इजरायल में संसदीय चुनाव के लिए मतदान शुरू, नेतन्याहू और आइजनकोट के बीच मुकाबला (तस्वीर क्रेडिट@AliTallat1)

इजरायल में किसकी बनेगी सरकार? नेतन्याहू और गादी आइजेनकोट के बीच मुकाबला,राष्ट्रपति हर्जोग रविवार को करेंगे बड़ा फैसला

तेल अवीव,7 नवंबर (युआईटीवी)- इजरायल में हाल ही में संपन्न हुए चुनाव के बाद राजनीतिक तस्वीर अब तक स्पष्ट नहीं हो पाई है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी तथा पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट,दोनों ही सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत से दूर नजर आ रहे हैं। चुनाव के बाद संसद में समर्थन जुटाने की कोशिशें तेज हो गई हैं, लेकिन अलग-अलग राजनीतिक दलों की शर्तों और आपसी मतभेदों ने सरकार गठन की राह मुश्किल बना दी है। अब सभी की निगाहें राष्ट्रपति इसाक हर्जोग के फैसले पर टिकी हैं। वह रविवार,8 नवंबर को संसद के किसी एक सदस्य को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने वाले हैं। राष्ट्रपति के इस फैसले से यह तय होगा कि इजरायल में नई सरकार बनाने की पहली जिम्मेदारी किस नेता को मिलेगी।

राष्ट्रपति हर्जोग ने एक वीडियो संदेश जारी कर इस प्रक्रिया की जानकारी दी है। उन्होंने कहा कि वह रविवार को नेसेट यानी इजरायली संसद के एक सदस्य को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे। हालाँकि,उन्होंने अभी तक किसी भी नेता के समर्थन में खुलकर संकेत नहीं दिया है। चुनाव के बाद सामने आए आँकड़ों में गादी आइजेनकोट को अपेक्षाकृत अधिक सांसदों का समर्थन मिलता दिखाई दे रहा है,लेकिन उनके सामने भी कई राजनीतिक बाधाएँ हैं। खासतौर पर अरब नेतृत्व वाली पार्टियों का समर्थन उनके लिए एक तरफ संख्या बढ़ाने का जरिया है,तो दूसरी तरफ इन दलों को सरकार में शामिल करने से इनकार करने के कारण गठबंधन बनाना कठिन हो रहा है।

राष्ट्रपति के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसे उम्मीदवार का चयन करना है,जो केवल शुरुआती समर्थन हासिल करने के बजाय संसद में विश्वास मत जीतकर स्थिर सरकार भी बना सके। इजरायल की राजनीति में इस समय बहुमत का गणित जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही अहम विभिन्न दलों के बीच वैचारिक और नीतिगत मतभेद भी हैं।

चुनाव के बाद सरकार गठन की संभावनाओं को समझने के लिए राष्ट्रपति हर्जोग ने राजनीतिक दलों के प्रमुखों के साथ बातचीत की। गुरुवार को यह प्रक्रिया पूरी हुई। इस दौरान 120 सदस्यीय नेसेट के सदस्यों ने अलग-अलग उम्मीदवारों के प्रति अपना समर्थन जाहिर किया। सामने आए आँकड़ों के मुताबिक,गादी आइजेनकोट को 67 सांसदों का समर्थन मिला,जबकि बेंजामिन नेतन्याहू के पक्ष में 46 सांसदों ने अपनी राय रखी।

पहली नजर में ये आँकड़े आइजेनकोट के पक्ष में दिखाई देते हैं,लेकिन इन्हें सीधे सरकार बनाने के लिए पर्याप्त समर्थन नहीं माना जा सकता। इजरायल में सरकार बनाने के लिए 120 सदस्यीय संसद में कम-से-कम 61 सदस्यों का बहुमत जरूरी होता है। आइजेनकोट को मिले 67 सांसदों के समर्थन में अरब नेतृत्व वाली पार्टियों के सदस्य भी शामिल हैं। हालाँकि,आइजेनकोट इन दलों को अपनी सरकार में शामिल करने के पक्ष में नहीं हैं। यही वजह है कि उनके समर्थन का वास्तविक राजनीतिक महत्व और सरकार गठन की संभावना को लेकर सवाल बने हुए हैं।

दूसरी ओर,नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी और धार्मिक गठबंधन के पास कुल 53 सीटें हैं। इस गठबंधन को भी बहुमत तक पहुँचने के लिए आठ अतिरिक्त सांसदों की जरूरत है। उनके पुराने सहयोगियों में शामिल यूनाइटेड टोरा यहूदी पार्टी ने फिलहाल समर्थन देने से दूरी बना रखी है। इस पार्टी की नाराजगी का प्रमुख कारण अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय के लोगों को अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट देने का मुद्दा है। इस विषय पर सरकार के साथ मतभेद के कारण पार्टी ने नेतन्याहू के गठबंधन को समर्थन देने से परहेज किया है।

गादी आइजेनकोट के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती अरब नेतृत्व वाली पार्टियों के समर्थन को लेकर है। इजरायल की संसद में इन पार्टियों के कुल 19 सदस्य हैं। इनमें ज्वाइंट लिस्ट के 11 और यूनाइटेड अरब लिस्ट यानी राम के आठ सांसद शामिल हैं। इन दलों के समर्थन के कारण आइजेनकोट के पक्ष में 67 सांसदों का आँकड़ा पहुँचा है। लेकिन इन पार्टियों को सरकार में शामिल करने से इनकार करने के कारण यह समर्थन उनके लिए पूरी तरह उपयोगी साबित नहीं हो पा रहा है।

राम पार्टी के नेता मंसूर अब्बास ने आइजेनकोट के नेतृत्व में बनने वाली सरकार में शामिल होने की इच्छा जताई है। उनका मानना है कि नई सरकार में भागीदारी के जरिए अरब नागरिकों से जुड़े मुद्दों को उठाया जा सकता है। इसके विपरीत ज्वाइंट लिस्ट ने सरकार में शामिल होने से इनकार कर दिया है। हालाँकि,उसने बाहर से समर्थन देने की पेशकश की है। इसका मतलब है कि पार्टी सरकार का हिस्सा बने बिना भी संसद में कुछ मुद्दों पर आइजेनकोट का साथ दे सकती है।

आइजेनकोट ने इन दलों के समर्थन के बावजूद उनके साथ सरकार बनाने के लिए कुछ शर्तें रखी हैं। इनमें हमास को आतंकवादी संगठन के रूप में मान्यता देने की माँग भी शामिल है। राम पार्टी के नेता मंसूर अब्बास ने हमास को निरस्त्र करने का समर्थन किया है, लेकिन उसे आतंकवादी संगठन घोषित करने से परहेज किया है। इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बने हुए हैं। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि आइजेनकोट और अरब दलों के बीच कोई ऐसा राजनीतिक समझौता हो पाएगा,जिससे सरकार गठन का रास्ता आसान हो सके।

इजरायल के कानून के तहत सरकार बनाने के लिए किसी उम्मीदवार के पास शुरुआत में ही 61 सांसदों का प्रत्यक्ष समर्थन होना अनिवार्य नहीं है। कोई नेता अपेक्षाकृत कम समर्थन के साथ भी सरकार बनाने की कोशिश कर सकता है। हालाँकि,उसे संसद में विश्वास मत हासिल करना होगा। इस व्यवस्था के कारण आइजेनकोट के पास अल्पमत सरकार बनाने का विकल्प भी मौजूद है।

अल्पमत सरकार का मतलब ऐसी सरकार से है, जिसके पास संसद में अपने दम पर बहुमत न हो,लेकिन वह अन्य दलों के बाहरी समर्थन या अनुपस्थिति के आधार पर विश्वास मत हासिल कर ले। यदि आइजेनकोट ऐसा करने में सफल रहते हैं तो वह शुरुआत में अरब दलों को सरकार में शामिल किए बिना भी सत्ता सँभाल सकते हैं। इसके बाद वह अति-रूढ़िवादी यहूदी दलों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर सकते हैं।

हालाँकि,इस रणनीति में भी कई जोखिम हैं। सरकार को हर महत्वपूर्ण विधेयक और संसदीय प्रस्ताव पर समर्थन जुटाना होगा। यदि सहयोगी दल किसी मुद्दे पर पीछे हटते हैं तो सरकार की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। इसलिए केवल विश्वास मत हासिल करना ही पर्याप्त नहीं होगा,बल्कि आइजेनकोट को लंबे समय तक सहयोग देने वाले राजनीतिक दलों का भरोसा भी जीतना होगा।

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए भी सत्ता में बने रहने का रास्ता आसान नहीं है। उनके दक्षिणपंथी और धार्मिक गठबंधन के पास 53 सीटें हैं,जो बहुमत के आँकड़े से आठ कम हैं। उन्हें सरकार बनाने के लिए विपक्षी खेमे के किसी दल या सांसदों का समर्थन हासिल करना होगा,लेकिन चुनाव के बाद राजनीतिक समीकरण ऐसे बने हैं कि उनके लिए नए सहयोगी तलाशना मुश्किल हो सकता है।

यूनाइटेड टोरा यहूदी पार्टी की नाराजगी ने नेतन्याहू की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अति-रूढ़िवादी यहूदियों को अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट देने का मुद्दा लंबे समय से इजरायल की राजनीति में विवाद का विषय रहा है। धार्मिक दल इस छूट को बनाए रखने के पक्ष में हैं, जबकि सैन्य सेवा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सवालों के कारण इस नीति पर विरोध भी होता रहा है। इसी मुद्दे पर नेतन्याहू के पुराने सहयोगी उनसे नाराज हैं। यदि वह इस पार्टी का समर्थन हासिल नहीं कर पाते हैं तो उन्हें बहुमत जुटाने के लिए दूसरे विकल्प तलाशने होंगे।

एक अन्य संभावना राष्ट्रीय एकता सरकार की भी है। इस व्यवस्था के तहत नेतन्याहू और आइजेनकोट के राजनीतिक खेमे मिलकर सरकार बना सकते हैं। ऐसी सरकार में दोनों नेताओं के बीच बारी-बारी से प्रधानमंत्री पद संभालने का समझौता हो सकता है। हालाँकि, यह विकल्प फिलहाल आसान नहीं दिखता,क्योंकि नेतन्याहू के कई विरोधी उनके नेतृत्व में सरकार में शामिल होने से पहले ही इनकार कर चुके हैं। दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक मतभेद भी इस तरह के समझौते में बाधा बन सकते हैं।

इजरायल की अरब नेतृत्व वाली पार्टियों के लिए इस चुनाव में नेतन्याहू को दोबारा सत्ता में आने से रोकना एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा रहा है। ज्वाइंट लिस्ट ने आइजेनकोट को समर्थन देने के अपने फैसले को जनता की उस इच्छा से जोड़ा है,जिसके तहत नेतन्याहू की सरकार की वापसी रोकने की माँग की गई थी। हालाँकि,इन दलों का समर्थन केवल राजनीतिक समीकरण तक सीमित नहीं है। उन्होंने इजरायल के अरब नागरिकों से जुड़े कई मुद्दों पर स्पष्ट गारंटी भी माँगी है।

इन मांगों में अरब नागरिकों के घरों को गिराने की कार्रवाई रोकना,उनके समुदाय के खिलाफ भड़काऊ बयानों पर नियंत्रण लगाना और अरब बहुल इलाकों में बढ़ते अपराध पर प्रभावी कार्रवाई करना शामिल है। इसके अलावा,फलस्तीनियों के राजनीतिक भविष्य को लेकर भी स्पष्ट दिशा तय करने की माँग की गई है। इन पार्टियों का कहना है कि नई सरकार को अरब नागरिकों की सुरक्षा,अधिकारों और रोजमर्रा की समस्याओं को प्राथमिकता देनी चाहिए।

इन मांगों पर आइजेनकोट की सहमति सरकार गठन की बातचीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। हालाँकि,उनके लिए एक साथ अरब दलों का समर्थन बनाए रखना और अपनी राजनीतिक शर्तों पर कायम रहना चुनौतीपूर्ण होगा। दूसरी ओर,यदि वह इन दलों से दूरी बनाए रखते हैं तो उनके पास मौजूद 67 सांसदों के समर्थन का आँकड़ा भी कमजोर पड़ सकता है।

इजरायल में सरकार गठन की प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति जिस उम्मीदवार को आमंत्रित करेंगे,उसे गठबंधन तैयार करने के लिए 28 दिनों का समय दिया जाएगा। यदि इस अवधि में सरकार बनाने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती है,तो राष्ट्रपति जरूरत के अनुसार 14 दिनों का अतिरिक्त समय दे सकते हैं। इस तरह पहले उम्मीदवार को कुल 42 दिनों तक का अवसर मिल सकता है।

यदि पहला उम्मीदवार सरकार बनाने में असफल रहता है,तो राष्ट्रपति दूसरे नेता को मौका दे सकते हैं। दूसरे उम्मीदवार को भी गठबंधन तैयार करने के लिए 28 दिनों का समय मिलेगा। अगर वह भी बहुमत हासिल करने में नाकाम रहता है,तो संसद के सदस्य अपने बहुमत के आधार पर तीसरे उम्मीदवार को सरकार बनाने का अवसर दे सकते हैं। इस तीसरे उम्मीदवार को 14 दिनों के भीतर अपनी सरकार बनाने की कोशिश करनी होगी।

यदि तीसरा प्रयास भी सफल नहीं होता है तो नेसेट को भंग किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में 90 दिनों के भीतर नए चुनाव कराने की नौबत आ सकती है। तब तक नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में पद पर बने रहेंगे। यानी सरकार गठन की मौजूदा प्रक्रिया असफल होने पर भी सत्ता का संचालन पूरी तरह रुकने की स्थिति नहीं होगी,लेकिन देश को एक बार फिर चुनावी प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है।

राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि वह नेतन्याहू या आइजेनकोट में से किसे पहले सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे। उनका कहना है कि भले ही संसद में समर्थन के आँकड़े किसी एक पक्ष की ओर झुकते दिखाई दें,लेकिन राजनीतिक दलों के बीच मौजूद मतभेदों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार,सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि कौन-सा उम्मीदवार ऐसा गठबंधन तैयार कर सकता है,जो संसद में विश्वास मत हासिल करने के साथ स्थिर सरकार भी चला सके।

रविवार,8 नवंबर को राष्ट्रपति का फैसला इजरायल की राजनीति की अगली दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होगा। यदि आइजेनकोट को पहला मौका मिलता है,तो उन्हें अरब दलों के समर्थन और अपनी शर्तों के बीच संतुलन बनाना होगा। वहीं,नेतन्याहू को मौका मिलने पर उन्हें अपने पुराने सहयोगियों को मनाने और विपक्षी खेमे से समर्थन जुटाने की चुनौती का सामना करना पड़ेगा।

फिलहाल दोनों नेताओं के पास बहुमत तक पहुँचने का कोई आसान रास्ता नहीं है। राजनीतिक दलों की मांगें,सैन्य सेवा को लेकर मतभेद,अरब नागरिकों के अधिकार और फलस्तीनियों के भविष्य जैसे मुद्दे सरकार गठन की बातचीत को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में रविवार को राष्ट्रपति का फैसला केवल पहले उम्मीदवार के नाम का चयन नहीं होगा, बल्कि यह भी संकेत देगा कि इजरायल में नई सरकार बनाने की कोशिश किस राजनीतिक दिशा में आगे बढ़ेगी। यदि कोई भी पक्ष तय समय में बहुमत और विश्वास मत हासिल नहीं कर पाता है,तो देश को एक बार फिर आम चुनाव का सामना करना पड़ सकता है।