भारत-यूके व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता आज से लागू (तस्वीर क्रेडिट@np_nationpress)

भारत-यूके मुक्त व्यापार समझौते से खुले नए अवसर, निर्यात, निवेश और उद्योगों को मिलेगी नई रफ्तार

नई द‍िल्‍ली,16 जुलाई (युआईटीवी)- भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच लागू हुआ व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता (सीईटीए) दोनों देशों के आर्थिक संबंधों में एक नए दौर की शुरुआत माना जा रहा है। लंबे समय तक चली बातचीत के बाद लागू हुए इस समझौते को केवल व्यापार बढ़ाने का माध्यम नहीं,बल्कि निवेश,विनिर्माण,आपूर्ति श्रृंखला,रोजगार और वैश्विक बाजारों तक पहुंच को मजबूत करने वाले व्यापक आर्थिक ढाँचे के रूप में देखा जा रहा है। उद्योग जगत,निर्यातकों और नीति विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता भारतीय उत्पादों को ब्रिटेन के बाजार में नई प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त देगा और आने वाले वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

इस समझौते से कपड़ा उद्योग,आयुर्वेद, कृषि, प्रसंस्कृत खाद्य, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स,रत्न एवं आभूषण,हस्तशिल्प और कई अन्य क्षेत्रों को विशेष लाभ मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। इन क्षेत्रों के प्रतिनिधियों का कहना है कि आयात शुल्क में कमी या पूरी तरह समाप्त होने से भारतीय उत्पाद ब्रिटेन के बाजार में अधिक किफायती बनेंगे,जिससे उनकी माँग बढ़ेगी और निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिल सकती है।

वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने इस समझौते को केवल व्यापारिक करार नहीं,बल्कि दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को नई दिशा देने वाला कदम बताया। उन्होंने कहा कि किसी भी मुक्त व्यापार समझौते का उद्देश्य केवल आयात और निर्यात बढ़ाना नहीं होता। ऐसे समझौते दोनों देशों के बीच व्यापारिक नियमों,शुल्क व्यवस्था और कारोबारी प्रक्रियाओं को अधिक स्पष्ट और भरोसेमंद बनाते हैं। इससे उद्योगों और निवेशकों को दीर्घकालिक योजना बनाने में आसानी होती है और व्यापारिक अनिश्चितताएँ कम होती हैं।

राजेश अग्रवाल ने कहा कि सरकार को विश्वास है कि यह समझौता भारत और ब्रिटेन के बीच निवेश को भी नई गति देगा। जब व्यापारिक माहौल स्थिर और पारदर्शी होता है तो उद्योगों का भरोसा बढ़ता है और नए निवेश के अवसर पैदा होते हैं। उन्होंने कहा कि इससे दोनों देशों के बीच आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होगी और भारतीय कंपनियों को वैश्विक आपूर्ति नेटवर्क में अधिक प्रभावी भूमिका निभाने का अवसर मिलेगा। इसके साथ ही भारतीय उद्योगों के लिए दुनिया के अन्य बाजारों तक पहुँच के नए रास्ते भी खुलेंगे।

भारत में ब्रिटेन की उच्चायुक्त लिंडी कैमरून ने इस समझौते के लागू होने को दोनों देशों के लिए ऐतिहासिक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि भारत और ब्रिटेन के बीच पहले से लगभग 48 अरब पाउंड का व्यापारिक संबंध है और अब यह समझौता उस साझेदारी को और अधिक मजबूत बनाएगा। उनके अनुसार,इस समझौते से दोनों देशों के बीच होने वाला व्यापार पहले की तुलना में अधिक तेज,सरल और कम लागत वाला होगा।

लिंडी कैमरून ने कहा कि इस समझौते का लाभ केवल सरकारों या बड़े उद्योगों तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि दोनों देशों के कारोबारियों,निवेशकों,कर्मचारियों और आम लोगों को भी इसका प्रत्यक्ष फायदा मिलेगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस समझौते के प्रभाव से भारत और ब्रिटेन दोनों की अर्थव्यवस्था में लगभग पाँच अरब पाउंड तक की अतिरिक्त वृद्धि संभव हो सकती है।

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि अब भारत से ब्रिटेन जाने वाले 99 प्रतिशत उत्पादों पर कोई आयात शुल्क नहीं लगेगा। वहीं ब्रिटेन से भारत आने वाले लगभग 90 प्रतिशत उत्पाद या तो पूरी तरह शुल्क मुक्त होंगे या उन पर पहले की तुलना में काफी कम आयात शुल्क लागू होगा। इससे दोनों देशों के बीच वस्तुओं का आदान-प्रदान अधिक प्रतिस्पर्धी और लाभकारी बनने की संभावना है।

लॉजिस्टिक्स और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ भी इस समझौते को भारत के निर्यात क्षेत्र के लिए बड़ी उपलब्धि मान रहे हैं। कॉन्टिनेंटल कैरियर्स ग्रुप ऑफ कंपनीज के चेयरमैन विपिन वोहरा ने कहा कि यह समझौता भारत और ब्रिटेन के बीच निर्यात-आयात के पूरे परिदृश्य को बदल सकता है। उनके अनुसार कपड़ा,हस्तशिल्प,फार्मास्यूटिकल्स, रत्न एवं आभूषण जैसे क्षेत्रों को सबसे अधिक लाभ मिलने की संभावना है।

उन्होंने कहा कि यदि निर्यात में अपेक्षित वृद्धि होती है तो दोनों देशों के बीच माल और यात्रियों की आवाजाही भी बढ़ेगी। इसके लिए उन्होंने दोनों सरकारों से हवाई संपर्क मजबूत करने की आवश्यकता पर भी बल दिया। उनका मानना है कि अधिक लैंडिंग अधिकार और सीधी उड़ानों की संख्या बढ़ने से व्यापार को अतिरिक्त गति मिलेगी और माल परिवहन की लागत में भी कमी आएगी।

इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र के लिए भी यह समझौता नई संभावनाएँ लेकर आया है। सहस्रा ग्रुप के अध्यक्ष अमृत मनवानी ने कहा कि यह समझौता दोनों देशों के लिए लाभकारी साबित होगा। उन्होंने कहा कि अब तक भारत ब्रिटेन को इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का निर्यात अपेक्षित स्तर तक नहीं बढ़ा पाया था,लेकिन अब परिस्थितियां बदल सकती हैं। उनका मानना है कि इलेक्ट्रॉनिक हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों क्षेत्रों में भारतीय कंपनियों को ब्रिटेन के बाजार में अधिक अवसर मिलेंगे।

कपड़ा उद्योग को भी इस समझौते से सबसे अधिक लाभ मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के महासचिव मिथिलेश्वर ठाकुर ने कहा कि वर्षों से भारतीय कपड़ा उद्योग ब्रिटेन में लगभग 9.6 प्रतिशत आयात शुल्क के कारण प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जाता था। अब यह बाधा समाप्त होने से भारतीय उत्पाद अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगे और ब्रिटेन को कपड़ों का निर्यात तेजी से बढ़ेगा।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि आने वाले कुछ वर्षों में ब्रिटेन को भारत से होने वाला परिधान निर्यात दोगुना हो सकता है। उनके अनुसार भारत की मजबूत विनिर्माण क्षमता, कुशल श्रमिक और बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद अब शुल्क संबंधी बाधाओं से मुक्त होकर ब्रिटिश बाजार में अधिक प्रभावी ढंग से प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे।

अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन डॉ. ए. शक्तिवेल ने भी इस समझौते को भारतीय परिधान उद्योग के लिए ऐतिहासिक अवसर बताया। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन के खरीदार लंबे समय से भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता की सराहना करते रहे हैं,लेकिन कई बार शुल्क संबंधी कारणों से वे अन्य देशों से खरीदारी करने को मजबूर होते थे। कम विकसित देशों को मिलने वाली शुल्क छूट के कारण भारतीय निर्यातकों को प्रतिस्पर्धा में नुकसान उठाना पड़ता था। अब इस असमानता के समाप्त होने से भारतीय उद्योग को बड़ा लाभ मिलेगा।

रत्न एवं आभूषण उद्योग भी इस समझौते को लेकर आशावादी है। आईओपीईपीसी के चेयरमैन संदीप भूरा ने कहा कि ब्रिटेन का बाजार लगभग 500 मिलियन अमेरिकी डॉलर का है और भारतीय कंपनियों के लिए इसमें बड़ी संभावनाएँ मौजूद हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि अगले चार से पाँच वर्षों में इस बाजार में भारत की हिस्सेदारी मौजूदा 5 से 7 प्रतिशत से बढ़कर 10 से 15 प्रतिशत तक पहुँच सकती है।

कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य क्षेत्र के लिए भी यह समझौता महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत सरकार के वरिष्ठ सलाहकार डॉ. तरुण बजाज ने कहा कि कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों से जुड़े लगभग 95 प्रतिशत उत्पादों को ब्रिटेन के बाजार में शून्य आयात शुल्क का लाभ मिलेगा। इससे भारतीय किसानों,खाद्य प्रसंस्करण उद्योग और निर्यातकों को सीधा फायदा मिलने की संभावना है।

उन्होंने कहा कि भारतीय मसाले,चावल,तैयार खाद्य पदार्थ,फल,सब्जियाँ और अन्य कृषि आधारित उत्पाद पहले की तुलना में अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगे। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी और कृषि क्षेत्र में मूल्य संवर्धन को बढ़ावा मिलेगा।

आयुर्वेद क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने भी इस समझौते का स्वागत किया है। दीपक कुमार बडाया ने कहा कि विश्व स्तर पर भारतीय आयुर्वेदिक उत्पादों की माँग लगातार बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में भारतीय कंपनियों की सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धा चीन से है। अब शुल्क में मिलने वाली राहत और भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता पर अंतर्राष्ट्रीय उपभोक्ताओं के बढ़ते भरोसे के कारण ब्रिटेन के खरीदार भारतीय आयुर्वेदिक उत्पादों को अधिक प्राथमिकता दे सकते हैं।

उन्होंने कहा कि आयुर्वेद केवल दवाओं तक सीमित नहीं है,बल्कि इसमें स्वास्थ्य, प्राकृतिक उपचार और जीवनशैली से जुड़े अनेक उत्पाद शामिल हैं। ऐसे में यह समझौता भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली को वैश्विक बाजार में और मजबूत पहचान दिलाने में मददगार हो सकता है।

व्यापार विशेषज्ञ डिंपल लांबा ने भी इस समझौते को भारत और ब्रिटेन दोनों के लिए गर्व का विषय बताया। उन्होंने कहा कि यह केवल शुल्क में कमी का समझौता नहीं है,बल्कि भारतीय निर्यातकों के लिए एक नई शुरुआत है। योग्य उत्पादों पर शून्य शुल्क की सुविधा मिलने से भारतीय कंपनियाँ ब्रिटेन में बेहतर कीमत पर अपने उत्पाद उपलब्ध करा सकेंगी,जिससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते का प्रभाव केवल बड़े उद्योगों तक सीमित नहीं रहेगा। देश के सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्यमों को भी इससे लाभ मिलने की संभावना है। हस्तशिल्प,पारंपरिक उत्पाद,खाद्य प्रसंस्करण,चमड़ा,इंजीनियरिंग उत्पाद और अन्य अनेक क्षेत्रों में काम करने वाले छोटे उद्योगों के लिए ब्रिटेन का बाजार पहले की तुलना में अधिक सुलभ हो सकता है।

इसके अलावा यह समझौता वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की भूमिका को भी मजबूत कर सकता है। वर्तमान समय में दुनिया भर की कंपनियाँ अपने उत्पादन और आपूर्ति नेटवर्क में विविधता लाने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे में भारत और ब्रिटेन के बीच मजबूत व्यापारिक साझेदारी भारतीय उद्योगों को नए अवसर प्रदान कर सकती है।

आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी मुक्त व्यापार समझौते की वास्तविक सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। यदि भारतीय उद्योग गुणवत्ता मानकों,समय पर आपूर्ति और प्रतिस्पर्धी कीमतों पर ध्यान बनाए रखते हैं,तो यह समझौता भारत के निर्यात क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है।

भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच लागू हुआ यह व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता ऐसे समय में प्रभावी हुआ है,जब वैश्विक व्यापार नई चुनौतियों और अवसरों के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में यह समझौता दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को नई दिशा देने के साथ-साथ भारतीय उद्योगों को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अधिक मजबूत स्थिति दिलाने की क्षमता रखता है।

कुल मिलाकर, उद्योग जगत,निर्यातकों और नीति विशेषज्ञों की प्रतिक्रियाओं से यह स्पष्ट है कि इस समझौते को लेकर व्यापक सकारात्मक उम्मीदें हैं। यदि अनुमान के अनुरूप निर्यात,निवेश और व्यापार में वृद्धि होती है,तो आने वाले वर्षों में भारत और ब्रिटेन के आर्थिक संबंध पहले से कहीं अधिक मजबूत हो सकते हैं। साथ ही भारतीय उत्पादों को वैश्विक बाजार में नई पहचान और बेहतर प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलने की संभावना भी काफी बढ़ जाएगी। यही कारण है कि भारत-यूके व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौते को दोनों देशों की आर्थिक साझेदारी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी कदम माना जा रहा है।