर क्या जानकारी दी जाती है,यह आगे स्पष्ट होगा।

कैलिफोर्निया के अटॉर्नी जनरल रॉब बोंटा ने कहा कि सोशल मीडिया अब राजनीतिक संवाद का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। उनके मुताबिक,कैलिफोर्निया के लाखों लोग संगठित होने,समाचार और जानकारियाँ हासिल करने तथा चुनाव से जुड़े अपडेट पाने के लिए इन प्लेटफॉर्म पर निर्भर रहते हैं।

बोंटा ने यह भी कहा कि अकाउंट का निलंबन उस समय हुआ,जब ‘नो किंग्स कोएलिशन’ लोगों को अग्रिम मतदान के लिए प्रेरित करने का अभियान चला रही थी। ऐसे समय किसी संगठन की ऑनलाइन पहुँच बाधित होने से उसके समर्थकों तक जानकारी पहुँचाने के प्रयास प्रभावित हो सकते हैं।

राज्य अधिकारियों की ओर से जवाब माँगने से पहले अमेरिकी सीनेट के पाँच डेमोक्रेटिक सदस्यों ने भी इस मामले को लेकर मेटा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क जुकरबर्ग को पत्र लिखा था। 22 अक्टूबर को भेजे गए पत्र में सांसदों ने कंपनी की स्वचालित सामग्री निगरानी प्रणाली और राजनीतिक संगठनों पर उसके संभावित प्रभाव को लेकर चिंता जताई थी।

पत्र लिखने वाले सांसदों में क्रिस वैन होलेन, रॉन वायडन, जेफ मर्कली, रिचर्ड ब्लूमेंथल और क्रिस मर्फी शामिल थे। उन्होंने जानना चाहा कि मेटा की स्वचालित प्रणाली वैध राजनीतिक गतिविधियों और संदिग्ध ऑनलाइन व्यवहार के बीच किस तरह अंतर करती है।

सांसदों ने अकाउंट निलंबित करने की प्रक्रिया और गलती सामने आने पर उसे बहाल करने के नियमों के बारे में भी जानकारी माँगी। उनका सवाल था कि क्या कंपनी के पास ऐसी व्यवस्था है, जिसके जरिए किसी राजनीतिक संगठन को गलत तरीके से निलंबित किए जाने की स्थिति में तत्काल समीक्षा की जा सके।

इसके अलावा,सांसदों ने यह भी पूछा कि क्या मेटा के अधिकारियों ने ‘नो किंग्स’ आंदोलन या दूसरे राजनीतिक प्रदर्शनों को लेकर ट्रंप प्रशासन के साथ कोई बातचीत की थी। इस सवाल का संबंध इस आशंका से था कि कहीं सरकारी अधिकारियों और सोशल मीडिया कंपनी के बीच किसी तरह के संवाद ने अकाउंट से जुड़ी कार्रवाई को प्रभावित तो नहीं किया।

हालाँकि,उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ऐसा कोई प्रमाण सामने नहीं आया है,जिससे यह साबित हो कि ट्रंप प्रशासन ने अकाउंट निलंबित करने का निर्देश दिया था या कंपनी के फैसले को प्रभावित किया था। इसलिए फिलहाल इस घटना को राजनीतिक दबाव का परिणाम मानने के बजाय कंपनी की स्वचालित निगरानी प्रणाली से जुड़ी गलती के रूप में देखा जा रहा है।

मेटा जैसे बड़े तकनीकी मंचों पर हर दिन बड़ी संख्या में पोस्ट, टिप्पणियाँ,संदेश और अन्य गतिविधियाँ होती हैं। इतनी विशाल मात्रा में सामग्री की निगरानी के लिए कंपनियाँ स्वचालित प्रणालियों का इस्तेमाल करती हैं। इन प्रणालियों का उद्देश्य स्पैम,फर्जी खातों, बॉट्स और संगठित ऑनलाइन हेरफेर की पहचान करना है।

यदि किसी अकाउंट पर बहुत कम समय में गतिविधि अचानक बढ़ जाती है,तो सुरक्षा प्रणाली उसे असामान्य मान सकती है। उदाहरण के लिए, एक ही समय में बड़ी संख्या में लोग किसी पोस्ट को साझा करें या किसी अभियान के बारे में जानकारी फैलाएँ,तो सिस्टम इसे संभावित स्वचालित गतिविधि समझ सकता है। ऐसी स्थिति में अकाउंट पर अस्थायी रोक लगाई जा सकती है।

हालाँकि,राजनीतिक अभियान और बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम भी अचानक ऑनलाइन गतिविधि बढ़ा सकते हैं। प्रदर्शन के आयोजक लोगों से पोस्ट साझा करने,कार्यक्रमों की जानकारी फैलाने और अधिक से अधिक प्रतिभागियों तक संदेश पहुँचाने की अपील करते हैं। इसके परिणामस्वरूप वास्तविक उपयोगकर्ताओं की गतिविधि भी तेजी से बढ़ सकती है।

यही इस विवाद का मुख्य पहलू है। यदि स्वचालित प्रणाली वास्तविक और वैध गतिविधियों को संदिग्ध मान लेती है,तो निर्दोष अकाउंट भी कार्रवाई की चपेट में आ सकते हैं। दूसरी ओर,यदि कंपनियाँ संदिग्ध गतिविधियों पर समय रहते कार्रवाई नहीं करतीं,तो फर्जी अकाउंट और संगठित हेरफेर का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए तकनीकी सुरक्षा और वैध अभिव्यक्ति के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण है।

इस मामले में मानव समीक्षा की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। स्वचालित प्रणाली किसी अकाउंट को संदिग्ध चिह्नित कर सकती है,लेकिन जटिल परिस्थितियों में मानवीय जांच से यह समझने में मदद मिल सकती है कि गतिविधि वास्तविक अभियान का हिस्सा है या नियमों का उल्लंघन। राज्य अधिकारियों और सांसदों के सवालों में यह जानने की कोशिश भी शामिल है कि मेटा की व्यवस्था में ऐसी समीक्षा कितनी प्रभावी है।

‘नो किंग्स कोएलिशन’ के अकाउंट से जुड़ा विवाद केवल एक सोशल मीडिया खाते के निलंबन तक सीमित नहीं है। इसने चुनाव से पहले राजनीतिक संगठनों की ऑनलाइन पहुँच,तकनीकी कंपनियों की जवाबदेही और सामग्री पर नियंत्रण की प्रक्रिया को लेकर व्यापक चर्चा शुरू कर दी है।

अमेरिका में राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के लिए डिजिटल मंच प्रचार, सार्वजनिक संवाद और मतदाताओं को जानकारी देने का अहम साधन हैं। यदि किसी संगठन की पहुँच अचानक सीमित हो जाती है,तो उसके अभियान पर असर पड़ सकता है। वहीं,सोशल मीडिया कंपनियों के सामने यह जिम्मेदारी भी है कि वे फर्जी गतिविधियों और ऑनलाइन हेरफेर को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाएँ।

इसलिए मेटा के सामने चुनौती केवल यह बताने की नहीं है कि अकाउंट गलती से क्यों बंद हुआ,बल्कि यह भी स्पष्ट करने की है कि ऐसी गलतियों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या सुधार किए जाएँगे। पारदर्शी समीक्षा,समय पर अपील का समाधान और स्वचालित प्रणालियों की सटीकता इस दिशा में अहम मुद्दे हैं।

फिलहाल,मेटा ने निलंबन को गलती माना है और अधिकारियों ने विस्तृत जवाब माँगा है। उपलब्ध जानकारी में राजनीतिक विचारधारा के आधार पर जानबूझकर कार्रवाई किए जाने का प्रमाण नहीं है। अब कंपनी के जवाब से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि अकाउंट को बंद करने का निर्णय कैसे लिया गया, उसकी बहाली में इतना समय क्यों लगा और भविष्य में वैध राजनीतिक गतिविधियों को ऐसी तकनीकी गलतियों से बचाने के लिए कौन-से कदम उठाए जाएँगे। चुनाव से ठीक पहले इस मामले की जाँच ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों की भूमिका और उनकी जवाबदेही को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।