वॉशिंगटन,18 सितंबर (युआईटीवी)- अमेरिका और ईरान के बीच कई महीनों से जारी सैन्य संघर्ष और तनाव के बीच एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति का ध्यान अपनी ओर खींचा है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन अगले सप्ताह अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर की यात्रा कर सकते हैं। अमेरिकी प्रशासन ने ईरान के राष्ट्रपति और उनके प्रमुख प्रतिनिधिमंडल को संयुक्त राष्ट्र महासभा के उच्च स्तरीय सत्र में शामिल होने की अनुमति दे दी है। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है,जब दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव जारी है और उनके संबंध बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं।
अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार,संयुक्त राष्ट्र के मेजबान देश के तौर पर अमेरिका की जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए ईरान के मुख्य प्रतिनिधिमंडल को महासभा के उच्च स्तरीय सप्ताह में हिस्सा लेने की अनुमति दी जाएगी। ईरानी प्रतिनिधिमंडल में राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के साथ विदेश मंत्री अब्बास अराघची और आवश्यक अधिकारी शामिल होंगे। हालाँकि,इस बार ईरान का प्रतिनिधिमंडल पिछले वर्षों की तुलना में छोटा रहने की संभावना है। प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों पर अमेरिका में यात्रा और आवाजाही से संबंधित कुछ प्रतिबंध लागू रहेंगे।
संयुक्त राष्ट्र महासभा का उच्च स्तरीय सप्ताह अगले सप्ताह न्यूयॉर्क में शुरू होने वाला है। इस दौरान दुनिया के अलग-अलग देशों के राष्ट्राध्यक्ष और सरकारों के प्रमुख संयुक्त राष्ट्र के मंच से अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपना पक्ष रखते हैं। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के बुधवार को महासभा को संबोधित करने का कार्यक्रम है। ऐसे में उनका अमेरिका पहुँचना मौजूदा युद्ध और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच बेहद महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाक्रम माना जा रहा है।
हालाँकि, अमेरिका की ओर से यात्रा की अनुमति दिए जाने का अर्थ यह नहीं है कि ईरानी प्रतिनिधिमंडल को सामान्य विदेशी प्रतिनिधिमंडलों जैसी पूरी स्वतंत्रता मिलेगी। ईरानी अधिकारियों के लिए पहले से लागू यात्रा संबंधी नियम जारी रहेंगे। उनके आवागमन को निर्धारित क्षेत्रों तक सीमित रखा जा सकता है और कुछ प्रकार की खरीदारी पर भी पाबंदी रहेगी। विशेष रूप से महंगे और विलासिता से जुड़े सामान की खरीद पर प्रतिबंध लागू रहेगा। इस तरह अमेरिका ने एक ओर संयुक्त राष्ट्र की बैठक में ईरानी प्रतिनिधिमंडल की भागीदारी का रास्ता साफ किया है, वहीं दूसरी ओर उसके लिए मौजूद प्रतिबंधों को भी बरकरार रखा है।
अमेरिका का यह फैसला संयुक्त राष्ट्र के मेजबान देश के तौर पर उसकी जिम्मेदारियों से भी जुड़ा हुआ है। सामान्य परिस्थितियों में संयुक्त राष्ट्र महासभा के उच्च स्तरीय सत्र में शामिल होने के लिए दुनिया के विभिन्न देशों के नेताओं को अमेरिका में प्रवेश की अनुमति दी जाती है। ईरान और अमेरिका के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं होने के बावजूद ईरान के राजनयिक संयुक्त राष्ट्र में मान्यता प्राप्त प्रतिनिधि के तौर पर मौजूद हैं। ऐसे में महासभा में भाग लेने के लिए ईरानी नेतृत्व को अनुमति देने का मामला कूटनीतिक दायित्वों से भी जुड़ा हुआ है।
मौजूदा परिस्थितियों में इस यात्रा की अहमियत इसलिए और बढ़ गई है क्योंकि अमेरिका और ईरान के बीच फरवरी के अंत से सैन्य संघर्ष चल रहा है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की थी। इसके बाद ईरान की ओर से भी जवाबी हमले किए गए। समय के साथ यह संघर्ष केवल दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव तक सीमित नहीं रहा,बल्कि खाड़ी क्षेत्र के कई हिस्सों तक इसका असर दिखाई देने लगा।
ईरान ने जवाबी कार्रवाई के दौरान खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और समुद्री गतिविधियों को भी निशाना बनाया। इसके बाद रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर तनाव बढ़ गया। यह जलमार्ग दुनिया के ऊर्जा कारोबार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसके जरिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल तथा अन्य ऊर्जा संसाधनों का परिवहन होता है। संघर्ष के दौरान यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी। सितंबर में भी इस जलमार्ग से वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही सामान्य स्तर से काफी कम बनी हुई है।
होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति का असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहा। खाड़ी क्षेत्र से तेल और गैस की आपूर्ति पर निर्भर देशों के लिए यह मार्ग बेहद महत्वपूर्ण है। यहाँ लंबे समय तक व्यवधान रहने से ऊर्जा कीमतों और वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है। मौजूदा हालात में समुद्री जहाजों की सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा बन चुकी है। ईरान और अमेरिका दोनों ही जलमार्ग की स्थिति को लेकर अलग-अलग दावे करते रहे हैं।
इसी बीच यमन में हूती गतिविधियों ने भी क्षेत्रीय तनाव को और जटिल बना दिया है। हूती बलों ने लाल सागर और आसपास के इलाकों में सैन्य गतिविधियाँ बढ़ाई हैं। इससे पश्चिम एशिया में पहले से मौजूद समुद्री सुरक्षा संबंधी चिंताएँ और बढ़ गई हैं। लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य दोनों ही वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों में संघर्ष बढ़ने का सीधा असर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर पड़ सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष के बावजूद दोनों पक्षों के बीच बातचीत के प्रयास पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। हालाँकि,युद्धविराम और व्यापक राजनीतिक समझौते को लेकर अब तक स्थायी समाधान सामने नहीं आया है। परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी सुरक्षा जैसे मुद्दे दोनों देशों के बीच प्रमुख विवादों में बने हुए हैं। ऐसे में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान ईरानी राष्ट्रपति की मौजूदगी अंतर्राष्ट्रीय मंच पर संवाद का एक महत्वपूर्ण अवसर बन सकती है,हालाँकि इससे किसी संभावित समझौते का निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी।
इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अमेरिका ने ईरानी नेताओं को प्रवेश की अनुमति ऐसे समय में दी है,जब वह ईरान के खिलाफ कड़े आर्थिक और राजनीतिक प्रतिबंधों की नीति अपना रहा है। दूसरी ओर,ईरान भी अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और प्रतिबंधों का विरोध करता रहा है। ऐसे माहौल में दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के प्रतिनिधियों का एक ही अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पहुँचना वैश्विक कूटनीति के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम है।
राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन का संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण भी खास महत्व रखता है। माना जा रहा है कि वह ईरान के खिलाफ जारी सैन्य कार्रवाई, क्षेत्रीय सुरक्षा, प्रतिबंधों और अपने देश की स्थिति को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सामने रखेंगे। दूसरी ओर,अमेरिका और उसके सहयोगी देश भी ईरान की सैन्य गतिविधियों और क्षेत्रीय नीतियों को लेकर अपनी चिंताएं सामने रख सकते हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच का इस्तेमाल अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव को कम करने के लिए किसी संभावित कूटनीतिक रास्ते के तौर पर किया जाता है या नहीं। ईरानी राष्ट्रपति की अमेरिका यात्रा ऐसे समय हो रही है जब दोनों देशों के बीच युद्ध को छह महीने से अधिक समय बीत चुका है और पश्चिम एशिया में तनाव का असर समुद्री व्यापार,ऊर्जा बाजार और क्षेत्रीय सुरक्षा पर दिखाई दे रहा है। ऐसे में न्यूयॉर्क में होने वाली आगामी उच्च स्तरीय बैठकें दुनिया की निगाहों में रहेंगी।
