बॉम्बे हाईकोर्ट ने एफडीए को लगाई फटकार

98 फीसदी अनुपालन के बावजूद मिठाई दुकान का लाइसेंस निलंबित रखने पर हाई कोर्ट सख्त,एफडीए को 5 लाख रुपये हर्जाना देने का आदेश

मुंबई,18 अगस्त (युआईटीवी)- बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन की कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताते हुए पुणे की एक डेयरी और मिठाई विक्रेता को बड़ी राहत दी है। अदालत ने वडगांव शेरी स्थित गुरुनानक डेयरी एंड स्वीट्स का खाद्य लाइसेंस निलंबित रखने के आदेश को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया। साथ ही खाद्य एवं औषधि प्रशासन को दुकान के मालिक को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। अदालत ने माना कि जब दोबारा निरीक्षण में दुकान ने 98 फीसदी अनुपालन हासिल कर लिया था,तब भी लाइसेंस निलंबित रखना उचित नहीं था।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अखंड की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए खाद्य एवं औषधि प्रशासन की नीति को कठोर शब्दों में आलोचना की। अदालत ने कहा कि विभाग की मूल मंशा भले ही सराहनीय हो और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना उसका महत्वपूर्ण दायित्व है,लेकिन किसी प्रतिष्ठान द्वारा कमियों को दूर करने और 98 फीसदी अनुपालन हासिल करने के बाद भी लाइसेंस निलंबित रखना नागरिक को अनावश्यक रूप से परेशान करने जैसा है।

यह मामला पुणे की गुरुनानक डेयरी एंड स्वीट्स की ओर से दायर याचिका से जुड़ा था। दुकान के मालिक ने खाद्य एवं औषधि प्रशासन की ओर से की गई कार्रवाई को चुनौती देते हुए कहा था कि विभाग के फैसले के कारण उनका कारोबार लंबे समय तक बंद रहा और उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। याचिकाकर्ता के मुताबिक,दुकान की रोजाना की औसत कमाई करीब 25 हजार रुपये थी और लाइसेंस निलंबित रहने के कारण करीब 8.74 लाख रुपये का नुकसान हुआ।

मामले की शुरुआत 11 जून को हुई कथित फूड पॉइजनिंग की घटना के बाद हुई। घटना के अगले दिन,यानी 12 जून को खाद्य सुरक्षा अधिकारी ने दुकान का खाद्य लाइसेंस निलंबित कर दिया। याचिका के अनुसार,दुकान के खिलाफ तत्काल कार्रवाई करते हुए उसे कारोबार बंद करने का निर्देश दिया गया। दुकान संचालक का आरोप था कि कार्रवाई से पहले उसे सुधार का उचित अवसर नहीं दिया गया और न ही प्रभावी सुनवाई की प्रक्रिया अपनाई गई।

खाद्य एवं औषधि प्रशासन की कार्रवाई के बाद दुकान संचालक ने आवश्यक कमियों को दूर करने की दिशा में कदम उठाए। इसके बाद 13 जुलाई को खाद्य सुरक्षा अधिकारी ने दुकान का दोबारा निरीक्षण किया। इस निरीक्षण में दुकान ने 98 फीसदी अनुपालन हासिल किया। याचिकाकर्ता का कहना था कि इस निरीक्षण के बाद लाइसेंस निलंबित रखने का कोई औचित्य नहीं रह गया था,क्योंकि विभाग के अपने निरीक्षण में प्रतिष्ठान की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार की पुष्टि हो चुकी थी।

इसके बावजूद निलंबन आदेश वापस नहीं लिया गया। दुकान के मालिक ने इसके खिलाफ 15 जुलाई को खाद्य एवं औषधि प्रशासन के आयुक्त के समक्ष अपील दायर की। लेकिन अपील पर तत्काल फैसला नहीं हुआ। लंबे समय तक कारोबार बंद रहने के कारण आर्थिक नुकसान बढ़ता गया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया और अदालत से हस्तक्षेप की माँग की।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिजीत देसाई ने अदालत के सामने एक अन्य मामले का भी हवाला दिया। उन्होंने पुणे के पिंड पंजाब मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि हाई कोर्ट पहले ही 16 जुलाई को यह स्पष्ट कर चुका है कि यदि नए निरीक्षण में प्रतिष्ठान द्वारा पूर्ण अनुपालन की पुष्टि हो जाती है,तो पुराने निलंबन आदेश को जारी रखने का आधार समाप्त हो जाता है।

अदालत ने इस दलील को गंभीरता से लिया और खाद्य एवं औषधि प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि विभाग का उद्देश्य खाद्य सुरक्षा बनाए रखना निश्चित तौर पर महत्वपूर्ण है,लेकिन प्रशासनिक कार्रवाई का उद्देश्य नागरिकों को अनिश्चितकाल तक परेशान करना नहीं हो सकता। अदालत ने यह भी कहा कि जब दोबारा निरीक्षण में 98 फीसदी अनुपालन सामने आ गया था,तब विभाग को निलंबन आदेश पर तुरंत पुनर्विचार करना चाहिए था।

सुनवाई के दौरान अदालत ने खाद्य एवं औषधि प्रशासन की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करते हुए कहा कि विभाग की मंशा सराहनीय हो सकती है,लेकिन वह कार्रवाई में अति कर रहा है। अदालत ने सवाल किया कि जब विभाग को पता चल गया कि प्रतिष्ठान ने 98 फीसदी अनुपालन हासिल कर लिया है,तब लाइसेंस निलंबन को समाप्त करने के बजाय दुकानदार को अपील की प्रक्रिया में क्यों भेजा गया।

सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि लाइसेंस निलंबन के खिलाफ याचिकाकर्ता की अपील खाद्य एवं औषधि प्रशासन के आयुक्त के समक्ष लंबित थी। सरकारी वकील ने बताया कि 11 अगस्त को अपील पर सुनवाई पूरी हो चुकी थी और आदेश सुरक्षित रखा गया था। हालाँकि,अदालत इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुई। पीठ ने कहा कि अपील लंबित होने का हवाला देकर प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।

अदालत ने प्रशासन की इस स्थिति को स्पष्ट रूप से अनुचित बताया। पीठ ने कहा कि एक बार जब निरीक्षण में 98 फीसदी अनुपालन की पुष्टि हो गई थी,तो दुकान संचालक को सिर्फ इस वजह से कारोबार बंद रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता कि उसकी अपील पर अभी आदेश नहीं आया है। अदालत ने इस पूरी प्रक्रिया को नागरिकों को परेशान करने वाला रवैया बताया।

सुनवाई के दौरान अदालत ने दुकान की रोजाना की कमाई के बारे में भी जानकारी ली। याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि दुकान से प्रतिदिन करीब 25 हजार रुपये की कमाई होती थी। अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि अनुपालन की पुष्टि होने के बावजूद दुकान को फिर से कारोबार शुरू करने की अनुमति नहीं दी गई और इसके चलते करीब 34 दिन तक कारोबार प्रभावित रहा। इस अवधि में नुकसान करीब 8.5 लाख रुपये तक पहुँच गया।

अदालत ने कहा कि राज्य सरकार को अपील लंबित होने का कमजोर बहाना नहीं बनाना चाहिए था। पीठ के अनुसार, 98 फीसदी अनुपालन हासिल होने के बाद निलंबन आदेश को तुरंत रद्द करने की दिशा में कदम उठाया जाना चाहिए था। अदालत ने खाद्य एवं औषधि प्रशासन की अनुपालन रिपोर्ट को भी अपने फैसले में महत्वपूर्ण माना।

इसी आधार पर पीठ ने गुरुनानक डेयरी एंड स्वीट्स को अपना खुदरा कारोबार दोबारा शुरू करने की अनुमति दे दी। अदालत ने 12 जून को जारी लाइसेंस निलंबन आदेश को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया। इससे दुकान संचालक के लिए अपना व्यवसाय फिर से शुरू करने का रास्ता साफ हो गया है।

इसके साथ ही अदालत ने खाद्य एवं औषधि प्रशासन को दुकान के मालिक को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड और अनुपालन रिपोर्ट को देखते हुए याचिकाकर्ता को हुए नुकसान की भरपाई के लिए यह राशि देना उचित है। प्रशासन को 30 दिनों के भीतर 5 लाख रुपये की राशि हाई कोर्ट में जमा करने का निर्देश दिया गया है। इसके बाद याचिकाकर्ता को वह राशि निकालने की स्वतंत्रता होगी।

अदालत का यह फैसला खाद्य सुरक्षा नियमों के पालन और प्रशासनिक कार्रवाई के बीच संतुलन को लेकर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खाद्य एवं औषधि प्रशासन का दायित्व खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और उपभोक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। किसी प्रतिष्ठान में खाद्य सुरक्षा से जुड़ी गंभीर कमी मिलने पर उसके खिलाफ कार्रवाई करना प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में आता है,लेकिन अदालत ने यह स्पष्ट किया कि सुधार के बाद भी दंडात्मक कार्रवाई को अनिश्चित समय तक जारी नहीं रखा जा सकता।

मामले में अदालत ने यह भी संकेत दिया कि प्रशासनिक शक्तियों का इस्तेमाल करते समय प्रक्रिया की निष्पक्षता और तर्कसंगतता का ध्यान रखना आवश्यक है। यदि किसी दुकान या प्रतिष्ठान में कमियाँ पाई जाती हैं और उसके बाद निरीक्षण में यह सामने आता है कि प्रतिष्ठान ने अधिकांश आवश्यक मानकों का पालन कर लिया है,तो प्रशासन को उसी के अनुरूप कार्रवाई की समीक्षा करनी चाहिए।

गुरुनानक डेयरी एंड स्वीट्स के मामले में अदालत ने इस बात को विशेष महत्व दिया कि दोबारा निरीक्षण में 98 फीसदी अनुपालन पाया गया था। इसके बावजूद निलंबन जारी रखा गया और दुकान को अपील के नतीजे का इंतजार करना पड़ा। अदालत ने माना कि इस स्थिति में कारोबार बंद रहने से होने वाला आर्थिक नुकसान लगातार बढ़ता रहा, जबकि प्रशासन के पास निलंबन को जारी रखने का पर्याप्त आधार नहीं था।

अदालत की टिप्पणी का व्यापक असर खाद्य कारोबार से जुड़े अन्य प्रतिष्ठानों पर भी पड़ सकता है। हालाँकि,हर मामले के तथ्य अलग होंगे और खाद्य सुरक्षा के उल्लंघन की गंभीरता के आधार पर प्रशासन कार्रवाई कर सकता है,लेकिन इस फैसले से यह संदेश गया है कि प्रशासनिक कार्रवाई सुधारात्मक प्रक्रिया के अनुरूप होनी चाहिए। केवल लाइसेंस निलंबित करना ही उद्देश्य नहीं हो सकता; कमियों को दूर किए जाने के बाद कार्रवाई की समीक्षा भी जरूरी है।

इस पूरे मामले में अदालत ने एक तरफ खाद्य सुरक्षा के महत्व को स्वीकार किया,वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक जवाबदेही पर भी जोर दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि विभाग की मंशा उपभोक्ताओं की सुरक्षा करना हो सकती है,लेकिन अच्छी मंशा के बावजूद यदि प्रक्रिया नागरिक के लिए अनुचित कठिनाई और आर्थिक नुकसान का कारण बनती है तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।

अब खाद्य एवं औषधि प्रशासन को अदालत के निर्देश के अनुसार 30 दिनों के भीतर 5 लाख रुपये की राशि जमा करनी होगी। वहीं गुरुनानक डेयरी एंड स्वीट्स को अपना खुदरा कारोबार फिर से शुरू करने की अनुमति मिल गई है। इस फैसले के साथ अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि खाद्य सुरक्षा की निगरानी जरूरी है,लेकिन अनुपालन सामने आने के बाद लाइसेंस निलंबन को बिना ठोस कारण के जारी रखना प्रशासनिक विवेक का उचित इस्तेमाल नहीं माना जा सकता।