वाशिंगटन,5 नवंबर (युआईटीवी)- अमेरिका के मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की बड़ी जीत के बाद रिपब्लिकन पार्टी के भीतर हार के कारणों पर मंथन शुरू हो गया है। इस बीच अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने चुनावी नतीजों को लेकर एक अहम बयान दिया है। उन्होंने स्वीकार किया कि रिपब्लिकन पार्टी की हार के पीछे ईरान के साथ युद्ध और इजरायल के साथ अमेरिका के संबंधों की भूमिका रही। वेंस के मुताबिक, वर्ष 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन करने वाले कई मतदाताओं ने इस बार पार्टी से दूरी बना ली और डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान किया। उन्होंने यह भी कहा कि मतदाताओं की नाराजगी केवल विदेश नीति तक सीमित नहीं थी,बल्कि महँगाई,जीवन-यापन की बढ़ती लागत और सरकार के ‘अमेरिका फर्स्ट’ एजेंडे को लेकर भी असंतोष था।
उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने बुधवार को सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट के माध्यम से चुनावी नतीजों का विश्लेषण किया। उन्होंने कहा कि रिपब्लिकन पार्टी की हार का प्रमुख कारण यह नहीं था कि उसके समर्थक मतदान करने के लिए घरों से बाहर नहीं निकले। असल समस्या यह रही कि पार्टी के कई पुराने समर्थकों ने मतदान तो किया, लेकिन उन्होंने रिपब्लिकन उम्मीदवारों के बजाय डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को अपना समर्थन दे दिया। वेंस के इस बयान को ट्रंप प्रशासन के भीतर से चुनावी हार के कारणों पर आई एक महत्वपूर्ण स्वीकारोक्ति के रूप में देखा जा रहा है।
वेंस ने अपने पोस्ट में कहा कि वर्ष 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप-वेंस की जोड़ी का समर्थन करने वाले मतदाताओं के एक बड़े हिस्से ने 3 नवंबर को हुए मध्यावधि चुनावों में अपना राजनीतिक रुख बदल लिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि रिपब्लिकन पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती मतदान प्रतिशत बढ़ाने की नहीं,बल्कि अपने ही समर्थकों का भरोसा बनाए रखने की थी। उनके मुताबिक,मतदाताओं के व्यवहार का विश्लेषण करने पर पता चला कि कई ऐसे लोग,जिन्होंने पिछले राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप को वोट दिया था, इस बार उनकी पार्टी के उम्मीदवारों के खिलाफ चले गए।
वेंस ने मतदाताओं की नाराजगी के पीछे चार प्रमुख मुद्दों का जिक्र किया। इनमें ईरान के साथ युद्ध, जीवन-यापन की बढ़ती लागत,ट्रंप प्रशासन के अमेरिका फर्स्ट एजेंडे को लेकर असंतोष और इजरायल के साथ वाशिंगटन के संबंध शामिल हैं। उन्होंने अपने बयान में कहा कि रिपब्लिकन पार्टी की हार का एक बड़ा कारण युद्ध रहा। उनके मुताबिक, मतदाता चाहते थे कि सरकार सैन्य संघर्षों में उलझने के बजाय देश के घरेलू मुद्दों पर अधिक ध्यान दे।
ईरान के साथ जारी संघर्ष को लेकर अमेरिकी मतदाताओं में असंतोष पार्टी के लिए राजनीतिक चुनौती बन गया। वर्ष 2024 के चुनाव में ट्रंप को समर्थन देने वाले कई मतदाताओं की प्राथमिकता अमेरिका को विदेशी युद्धों से दूर रखना और देश के हितों को सर्वोपरि रखना था। ऐसे में ईरान के साथ सैन्य टकराव बढ़ने से उनके बीच नाराजगी पैदा हुई। वेंस ने भी इस बात को स्वीकार किया कि युद्ध का मुद्दा चुनावी नतीजों को प्रभावित करने वाले कारकों में शामिल रहा।
इसके अलावा,महँगाई और रोजमर्रा की जरूरतों पर बढ़ता खर्च भी मतदाताओं के लिए बड़ा मुद्दा बना। खाने-पीने की वस्तुओं, आवास, ऊर्जा और अन्य आवश्यक सेवाओं की कीमतों को लेकर लोगों की चिंताएँ चुनावी फैसलों में दिखाई दीं। मतदाताओं का मानना था कि प्रशासन को विदेशों में चल रहे संघर्षों के बजाय अमेरिकी परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधारने पर अधिक ध्यान देना चाहिए। वेंस के अनुसार,जिन मतदाताओं ने 2024 में ट्रंप का समर्थन किया था,उनमें से कई अब चाहते थे कि सरकार महँगाई और जीवन-यापन की लागत को नियंत्रित करने के लिए ठोस कदम उठाए।
उपराष्ट्रपति ने बताया कि रिपब्लिकन पार्टी के डेटा विश्लेषकों ने चुनाव के दौरान मतदाताओं के जनसांख्यिकीय आँकड़ों और उनके मतदान व्यवहार का विस्तार से अध्ययन किया था। इसका उद्देश्य यह पता लगाना था कि मध्यावधि चुनाव में मतदान करने वाले लोग वही हैं या नहीं,जिन्होंने 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप का समर्थन किया था। पार्टी के सामने यह समझना जरूरी था कि उसके पारंपरिक समर्थक इस बार कितनी संख्या में मतदान करने पहुँचे और उनका रुख क्या रहा।
वेंस के मुताबिक,चुनाव से पहले सामने आए विभिन्न अनुमानों में डेमोक्रेटिक पार्टी की बड़ी जीत की संभावना जताई जा रही थी। हालाँकि,रिपब्लिकन पार्टी के शुरुआती आंतरिक आकलन में यह संकेत मिल रहे थे कि उसके समर्थक बड़ी संख्या में मतदान केंद्रों तक पहुँच रहे हैं। इससे पार्टी के कुछ नेताओं को उम्मीद थी कि मुकाबला अनुमान से अधिक करीबी हो सकता है। उन्हें लग रहा था कि मतदाताओं की भागीदारी के आंकड़े रिपब्लिकन पार्टी के लिए सकारात्मक साबित हो सकते हैं।
लेकिन मतदान केंद्रों पर समर्थकों की मौजूदगी को पार्टी के पक्ष में वोट पड़ने की गारंटी नहीं माना जा सकता था। वेंस ने एक डेटा विश्लेषक के साथ हुई बातचीत का जिक्र करते हुए बताया कि उन्होंने उससे पूछा था कि क्या उपलब्ध आँकड़ों के आधार पर रिपब्लिकन पार्टी चुनाव की रात कोई अप्रत्याशित नतीजा दे सकती है। इस पर विश्लेषक ने कहा था कि पार्टी चुनावी अनुमानों से बेहतर प्रदर्शन कर सकती है,लेकिन आँकड़े एक दूसरी तस्वीर भी दिखा रहे हैं।
विश्लेषक के मुताबिक, वर्ष 2024 में ट्रंप और वेंस को वोट देने वाले कई मतदाता इस समय नाराज थे और वे डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को समर्थन देने की योजना बना रहे थे। यानी रिपब्लिकन समर्थक मतदान करने तो आ रहे थे,लेकिन जरूरी नहीं था कि उनका वोट पार्टी के उम्मीदवारों को ही मिले। वेंस ने इस बातचीत का उल्लेख करते हुए कहा कि चुनावी आँकड़ों ने पहले ही इस बदलाव के संकेत दे दिए थे।
वेंस ने फ्लोरिडा का उदाहरण देते हुए बताया कि वहाँ रिपब्लिकन समर्थकों की संख्या डेमोक्रेटिक समर्थकों के मुकाबले करीब 9 प्रतिशत अधिक थी। यह बढ़त वर्ष 2024 में दर्ज रिपब्लिकन पार्टी के प्रदर्शन से बहुत अलग नहीं थी। इसके बावजूद चुनावी नतीजों ने दिखाया कि केवल मतदाताओं की संख्या या किसी पार्टी के पंजीकृत समर्थकों की बढ़त से जीत सुनिश्चित नहीं होती।
उनके मुताबिक,फ्लोरिडा के आँकड़ों से यह स्पष्ट हुआ कि रिपब्लिकन पार्टी के सामने असली चुनौती अपने समर्थकों को मतदान केंद्र तक लाने की नहीं थी। पार्टी के कई पुराने मतदाता मतदान में शामिल हुए,लेकिन उन्होंने उम्मीदवारों और नीतियों के प्रति अपनी नाराजगी के कारण दूसरी पार्टी का विकल्प चुना। वेंस ने कहा कि वर्ष 2024 में ट्रंप-वेंस को वोट देने वाले कई लोगों ने 2026 के मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान किया।
यह बदलाव रिपब्लिकन पार्टी के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मध्यावधि चुनावों में आमतौर पर राष्ट्रपति की पार्टी को कई तरह की राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। लेकिन वेंस के बयान के मुताबिक,इस बार पार्टी के सामने केवल विपक्ष की मजबूती या मतदान में कम भागीदारी का सवाल नहीं था। उसके अपने मतदाताओं के बीच नीतियों को लेकर असंतोष भी एक बड़ी वजह बनकर सामने आया।
वेंस ने बताया कि चुनावी विश्लेषकों ने खास तौर पर उन मतदाताओं के व्यवहार का अध्ययन किया,जिन्होंने 2024 में ट्रंप का समर्थन किया था,लेकिन मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों के पक्ष में जाने का इरादा जताया। विश्लेषकों ने यह समझने की कोशिश की कि आखिर किन मुद्दों पर इन मतदाताओं का भरोसा कमजोर हुआ और उन्हें दोबारा रिपब्लिकन पार्टी के करीब लाने के लिए प्रशासन को किन क्षेत्रों में बदलाव करना चाहिए।
इस बातचीत और आंकड़ों के विश्लेषण से चार प्रमुख मांगें सामने आईं। पहली माँग ईरान के साथ युद्ध को समाप्त करने की थी। मतदाता चाहते थे कि अमेरिका लंबे सैन्य संघर्षों से बाहर निकले और ऐसी नीतियाँ अपनाए,जिनसे देश को किसी नए युद्ध में शामिल होने से बचाया जा सके। दूसरी माँग महँगाई और जीवन-यापन की लागत पर नियंत्रण को लेकर थी। लोगों का कहना था कि प्रशासन को घरेलू अर्थव्यवस्था और आम परिवारों की आर्थिक परेशानियों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
तीसरी माँग ट्रंप प्रशासन के अमेरिका फर्स्ट एजेंडे को लेकर थी। जिन मतदाताओं ने इस नारे के आधार पर ट्रंप का समर्थन किया था,वे चाहते थे कि सरकार अपनी नीतियों में उसी प्राथमिकता को स्पष्ट रूप से बनाए रखे। उनके लिए इसका अर्थ था कि अमेरिकी हितों, घरेलू रोजगार,आर्थिक सुरक्षा और आम नागरिकों की जरूरतों को विदेश नीति के फैसलों में भी प्रमुख स्थान दिया जाए।
चौथा मुद्दा इजरायल के साथ अमेरिका के संबंधों से जुड़ा था। वेंस के मुताबिक, कुछ मतदाता वाशिंगटन और इजरायल के बीच मौजूदा संबंधों तथा उनसे जुड़ी नीतियों को लेकर संतुष्ट नहीं थे। इस मुद्दे पर भी प्रशासन से बदलाव की अपेक्षा की जा रही थी। इससे संकेत मिलता है कि विदेश नीति के सवाल अब अमेरिकी मतदाताओं के एक हिस्से के लिए घरेलू चुनावी फैसलों को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण मुद्दे बन गए हैं।
जेडी वेंस का बयान ऐसे समय आया है, जब मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत के बाद रिपब्लिकन नेतृत्व के सामने अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करने की चुनौती है। वेंस ने जिन कारणों का उल्लेख किया है, वे केवल चुनावी आँकड़ों तक सीमित नहीं हैं,बल्कि ट्रंप प्रशासन की विदेश और घरेलू नीतियों को लेकर पार्टी के भीतर और उसके समर्थक वर्ग में उठ रहे सवालों को भी सामने लाते हैं।
रिपब्लिकन पार्टी के लिए अब यह समझना महत्वपूर्ण होगा कि वर्ष 2024 में मिले जनसमर्थन को बनाए रखने में कहाँ कमी रह गई। यदि पुराने समर्थकों की नाराजगी युद्ध, महँगाई और विदेश नीति से जुड़ी है तो केवल चुनावी प्रचार या मतदान बढ़ाने की रणनीति से समस्या का समाधान नहीं होगा। प्रशासन को उन मुद्दों पर अपने फैसलों और प्राथमिकताओं में बदलाव करना पड़ सकता है,जिनके कारण मतदाताओं का भरोसा प्रभावित हुआ है।
वेंस के बयान से यह भी स्पष्ट होता है कि ट्रंप प्रशासन के भीतर चुनावी हार को लेकर केवल विपक्ष की सक्रियता या समर्थकों की कम भागीदारी को जिम्मेदार नहीं माना जा रहा। पार्टी के अपने मतदाताओं का दूसरी ओर जाना भी चिंता का विषय है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन ईरान के साथ संघर्ष,इजरायल से संबंध, महँगाई और अमेरिका फर्स्ट एजेंडे को लेकर क्या रुख अपनाता है। इन मुद्दों पर लिए जाने वाले फैसले न केवल सरकार की नीतिगत दिशा तय करेंगे,बल्कि रिपब्लिकन पार्टी के पारंपरिक समर्थकों का भरोसा दोबारा हासिल करने की उसकी कोशिशों को भी प्रभावित कर सकते हैं।
