अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (तस्वीर क्रेडिट@airnews_mumbai)

अमेरिका-ईरान तनाव के बीच शांति वार्ता की नई कोशिश,जेडी वेंस ने ईरानी नेता मोहसेन रेजाई को भेजा पत्र; ट्रंप के सैन्य हमले की धमकी से बढ़ी चिंता

वाशिंगटन,29 अक्टूबर (युआईटीवी)- अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बातचीत दोबारा शुरू करने की कोशिशें तेज होती दिखाई दे रही हैं। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की ओर से ईरान के वरिष्ठ नेता मोहसेन रेजाई को पत्र भेजे जाने की खबर सामने आई है। इस पहल का उद्देश्य यह पता लगाना बताया जा रहा है कि क्या दोनों देशों के बीच बातचीत का रास्ता फिर से खोला जा सकता है और संभावित सैन्य टकराव को टाला जा सकता है। अमेरिकी समाचार पत्र द वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार,यह पत्र राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर भेजा गया था। हालांकि, ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से इस दावे को खारिज किया है कि उन्होंने वेंस को ईरान के साथ शांति वार्ता शुरू करने के लिए कहा था। ऐसे में इस घटनाक्रम ने अमेरिका की कूटनीतिक रणनीति और ईरान के साथ उसके भविष्य के संबंधों को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

यह पहल ऐसे समय में सामने आई है,जब ट्रंप ने आने वाले हफ्तों में ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य कार्रवाई करने की धमकी दी है। दूसरी ओर,ईरानी नेतृत्व भी अपनी शर्तों पर अड़ा हुआ है और उसने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि बुनियादी मांगें पूरी हुए बिना अमेरिका के साथ बातचीत आगे बढ़ाना आसान नहीं होगा। ऐसे हालात में वेंस की कथित पहल को दोनों देशों के बीच संवाद की संभावनाएँ तलाशने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

द वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक,अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान के वरिष्ठ नेता मोहसेन रेजाई को पत्र भेजा। रेजाई ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के पूर्व कमांडर बताए गए हैं। ईरान की सुरक्षा और रणनीतिक व्यवस्था में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए उनसे संपर्क करना कूटनीतिक दृष्टि से अहम माना जा रहा है।

रिपोर्ट में मामले से परिचित एक व्यक्ति के हवाले से कहा गया है कि इस पहल की जानकारी राष्ट्रपति ट्रंप को थी और पत्र उनकी सहमति या निर्देश पर भेजा गया था। इसका उद्देश्य यह जानना था कि क्या मौजूदा तनाव के बीच दोनों देशों के बीच बातचीत का कोई व्यावहारिक रास्ता निकल सकता है।

हालाँकि,इस पत्र की पूरी सामग्री सार्वजनिक नहीं हुई है। न ही अब तक किसी विस्तृत शांति प्रस्ताव, बातचीत की समय-सीमा या संभावित बैठक के बारे में आधिकारिक जानकारी सामने आई है। इसलिए फिलहाल इसे किसी औपचारिक समझौते की शुरुआत के बजाय कूटनीतिक संभावनाओं को परखने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।

रेजाई की भूमिका भी इस घटनाक्रम को महत्वपूर्ण बनाती है। यदि ईरान की ओर से वह बातचीत में प्रभावी भूमिका निभाते हैं,तो इससे मौजूदा कूटनीतिक प्रक्रिया की दिशा प्रभावित हो सकती है। हालाँकि, यह स्पष्ट नहीं है कि ईरानी नेतृत्व इस पहल को किस तरह देख रहा है और क्या वह अमेरिका के साथ बातचीत के लिए तैयार होगा।

पत्र भेजे जाने की खबर सामने आने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संबंध में अलग रुख अपनाया। जॉइंट बेस एंड्रयूज में पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन्होंने उस दावे को खारिज किया कि उन्होंने वेंस को ईरान के साथ शांति वार्ता शुरू करने का निर्देश दिया था।

ट्रंप के मुताबिक,वेंस की बातचीत का संबंध चिकित्सा आपूर्ति से था। उन्होंने कहा कि ईरान को बीमार लोगों की मदद के लिए चिकित्सा सामग्री की आवश्यकता है। इस बयान के बाद पत्र के वास्तविक उद्देश्य और अमेरिका की रणनीति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

एक ओर समाचार रिपोर्ट में पत्र को बातचीत की संभावनाएँ तलाशने से जोड़ा गया है,तो दूसरी ओर ट्रंप ने इसका उद्देश्य चिकित्सा सहायता से संबंधित बताया है। दोनों विवरणों के बीच अंतर को देखते हुए यह कहना जल्दबाजी होगी कि अमेरिका ने ईरान के साथ व्यापक शांति वार्ता की औपचारिक प्रक्रिया शुरू कर दी है।

फिर भी, दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण संबंधों के बीच किसी भी प्रकार का संपर्क महत्वपूर्ण माना जा सकता है। यदि चिकित्सा आपूर्ति जैसे सीमित मुद्दे पर बातचीत होती है,तो वह आगे चलकर व्यापक संवाद का अवसर भी बन सकती है। हालाँकि,इसके लिए दोनों पक्षों की राजनीतिक सहमति और आपसी विश्वास जरूरी होगा।

रिपोर्ट के अनुसार,ट्रंप नवंबर में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के बाद ईरान के खिलाफ सीमित लेकिन प्रभावशाली सैन्य कार्रवाई करने के विकल्प पर विचार कर रहे हैं। इस संभावित कार्रवाई की आशंका ने क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा दिया है।

ऐसे में वेंस की कथित पहल का एक संभावित उद्देश्य यह पता लगाना हो सकता है कि क्या बातचीत के जरिए संघर्ष को दोबारा भड़कने से रोका जा सकता है। हालाँकि, अमेरिका की ओर से इस बारे में कोई स्पष्ट सार्वजनिक समय-सीमा या औपचारिक शांति योजना घोषित नहीं की गई है।

वेंस के लिए यह स्थिति राजनीतिक और कूटनीतिक दोनों दृष्टियों से चुनौतीपूर्ण है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से राष्ट्रपति की नीतियों का समर्थन किया है,जबकि रिपोर्टों के अनुसार, निजी तौर पर वह लंबे समय तक चलने वाले युद्ध को लेकर चिंतित रहे हैं। फरवरी में ट्रंप प्रशासन ने ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ शुरू किया था। इससे पहले वेंस ने कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से विवाद सुलझाने की आवश्यकता पर जोर दिया था।

बाद में ट्रंप ने कथित तौर पर वेंस को युद्ध समाप्त करने के लिए बातचीत की जिम्मेदारी सौंपी। इसके बाद उपराष्ट्रपति ने ईरान के प्रतिनिधियों के साथ समझौते की संभावनाएँ तलाशने के लिए दो बार विदेश यात्राएँ भी कीं। इन प्रयासों के बावजूद दोनों देशों के बीच स्थायी समाधान नहीं निकल पाया।

वेंस के सामने अब चुनौती यह है कि वह राष्ट्रपति की घोषित रणनीति के साथ तालमेल बनाए रखते हुए बातचीत के लिए पर्याप्त अवसर तलाशें। यदि कूटनीतिक प्रयास विफल होते हैं,तो सैन्य कार्रवाई की आशंका बढ़ सकती है। दूसरी ओर,किसी सीमित समझौते की दिशा में प्रगति होने पर तनाव कम करने का अवसर मिल सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक,जून में अमेरिका और ईरान के बीच हुआ समझौता ज्ञापन महज 15 दिनों में समाप्त हो गया। इसकी प्रमुख वजह होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही दोबारा शुरू करने को लेकर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बताए गए हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। इसके जरिए बड़ी मात्रा में तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों का परिवहन होता है। इस मार्ग पर किसी भी प्रकार की बाधा का असर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार,ऊर्जा आपूर्ति और तेल की कीमतों पर पड़ सकता है।

समझौता विफल होने के बाद कतर और पाकिस्तान की मदद से बातचीत को आगे बढ़ाने के प्रयास भी सफल नहीं हो सके। इससे स्पष्ट हुआ कि दोनों देशों के बीच मतभेद केवल सैन्य तनाव तक सीमित नहीं हैं,बल्कि समुद्री सुरक्षा,आर्थिक हितों और परमाणु कार्यक्रम जैसे मुद्दों पर भी गहरे मतभेद मौजूद हैं।

अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर पहले ही रियायत दे। इसके विपरीत, ईरानी अधिकारी तत्काल आर्थिक सहायता की माँग कर रहे हैं। दोनों पक्षों की प्राथमिकताओं में यह अंतर किसी व्यापक समझौते तक पहुँचने की राह में बड़ी बाधा बना हुआ है।

अमेरिका परमाणु गतिविधियों पर प्रतिबंधों और सुरक्षा संबंधी आश्वासनों को महत्वपूर्ण मानता है, जबकि ईरान आर्थिक दबाव कम करने और अपनी शर्तों पर बातचीत आगे बढ़ाने पर जोर देता रहा है। जब तक इन प्राथमिकताओं के बीच सहमति नहीं बनती,तब तक किसी टिकाऊ समझौते की संभावना सीमित रह सकती है।

मोहसेन रेजाई को पत्र भेजे जाने की खबर ने ईरान की कूटनीतिक व्यवस्था में संभावित बदलाव को लेकर भी चर्चा तेज कर दी है। यदि रेजाई अमेरिका के साथ किसी बातचीत में प्रमुख भूमिका निभाते हैं,तो इससे ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबफ जैसे नेताओं की भूमिका प्रभावित हो सकती है।

हालाँकि,अभी यह स्पष्ट नहीं है कि रेजाई को बातचीत में औपचारिक जिम्मेदारी दी गई है या नहीं। केवल पत्र भेजे जाने की खबर के आधार पर ईरान की वार्ता व्यवस्था में किसी निश्चित बदलाव का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

ईरान की ओर से बातचीत को लेकर पहले ही सख्त रुख अपनाया गया है। रेजाई ने पिछले सप्ताह कहा था कि जब तक ईरान की बुनियादी मांगें पूरी नहीं होतीं,तब तक तेहरान अमेरिका के साथ बातचीत नहीं करेगा। यह बयान दर्शाता है कि ईरान किसी भी संभावित वार्ता में अपनी शर्तों को प्राथमिकता देना चाहता है।

ऐसे में अमेरिका की पहल तभी आगे बढ़ सकती है,जब दोनों पक्ष बातचीत के लिए कुछ साझा आधार तैयार करें। इसके लिए परमाणु कार्यक्रम,आर्थिक सहायता, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और सैन्य कार्रवाई की आशंका जैसे मुद्दों पर स्पष्टता जरूरी होगी।

अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा घटनाक्रम यह संकेत देता है कि सैन्य दबाव और कूटनीतिक संपर्क समानांतर रूप से चल रहे हैं। एक ओर ट्रंप प्रशासन सैन्य कार्रवाई के विकल्प को खुला रखे हुए है,वहीं दूसरी ओर वेंस के पत्र की खबर बातचीत की संभावनाओं की ओर ध्यान खींचती है।

फिलहाल किसी औपचारिक शांति वार्ता की पुष्टि नहीं हुई है और न ही दोनों देशों के बीच किसी नए समझौते की घोषणा की गई है। इसलिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ईरान इस पहल पर क्या प्रतिक्रिया देता है और क्या दोनों पक्ष अपने मतभेदों को कम करने के लिए ठोस कदम उठाते हैं।

यदि बातचीत शुरू होती है, तो उसे सफल बनाने के लिए केवल संपर्क स्थापित करना पर्याप्त नहीं होगा। दोनों देशों को परमाणु कार्यक्रम,आर्थिक राहत,समुद्री सुरक्षा और भविष्य में सैन्य कार्रवाई से जुड़े सवालों पर व्यावहारिक समाधान तलाशने होंगे।

वहीं,यदि कूटनीतिक प्रयास आगे नहीं बढ़ते हैं,तो क्षेत्र में तनाव और बढ़ने की आशंका बनी रहेगी। ऐसे में जेडी वेंस की कथित पहल अमेरिका-ईरान संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम जरूर है,लेकिन इसे अभी शांति समझौते की दिशा में निर्णायक सफलता नहीं माना जा सकता। आने वाले दिनों में ईरान की प्रतिक्रिया और अमेरिकी प्रशासन के अगले कदम यह तय करने में अहम होंगे कि दोनों देशों के बीच बातचीत का रास्ता खुलता है या सैन्य टकराव का खतरा और गहरा जाता है।