रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह (तस्वीर क्रेडिट@primeindiia)

राजनाथ सिंह का बड़ा संदेश: हिंद-प्रशांत में शांति और सुरक्षा के लिए भारत तैयार,आसियान देशों के साथ आतंकवाद विरोधी सहयोग बढ़ाने पर जोर

नई दिल्ली,29 अक्टूबर (युआईटीवी)- रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने फिलीपींस के सेबू में आयोजित आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक-प्लस को संबोधित करते हुए कहा कि भारत ऐसी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था का समर्थक है, जो आपसी विश्वास, सहयोग, समान सम्मान और सामूहिक जिम्मेदारी पर आधारित हो। उन्होंने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति,स्थिरता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्षेत्रीय देशों के बीच सहयोग को मजबूत बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। रक्षा मंत्री ने कहा कि आज दुनिया के सामने मौजूद सुरक्षा चुनौतियों का सामना केवल अलग-अलग देशों के प्रयासों से नहीं किया जा सकता,बल्कि इसके लिए साझा दृष्टिकोण और सामूहिक कार्रवाई जरूरी है। अपने संबोधन में उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ भारत के अनुभव, समुद्री सुरक्षा,अंतर्राष्ट्रीय कानून के सम्मान और युवाओं के बीच सहयोग बढ़ाने के लिए रक्षा क्षेत्र में एक नए युवा संपर्क ढाँचे की स्थापना का प्रस्ताव भी रखा।

राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत लंबे समय से एशिया की केंद्रीय भूमिका को महत्वपूर्ण मानता आया है। भारत एक ऐसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र की कल्पना करता है,जो खुला, समावेशी और नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था पर आधारित हो। उन्होंने कहा कि आसियान देशों के साथ भारत का दीर्घकालिक रणनीतिक जुड़ाव साझा हितों,आपसी सम्मान और व्यावहारिक सहयोग पर टिका है। भारत का प्रयास है कि क्षेत्रीय साझेदारों के साथ मिलकर ऐसी व्यवस्था विकसित की जाए,जिसमें सभी देशों की संप्रभुता और वैध हितों का सम्मान हो तथा विवादों का समाधान सहयोग और संवाद के माध्यम से किया जा सके।

रक्षा मंत्री ने अपने संबोधन में आतंकवाद को क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा के सामने मौजूद गंभीर चुनौतियों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि आतंकवाद से निपटने के मामले में भारत का अनुभव केवल सैद्धांतिक जानकारी तक सीमित नहीं है,बल्कि दशकों से सीमा पार सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के दौरान प्राप्त व्यावहारिक अनुभव पर आधारित है।

राजनाथ सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत ने पिछले वर्ष इस अभियान के दौरान आतंकवादी बुनियादी ढांचे को निशाना बनाकर आतंकवाद और राज्य-प्रायोजित आतंक के खिलाफ अपना रुख स्पष्ट किया था। उन्होंने इसे आतंकवाद के विरुद्ध भारत की नीति और कार्रवाई का एक उदाहरण बताया।

रक्षा मंत्री के अनुसार,आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी रणनीति बनाने के लिए वास्तविक परिस्थितियों में प्राप्त अनुभव, खुफिया जानकारी और सुरक्षा बलों के बीच बेहतर समन्वय महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि भारत अपनी आतंकवाद विरोधी क्षमताओं और व्यावहारिक अनुभव को अपने आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक-प्लस साझेदारों के साथ साझा करने के लिए तैयार है।

उन्होंने संयुक्त सैन्य अभ्यासों, क्षमता निर्माण कार्यक्रमों और खुफिया जानकारी साझा करने की व्यवस्था को मजबूत बनाने पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, इन उपायों से क्षेत्रीय देशों की सामूहिक सुरक्षा क्षमताओं को बेहतर किया जा सकता है और आतंकवादी गतिविधियों से उत्पन्न खतरों का प्रभावी ढंग से मुकाबला किया जा सकता है।

राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत का लक्ष्य ऐसा हिंद-प्रशांत क्षेत्र बनाना है,जहाँ शांति और स्थिरता केवल घोषणाओं तक सीमित न रहें,बल्कि साझा प्रयासों के माध्यम से उनके ठोस परिणाम भी दिखाई दें। उन्होंने क्षेत्रीय सहयोग को सुरक्षा चुनौतियों से निपटने का महत्वपूर्ण माध्यम बताया।

रक्षा मंत्री ने कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र वैश्विक व्यापार,समुद्री संपर्क और आर्थिक गतिविधियों के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए सभी देशों को अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और स्थापित नियमों का सम्मान करना चाहिए।

भारत की नीति एक खुले और समावेशी क्षेत्रीय ढाँचे का समर्थन करती है,जिसमें किसी देश के वैध हितों की अनदेखी न हो। राजनाथ सिंह ने कहा कि आसियान के साथ भारत की साझेदारी इसी सोच पर आधारित है। दोनों पक्षों के बीच सहयोग को मजबूत बनाने से क्षेत्र में भरोसा बढ़ाने और साझा चुनौतियों का सामना करने में मदद मिल सकती है।

उन्होंने यह भी संकेत दिया कि क्षेत्रीय सुरक्षा का अर्थ केवल सैन्य क्षमता बढ़ाना नहीं है। इसके लिए आर्थिक संपर्क, मानवीय सहायता, आपदा के समय सहयोग, समुद्री संचार की सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय नियमों के पालन जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देना आवश्यक है।

भारत का दृष्टिकोण है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थायी शांति तभी सुनिश्चित की जा सकती है, जब सभी साझेदार देश संवाद और सहयोग को प्राथमिकता दें। रक्षा मंत्री ने इस संदर्भ में आसियान देशों के साथ भारत के रणनीतिक संबंधों को महत्वपूर्ण बताया।

अपने संबोधन में राजनाथ सिंह ने समुद्री सुरक्षा को क्षेत्रीय शांति और आर्थिक समृद्धि का महत्वपूर्ण आधार बताया। उन्होंने कहा कि भारत अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानूनों का सम्मान करता है और नौवहन की स्वतंत्रता तथा वैश्विक समुद्री संचार मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

रक्षा मंत्री ने अदन की खाड़ी में भारतीय नौसेना की लंबे समय से जारी तैनाती का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2008 से भारतीय नौसेना इस संवेदनशील समुद्री क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभा रही है। इस दौरान भारतीय युद्धपोतों ने हजारों व्यापारी जहाजों को सुरक्षा प्रदान की और समुद्र में जहाजों के अपहरण की कई कोशिशों को विफल करने में योगदान दिया।

अदन की खाड़ी अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में शामिल है। इस क्षेत्र में समुद्री डकैती और जहाजों की सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों के कारण अंतर्राष्ट्रीय नौसैनिक सहयोग की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जाती रही है। भारतीय नौसेना की तैनाती का उद्देश्य व्यापारी जहाजों की सुरक्षित आवाजाही में सहायता करना और समुद्री मार्गों पर सुरक्षा बनाए रखने में योगदान देना रहा है।

राजनाथ सिंह ने कहा कि जब वैश्विक व्यापार मार्गों को विभिन्न सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है,तब समुद्री सुरक्षा के प्रति केवल बयान देना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए निरंतर उपस्थिति,व्यावहारिक सहयोग और प्रभावी कार्रवाई आवश्यक है।

उन्होंने दोहराया कि भारत हिंद महासागर क्षेत्र और व्यापक हिंद-प्रशांत में एक विश्वसनीय सुरक्षा प्रदाता के रूप में अपनी भूमिका निभाता रहेगा। उनके अनुसार,भारत समुद्री सुरक्षा को इस क्षेत्र की शांति,स्थिरता और समृद्धि से जुड़ा हुआ मानता है।

रक्षा मंत्री ने समुद्री गतिविधियों में अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के पालन पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत नौवहन की स्वतंत्रता,समुद्र के ऊपर उड़ान की स्वतंत्रता और स्थिर समुद्री शासन के सिद्धांतों का समर्थन करता है।

इस संदर्भ में उन्होंने समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के महत्व को रेखांकित किया। यह अंतरराष्ट्रीय समझौता समुद्री क्षेत्रों,समुद्री संसाधनों और विभिन्न देशों के समुद्री अधिकारों से संबंधित कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।

राजनाथ सिंह ने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों के पालन पर भारत का जोर किसी विशेष देश के खिलाफ नहीं है। इसका उद्देश्य उन साझा हितों की रक्षा करना है,जिन पर क्षेत्रीय देशों और वैश्विक अर्थव्यवस्था की निर्भरता है। खुले समुद्री मार्ग और नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की निरंतरता के लिए आवश्यक हैं।

उन्होंने कहा कि भारत समुद्री सुरक्षा,खोज और बचाव अभियान,मानवीय सहायता, व्यापारिक संपर्क और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में आसियान साझेदारों के साथ सहयोग बढ़ाना चाहता है। इन क्षेत्रों में संयुक्त प्रयासों से समुद्री घटनाओं के दौरान प्रतिक्रिया बेहतर बनाई जा सकती है और क्षेत्रीय देशों के बीच समन्वय मजबूत हो सकता है।

रक्षा मंत्री के अनुसार,समुद्री सुरक्षा के लिए सैन्य तैयारियों के साथ-साथ कानूनी सिद्धांतों और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का पालन भी जरूरी है। भारत इस दिशा में अपने साझेदार देशों के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार है।

राजनाथ सिंह ने अपने संबोधन में भारत और आसियान देशों के बीच युवाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए रक्षा क्षेत्र में एक मजबूत युवा संपर्क ढाँचा स्थापित करने का प्रस्ताव भी रखा। उन्होंने इसे क्षेत्रीय सहयोग को भविष्य के लिए तैयार करने की पहल के रूप में प्रस्तुत किया।

प्रस्तावित ढाँचे का उद्देश्य लोगों के बीच संपर्क बढ़ाना,डिजिटल नवाचार को प्रोत्साहित करना और क्षमता निर्माण के अवसर विकसित करना होगा। रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत और आसियान देशों की युवा आबादी इस साझेदारी की महत्वपूर्ण ताकत है। युवाओं की ऊर्जा,रचनात्मकता और नई तकनीकों को अपनाने की क्षमता क्षेत्रीय सहयोग को नई दिशा दे सकती है।

उन्होंने कहा कि भारत और आसियान देशों के बीच युवाओं को जोड़ने से आपसी समझ बढ़ेगी और भविष्य के नेताओं तथा पेशेवरों के बीच स्थायी संबंध विकसित किए जा सकेंगे। इस तरह की पहल से शिक्षा,तकनीक,कौशल विकास और रक्षा संबंधी प्रशिक्षण के क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएँ भी खुल सकती हैं।

राजनाथ सिंह ने इस प्रस्ताव को बैठक के संयुक्त वक्तव्य में शामिल युवा,शांति और सुरक्षा के विषय से भी जोड़ा। उनके अनुसार,युवाओं को सशक्त बनाना केवल सामाजिक विकास का मुद्दा नहीं है,बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और भविष्य की सुरक्षा व्यवस्था के निर्माण से भी जुड़ा हुआ है।

उन्होंने कहा कि भारत और आसियान देशों की जनसंख्या तुलनात्मक रूप से युवा है। यह समानता दोनों पक्षों के बीच संबंधों को और गहरा करने का अवसर प्रदान करती है। युवाओं के बीच संपर्क बढ़ाकर क्षेत्रीय साझेदारियां आने वाली पीढ़ियों तक मजबूत बनाई जा सकती हैं।

राजनाथ सिंह के संबोधन में आतंकवाद विरोधी सहयोग,समुद्री सुरक्षा,अंतर्राष्ट्रीय कानून और युवा संपर्क जैसे विषय प्रमुख रहे। उनके वक्तव्य से यह स्पष्ट हुआ कि भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी भूमिका को केवल सैन्य सहयोग तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा और विकास के प्रयासों में भी योगदान देना चाहता है।

आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक-प्लस ऐसा मंच है,जहाँ आसियान सदस्य देशों और उनके संवाद साझेदारों के रक्षा प्रतिनिधि क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श करते हैं। इस मंच के माध्यम से संयुक्त अभ्यास,सैन्य संवाद,क्षमता निर्माण और सुरक्षा संबंधी सहयोग को आगे बढ़ाने के अवसर मिलते हैं।

भारत के लिए आसियान देशों के साथ बेहतर रक्षा संबंध हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता और विश्वास बढ़ाने के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। आतंकवाद से निपटने के अनुभव साझा करना, समुद्री मार्गों की सुरक्षा में सहयोग करना और युवाओं के बीच संपर्क विकसित करना इस साझेदारी के अलग-अलग आयाम हैं।

कुल मिलाकर,सेबू में राजनाथ सिंह का संबोधन भारत की उस नीति को सामने लाता है, जिसमें नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था,साझा जिम्मेदारी और व्यावहारिक सहयोग को महत्व दिया जाता है। रक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया कि भारत हिंद महासागर और व्यापक हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति तथा सुरक्षा बनाए रखने के लिए अपने साझेदारों के साथ काम करता रहेगा। अब इन प्रस्तावों को संयुक्त कार्यक्रमों, क्षमता निर्माण और नियमित सहयोग के माध्यम से आगे बढ़ाना क्षेत्रीय साझेदारी के लिए महत्वपूर्ण होगा।