नई दिल्ली,8 अगस्त (युआईटीवी)- दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को डाबर इंडिया लिमिटेड को बड़ी राहत देते हुए भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी एफएसएसएआई के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसके तहत कंपनी को कुछ खाद्य उत्पादों की बिक्री तत्काल रोकने का निर्देश दिया गया था। इन उत्पादों पर कथित तौर पर “100 प्रतिशत” से जुड़े ऐसे दावे किए गए थे,जिन्हें खाद्य नियामक ने अस्पष्ट,सत्यापित न किए जा सकने वाला और उपभोक्ताओं को गुमराह करने वाला बताया था। अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि कंपनी को सुनवाई का अवसर दिए बिना इस तरह का प्रतिबंध आदेश पारित नहीं किया जाना चाहिए था।
दिल्ली हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई एकल न्यायाधीश पीठ के न्यायमूर्ति अमित महाजन ने की। अदालत ने डाबर इंडिया लिमिटेड की याचिका पर केंद्र सरकार और एफएसएसएआई को नोटिस जारी करते हुए उनसे जवाब माँगा। साथ ही,अदालत ने अगली सुनवाई तक एफएसएसएआई के विवादित प्रतिबंध आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है। मामले की अगली सुनवाई 24 अगस्त को होगी।
अदालत ने अपने अंतरिम आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता की दलीलों को देखते हुए प्रथम दृष्टया अदालत की राय है कि इस तरह का प्रतिबंध आदेश कंपनी को सुनवाई का अवसर दिए बिना पारित नहीं किया जाना चाहिए था। इसी आधार पर अदालत ने अगली सुनवाई की तारीख तक विवादित आदेश पर रोक लगा दी।
डाबर इंडिया ने एफएसएसएआई के आदेश को चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। खाद्य नियामक ने कंपनी के कुछ चिन्हित खाद्य उत्पादों की बिक्री तत्काल रोकने का निर्देश दिया था। इन उत्पादों की पैकेजिंग और प्रचार में “100 प्रतिशत प्राकृतिक”, “100 प्रतिशत शुद्ध”, “100 प्रतिशत शुद्धता की गारंटी”, “100 प्रतिशत ऑर्गेनिक” और “100 प्रतिशत टेंडर नारियल पानी” जैसे दावे किए गए थे। एफएसएसएआई का कहना था कि इस तरह के दावे उपभोक्ताओं के लिए भ्रामक हो सकते हैं और खाद्य उत्पादों से संबंधित नियामकीय नियमों के अनुरूप नहीं हैं।
मामले को शुरुआत में तत्काल सुनवाई के लिए दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ के समक्ष रखा गया था। पीठ ने मामले को तत्काल आधार पर सुनवाई के लिए अनुमति दी थी। इसके बाद शुक्रवार को न्यायमूर्ति अमित महाजन की एकल पीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई।
सुनवाई के दौरान डाबर इंडिया की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने एफएसएसएआई के आदेश की वैधता पर सवाल उठाए। उन्होंने अदालत के समक्ष दलील दी कि कंपनी दशकों से संबंधित उत्पादों की बिक्री कर रही है और इन उत्पादों को लेकर नियामकीय प्रक्रिया भी लंबे समय से चली आ रही है। कंपनी की ओर से यह भी कहा गया कि जिस अधिकारी ने बिक्री रोकने का आदेश पारित किया,उसके पास इस तरह से उत्पादों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार नहीं था।
डाबर की ओर से अदालत में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का भी मुद्दा उठाया गया। कंपनी के वकील ने कहा कि एफएसएसएआई का आदेश पारित करने से पहले कंपनी को उचित सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया। इसके अलावा कंपनी को इस कार्रवाई से पहले कोई कारण बताओ नोटिस भी जारी नहीं किया गया था। डाबर की ओर से कहा गया कि किसी कंपनी के उत्पादों की बिक्री पर रोक लगाने जैसा गंभीर कदम उठाने से पहले संबंधित पक्ष को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना आवश्यक है।
वहीं,एफएसएसएआई की ओर से केंद्र सरकार के स्थायी अधिवक्ता आशीष दीक्षित ने नियामक की कार्रवाई का बचाव किया। उन्होंने अदालत को बताया कि प्रतिबंध आदेश जारी करने से पहले डाबर को सुधार संबंधी नोटिस दिया गया था। सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि खाद्य उत्पादों के लेबल और दावों को लेकर नियामकीय मानकों का पालन सुनिश्चित करना एफएसएसएआई की जिम्मेदारी है और उपभोक्ताओं को संभावित रूप से भ्रामक दावों से बचाना भी नियामक का महत्वपूर्ण दायित्व है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने फिलहाल एफएसएसएआई के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी। अदालत ने यह भी माना कि प्रथम दृष्टया मामला डाबर के पक्ष में बनता है, खासकर कंपनी को सुनवाई का अवसर दिए जाने के सवाल पर। हालाँकि,अदालत का यह अंतरिम आदेश मामले के अंतिम निपटारे का फैसला नहीं है। एफएसएसएआई और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया गया है और उनके जवाब के बाद अदालत मामले के विभिन्न कानूनी पहलुओं पर आगे विचार करेगी।
एफएसएसएआई ने डाबर के कुछ उत्पादों पर इस्तेमाल किए गए “100 प्रतिशत” दावों को लेकर गंभीर आपत्ति जताई थी। नियामक के अनुसार,ऐसे दावे स्पष्ट और वस्तुनिष्ठ तरीके से सत्यापित किए जाने योग्य होने चाहिए। यदि किसी उत्पाद पर ऐसा दावा किया जाता है,जिसे उपभोक्ता किसी पूर्ण गारंटी के रूप में समझ सकता है,लेकिन उस दावे को पर्याप्त रूप से साबित नहीं किया जा सकता,तो इससे उपभोक्ता के भ्रमित होने की संभावना रहती है।
खाद्य नियामक ने इन दावों को खाद्य सुरक्षा एवं मानक विज्ञापन तथा दावे विनियम, 2018 के तहत भी देखा था। एफएसएसएआई का कहना था कि खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग और विज्ञापन में किए जाने वाले दावे ऐसे नहीं होने चाहिए,जो उत्पाद की प्रकृति,गुणवत्ता, शुद्धता या विशेषताओं को लेकर उपभोक्ताओं को गलत धारणा दें।
इस विवाद में केवल “100 प्रतिशत” दावों का मुद्दा ही नहीं है। एफएसएसएआई ने डाबर हिमालयन ऑर्गेनिक एप्पल साइडर विनेगर और डाबर ऑर्गेनिक हनी पर जैविक भारत लोगो के इस्तेमाल को लेकर भी आपत्ति जताई थी। नियामक का आरोप था कि इन उत्पादों के पास वैध एफएसएसएआई ऑर्गेनिक अनुमोदन नहीं था। एफएसएसएआई ने इसे खाद्य सुरक्षा एवं मानक जैविक खाद्य विनियम, 2017 के प्रावधानों के उल्लंघन से जोड़ा था।
जैविक खाद्य उत्पादों पर प्रमाणन और निर्धारित लोगो के इस्तेमाल का उद्देश्य उपभोक्ताओं को यह भरोसा देना है कि संबंधित उत्पाद निर्धारित जैविक मानकों और नियामकीय प्रक्रियाओं का पालन करता है। ऐसे में नियामक की ओर से जैविक लोगो के इस्तेमाल पर आपत्ति को भी मामले का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
डाबर की ओर से फिलहाल अदालत में मुख्य जोर इस बात पर रहा कि बिक्री रोकने जैसा कठोर कदम उठाने से पहले कंपनी को उचित प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए था। हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश से कंपनी को फिलहाल राहत मिली है,लेकिन अंतिम कानूनी स्थिति अगली सुनवाइयों और केंद्र सरकार तथा एफएसएसएआई के जवाब के बाद स्पष्ट होगी।
इस मामले में अदालत का आदेश खाद्य कंपनियों और नियामकों के बीच नियामकीय प्रक्रिया से जुड़े सवालों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना नियामक की जिम्मेदारी है,लेकिन किसी उत्पाद की बिक्री पर प्रतिबंध जैसे कदम उठाते समय संबंधित कंपनी को उचित प्रक्रिया और सुनवाई का अवसर दिया जाना भी कानूनी रूप से महत्वपूर्ण है।
फिलहाल दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद डाबर के खिलाफ एफएसएसएआई के विवादित प्रतिबंध आदेश के क्रियान्वयन पर रोक है। 24 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई में केंद्र सरकार और एफएसएसएआई अपना पक्ष अदालत के सामने रखेंगे। इसके बाद अदालत यह तय करेगी कि मामले में आगे क्या कानूनी दिशा होगी। इस बीच “100 प्रतिशत” दावों,जैविक उत्पादों की प्रमाणिकता और खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग पर किए जाने वाले दावों को लेकर नियामकीय बहस जारी रहने की संभावना है।
