फिल्म निर्माता और पूर्व सेंसर बोर्ड अध्यक्ष पहलाज निहलानी (तस्वीर क्रेडिट@mppchaudhary)

फिल्म जगत को बड़ा झटका,निर्माता और पूर्व सेंसर बोर्ड अध्यक्ष पहलाज निहलानी का 76 वर्ष की उम्र में निधन

मुंबई,5 जून (युआईटीवी)- हिंदी फिल्म उद्योग से एक बेहद दुखद समाचार सामने आया है। जाने-माने फिल्म निर्माता और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष पहलाज निहलानी का 76 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। उनके निधन की खबर ने पूरे फिल्म जगत को शोक में डुबो दिया है। कई दशकों तक भारतीय सिनेमा से जुड़े रहे पहलाज निहलानी ने निर्माता,उद्योग प्रतिनिधि और सेंसर बोर्ड प्रमुख के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई थी। उनके निधन के साथ हिंदी फिल्म उद्योग ने एक ऐसे व्यक्तित्व को खो दिया है,जिसने अपने लंबे करियर में फिल्म जगत को कई यादगार और सफल फिल्में दीं।

उनके निधन की पुष्टि भारतीय फिल्म निर्माताओं के प्रमुख संगठन इंडियन मोशन पिक्चर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अभय सिन्हा ने की। जानकारी के अनुसार,पहलाज निहलानी पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उम्र संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं के कारण उनका इलाज भी जारी था। हालाँकि,उनके निधन की खबर अचानक सामने आने के बाद फिल्म उद्योग के लोगों और उनके प्रशंसकों के बीच शोक की लहर फैल गई।

पहलाज निहलानी भारतीय सिनेमा की उन हस्तियों में शामिल थे,जिन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने अपने करियर में कई ऐसी फिल्मों का निर्माण किया जो व्यावसायिक रूप से सफल रहीं और दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हुईं। उनका नाम विशेष रूप से उन निर्माताओं में लिया जाता है जिन्होंने मनोरंजन प्रधान सिनेमा को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया और दर्शकों की पसंद को समझते हुए फिल्में बनाईं।

उनकी सबसे चर्चित फिल्मों में ‘इल्जाम’, ‘आग ही आग’, ‘शोला और शबनम’ और ‘आंखें’ जैसी फिल्में शामिल हैं। इन फिल्मों ने अपने समय में बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया था और दर्शकों का भरपूर प्यार हासिल किया था। खासतौर पर ‘आंखें’ को हिंदी सिनेमा की सबसे सफल फिल्मों में गिना जाता है। यह फिल्म न केवल व्यावसायिक रूप से बड़ी हिट साबित हुई,बल्कि आज भी मनोरंजन से भरपूर फिल्मों की सूची में एक खास स्थान रखती है। फिल्म की लोकप्रियता ने पहलाज निहलानी को हिंदी सिनेमा के सफल निर्माताओं की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा किया था।

फिल्म निर्माता के रूप में उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक नई प्रतिभाओं को अवसर देना भी था। उन्होंने ऐसे कई कलाकारों को मौका दिया जो आगे चलकर हिंदी फिल्म उद्योग के बड़े सितारे बने। अभिनेता गोविंदा को पहली बार बड़े पर्दे पर प्रस्तुत करने का श्रेय भी पहलाज निहलानी को ही जाता है। वर्ष 1986 में रिलीज हुई फिल्म ‘इल्जाम’ के जरिए गोविंदा ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की थी। यह फिल्म सफल रही और इसके बाद गोविंदा हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय अभिनेताओं में शामिल हो गए।

इसी प्रकार अभिनेता चंकी पांडे को भी उन्होंने अपनी फिल्म ‘आग ही आग’ के माध्यम से उद्योग में प्रवेश दिलाया। उस दौर में नई प्रतिभाओं को अवसर देना आसान नहीं माना जाता था,लेकिन पहलाज निहलानी ने जोखिम उठाते हुए कई नए चेहरों को मंच प्रदान किया। यही कारण है कि फिल्म जगत में उन्हें केवल एक निर्माता के रूप में नहीं,बल्कि प्रतिभाओं को पहचानने वाले व्यक्ति के रूप में भी याद किया जाता है।

वर्ष 1993 में रिलीज हुई ‘आंखें’ ने सफलता के नए रिकॉर्ड बनाए थे। गोविंदा और चंकी पांडे अभिनीत इस फिल्म ने उस समय बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त कमाई की थी और साल की सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्मों में शामिल रही थी। फिल्म की लोकप्रियता आज भी बरकरार है और इसे हिंदी सिनेमा की क्लासिक कॉमेडी फिल्मों में गिना जाता है।

पहलाज निहलानी की फिल्मोग्राफी बेहद विस्तृत रही। उन्होंने ‘हथकड़ी’, ‘आंधी-तूफान’, ‘पाप की दुनिया’, ‘आग का गोला’, ‘दिल तेरा दीवाना’, ‘भाई भाई’, ‘जूली 2’ और ‘रंगीला राजा’ जैसी अनेक फिल्मों का निर्माण किया। इन फिल्मों ने अलग-अलग समय पर दर्शकों का मनोरंजन किया और हिंदी फिल्म उद्योग में उनकी मजबूत उपस्थिति को बनाए रखा।

फिल्म निर्माण के अलावा पहलाज निहलानी ने प्रशासनिक और संगठनात्मक भूमिकाओं में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्ष 2015 में उन्हें केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। उन्होंने 2017 तक इस पद पर कार्य किया। उनके कार्यकाल के दौरान सेंसर बोर्ड कई बार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना। फिल्मों में दिखाई जाने वाली सामग्री को लेकर उनकी सख्त नीतियों ने उन्हें सुर्खियों में बनाए रखा।

सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने फिल्मों में आपत्तिजनक या विवादास्पद मानी जाने वाली सामग्री पर कड़ा रुख अपनाया। उनके कई फैसलों को लेकर फिल्म निर्माताओं और कलाकारों के बीच बहस भी हुई। कुछ लोगों ने उनकी नीतियों का समर्थन किया,जबकि कई फिल्मकारों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश बताया। बावजूद इसके,उन्होंने हमेशा यह कहा कि उनका उद्देश्य भारतीय संस्कृति और सामाजिक मूल्यों के अनुरूप फिल्मों का प्रमाणन सुनिश्चित करना है।

पहलाज निहलानी केवल फिल्म निर्माण और सेंसर बोर्ड तक ही सीमित नहीं रहे। वह लंबे समय तक विभिन्न फिल्म संगठनों से भी जुड़े रहे और उद्योग के हितों के लिए सक्रिय भूमिका निभाते रहे। उन्होंने एसोसिएशन ऑफ मोशन पिक्चर एंड टेलीविजन प्रोग्राम प्रोड्यूसर्स के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया। इस दौरान उन्होंने निर्माताओं की समस्याओं और उद्योग से जुड़े विभिन्न मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। वर्ष 2009 में उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया था,लेकिन उसके बाद भी वह फिल्म जगत की गतिविधियों में सक्रिय बने रहे।

उनके निधन के बाद फिल्म उद्योग के कई कलाकारों,निर्माताओं और तकनीशियनों ने शोक व्यक्त किया है। सभी ने उन्हें एक अनुभवी,स्पष्टवादी और सिनेमा के प्रति समर्पित व्यक्तित्व बताया। उनके साथ काम कर चुके लोगों का कहना है कि वह अपने काम को लेकर बेहद गंभीर रहते थे और फिल्मों के प्रति उनका जुनून जीवन के अंतिम समय तक बना रहा।

पहलाज निहलानी का निधन हिंदी फिल्म उद्योग के लिए एक बड़ी क्षति माना जा रहा है। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा सिनेमा को समर्पित किया और भारतीय फिल्म उद्योग को कई यादगार फिल्में दीं। एक निर्माता,प्रशासक और उद्योग नेता के रूप में उनकी भूमिका लंबे समय तक याद की जाएगी। उनके जाने से भारतीय सिनेमा के एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत हो गया है,लेकिन फिल्मों और फिल्म उद्योग में उनके योगदान की छाप हमेशा बनी रहेगी।