लंदन,29 अप्रैल (युआईटीवी)- ब्रिटेन की राजनीति में पिछले कुछ दिनों से चर्चा में रहे एक अहम मामले में बड़ा फैसला सामने आया है। प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जाँच को लेकर हाउस ऑफ कॉमन्स में हुई वोटिंग में प्रस्ताव खारिज कर दिया गया। इस निर्णय के बाद स्पष्ट हो गया है कि पूर्व राजदूत पीटर मैंडेलसन से जुड़े विवाद में प्रधानमंत्री के खिलाफ फिलहाल कोई औपचारिक जाँच नहीं होगी। यह फैसला ब्रिटेन की संसद में लंबी बहस और तीखी राजनीतिक खींचतान के बाद लिया गया,जिसने देश की राजनीतिक स्थिति को और भी गर्म कर दिया है।
मंगलवार को स्थानीय समय के अनुसार हाउस ऑफ कॉमन्स में इस मुद्दे पर पाँच घंटे से अधिक समय तक बहस चली। इस दौरान विपक्ष और सत्तारूढ़ पक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। अंततः जब मतदान हुआ तो 335 सांसदों ने जाँच के प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया,जबकि 223 सांसद इसके पक्ष में रहे। इस तरह स्पष्ट बहुमत से कंजरवेटिव पार्टी द्वारा लाया गया प्रस्ताव गिर गया। इस प्रस्ताव में माँग की गई थी कि प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर पर लगे आरोपों की जाँच संसद की प्रिविलेज कमेटी से कराई जाए।
यह पूरा विवाद उस बयान से जुड़ा है,जिसमें प्रधानमंत्री स्टार्मर ने कहा था कि अमेरिका में ब्रिटेन के पूर्व राजदूत पीटर मैंडेलसन की नियुक्ति पूरी तरह से तय प्रक्रियाओं के अनुसार की गई थी। विपक्ष का आरोप था कि यह बयान संसद को गुमराह करने वाला है। कंजरवेटिव पार्टी की नेता केमी बैडेनोच ने इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया और कहा कि प्रधानमंत्री ने संसद के सामने सही जानकारी नहीं रखी। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के लिए गंभीर मामला बताया और इसकी निष्पक्ष जाँच की माँग की।
हालाँकि,प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि यह पूरा मामला उनके राजनीतिक विरोधियों द्वारा किया गया एक “पॉलिटिकल स्टंट” है। उनका कहना था कि इस तरह के कदम केवल राजनीतिक लाभ के लिए उठाए जाते हैं और इससे पारदर्शिता या जवाबदेही पर कोई असर नहीं पड़ता। उन्होंने यह भी कहा कि संसद का समय ऐसे मुद्दों पर बर्बाद करना उचित नहीं है,जब देश के सामने कई महत्वपूर्ण चुनौतियाँ मौजूद हैं।
दरअसल,यह विवाद तब शुरू हुआ जब अप्रैल के मध्य में यह जानकारी सामने आई कि पीटर मैंडेलसन को जनवरी 2025 में सुरक्षा मंजूरी देने से मना कर दिया गया था। उस समय ब्रिटिश सुरक्षा एजेंसियों ने उनकी पृष्ठभूमि की गहन जाँच की थी,जिसमें एक गोपनीय बैकग्राउंड चेक भी शामिल था। इस जाँच के बाद उन्हें क्लियरेंस नहीं दी गई थी। हालाँकि,बाद में ब्रिटेन के विदेश कार्यालय ने इस फैसले को पलटते हुए उन्हें नियुक्ति के लिए मंजूरी दे दी। इसी फैसले ने पूरे विवाद को जन्म दिया और विपक्ष ने सवाल उठाया कि क्या इस प्रक्रिया में सभी नियमों का पालन किया गया था।
प्रधानमंत्री स्टार्मर ने स्पष्ट किया कि उन्हें इस पूरे मामले की जानकारी 14 अप्रैल को ही मिली थी। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने संसद में बयान दिया,उस समय उनके पास उपलब्ध जानकारी के आधार पर ही उन्होंने जवाब दिया था। उन्होंने जोर देकर कहा कि उन्होंने किसी भी प्रकार से संसद को गुमराह नहीं किया और उनका इरादा हमेशा पारदर्शिता बनाए रखने का रहा है।
इस मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पीटर मैंडेलसन का नाम पहले भी विवादों में रहा है। सितंबर 2025 में उन्हें वाशिंगटन में ब्रिटेन के मुख्य राजनयिक पद से हटा दिया गया था। यह कदम तब उठाया गया,जब उनके और कुख्यात व्यक्ति जेफरी एपस्टीन के बीच संबंधों के खुलासे हुए थे। इस घटना ने उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए थे और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बना था।
इसके अलावा,इस वर्ष की शुरुआत में मैंडेलसन को एक अन्य मामले में भी गिरफ्तार किया गया था। यह मामला सार्वजनिक पद के दुरुपयोग से जुड़ा था,जिसमें बाजार को प्रभावित करने वाली संवेदनशील जानकारी के संभावित खुलासे की जाँच की जा रही थी। हालाँकि,बाद में उन्हें राहत मिल गई,लेकिन इन घटनाओं ने उनके करियर और छवि पर गहरा असर डाला।
हाउस ऑफ कॉमन्स में हुई वोटिंग के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि फिलहाल प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई जाँच नहीं होगी,लेकिन यह मुद्दा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। विपक्ष ने संकेत दिए हैं कि वे इस मामले को आगे भी उठाते रहेंगे और सरकार को जवाबदेह ठहराने की कोशिश करेंगे। वहीं सत्तारूढ़ पक्ष का मानना है कि यह मुद्दा अनावश्यक रूप से बढ़ाया गया और इसका उद्देश्य केवल राजनीतिक दबाव बनाना था।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम का असर आने वाले समय में ब्रिटेन की राजनीति पर पड़ सकता है। जहाँ एक ओर प्रधानमंत्री को संसद में बहुमत का समर्थन मिला है,वहीं दूसरी ओर विपक्ष को भी यह मुद्दा जनता के बीच उठाने का अवसर मिल गया है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में यह विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है।
हाउस ऑफ कॉमन्स का यह फैसला प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के लिए राहत भरा जरूर है,लेकिन यह मामला ब्रिटेन की राजनीति में पारदर्शिता,जवाबदेही और सत्ता के संतुलन को लेकर जारी बहस को और तेज कर गया है।
