डोनाल्ड ट्रंप (तस्वीर क्रेडिट@wsyx6)

नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलने पर भड़के डोनाल्ड ट्रंप, बोले- अमेरिका के साथ हुआ अन्याय, आठ संघर्ष खत्म कराने का किया दावा

वॉशिंगटन,10 अक्टूबर (युआईटीवी)- अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलने पर नाराजगी जाहिर करते हुए पुरस्कार चयन समिति की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने अपने कूटनीतिक प्रयासों के जरिए आठ अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों को समाप्त कराने में भूमिका निभाई, लेकिन इसके बावजूद उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान नहीं दिया गया। ट्रंप ने इस फैसले को अमेरिका के साथ अन्याय बताते हुए कहा कि उनके प्रशासन की शांति स्थापित करने की कोशिशों को उचित मान्यता मिलनी चाहिए थी।

शुक्रवार को न्यूयॉर्क के सिरैक्यूज में रिपब्लिकन उम्मीदवारों के समर्थन में आयोजित एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए ट्रंप ने कहा कि अमेरिका,जिसका प्रतिनिधित्व वह राष्ट्रपति के रूप में करते हैं,नोबेल शांति पुरस्कार का हकदार था। उन्होंने पुरस्कार नहीं मिलने को शर्मनाक बताते हुए आरोप लगाया कि चयन प्रक्रिया में राजनीतिक विचारों को महत्व दिया गया और उनके प्रशासन के प्रयासों की अनदेखी की गई।

ट्रंप ने अपने समर्थकों के सामने दावा किया कि उन्होंने आठ युद्धों और अंतर्राष्ट्रीय विवादों को समाप्त कराने में मदद की है। उनके अनुसार, इन संघर्षों में शांति स्थापित करने के लिए किए गए प्रयास इतने महत्वपूर्ण थे कि प्रत्येक मामले के लिए अलग-अलग नोबेल शांति पुरस्कार दिया जा सकता था। हालाँकि,यह ट्रंप का अपना दावा है और उनके द्वारा बताए गए सभी संघर्षों के पूरी तरह समाप्त हो जाने की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।

रैली के दौरान ट्रंप ने नोबेल शांति पुरस्कार के चयन को लेकर अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर की। उन्होंने कहा कि अमेरिका को यह सम्मान मिलना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने पुरस्कार नहीं दिए जाने को एक स्थायी दाग की तरह बताया और आरोप लगाया कि नॉर्वे की नोबेल समिति ने उनके प्रशासन के कूटनीतिक प्रयासों का सही मूल्यांकन नहीं किया।

ट्रंप ने कहा कि उनके प्रशासन ने अंतर्राष्ट्रीय विवादों को सुलझाने के लिए असाधारण प्रयास किए हैं। इसके बावजूद पुरस्कार नहीं मिलने से उन्हें निराशा हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त करने वाले व्यक्ति के बारे में उन्हें अधिक जानकारी नहीं है। इस टिप्पणी के जरिए उन्होंने पुरस्कार चयन के आधार पर सवाल उठाए।

हालाँकि, नोबेल शांति पुरस्कार किसी व्यक्ति की ओर से किए गए दावों या किसी सरकार की अपनी उपलब्धियों के आकलन के आधार पर नहीं दिया जाता। पुरस्कार का निर्णय स्वतंत्र समिति करती है,जो शांति स्थापना और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग में योगदान जैसे पहलुओं पर विचार करती है। किसी संघर्ष में मध्यस्थता करने का प्रयास और उस संघर्ष का स्थायी समाधान हो जाना भी अलग-अलग बातें हैं।

ट्रंप ने अपनी टिप्पणी में इस अंतर पर विस्तार से बात नहीं की। उन्होंने मुख्य रूप से अपने प्रशासन की कूटनीतिक गतिविधियों और उनके अनुसार हासिल की गई उपलब्धियों को पुरस्कार के लिए पर्याप्त आधार बताया।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कई अंतर्राष्ट्रीय विवादों का उल्लेख किया,जिनमें उनके अनुसार प्रशासन ने शांति स्थापित करने या समझौते की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनमें कोसोवो और सर्बिया,कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और रवांडा, आर्मेनिया और अजरबैजान, मिस्र और इथियोपिया तथा इजरायल और हमास के बीच संघर्ष शामिल हैं।

ट्रंप ने दक्षिण एशिया से जुड़े विवादों का भी जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि उनके प्रशासन ने विभिन्न क्षेत्रों में तनाव कम करने और पक्षों को समझौते की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए काम किया है। हालाँकि, अलग-अलग विवादों की परिस्थितियाँ,उनके कारण और समाधान की स्थिति एक जैसी नहीं हैं। इसलिए इन सभी मामलों को पूरी तरह समाप्त हुए युद्धों के रूप में प्रस्तुत करने के दावे का स्वतंत्र आकलन आवश्यक है।

अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों में मध्यस्थता के परिणाम अक्सर कई पक्षों की भागीदारी, क्षेत्रीय परिस्थितियों और लंबे समय से चल रही कूटनीतिक कोशिशों पर निर्भर करते हैं। किसी समझौते तक पहुँचने में बाहरी देशों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है,लेकिन उसके स्थायी होने के लिए संबंधित पक्षों की सहमति और समझौते का पालन भी जरूरी होता है।

ट्रंप ने अपने संबोधन में इन जटिलताओं के बजाय अपने प्रशासन की भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिका की ओर से किए गए प्रयासों को उचित सम्मान नहीं मिला, जबकि उनके अनुसार इनसे कई क्षेत्रों में शांति की संभावनाएँ मजबूत हुईं।

ट्रंप ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और मध्य पूर्व में जारी तनाव को लेकर भी बयान दिया। उन्होंने दावा किया कि उनके प्रयासों ने ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने और क्षेत्र में बड़े युद्ध की आशंका को टालने में मदद की। उन्होंने कहा कि उनका प्रशासन अब भी ईरान से जुड़े तनाव को समाप्त करने की दिशा में काम कर रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने तेहरान को एक बार फिर चेतावनी देते हुए कहा कि ईरान को अमेरिका की शर्तें माननी होंगी,अन्यथा उसे आगे और परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। इस बयान से स्पष्ट है कि ईरान के साथ कूटनीतिक समाधान की बात करने के साथ-साथ ट्रंप प्रशासन दबाव की नीति पर भी जोर दे रहा है।

हालाँकि,ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे लंबे समय से अंतर्राष्ट्रीय चिंता का विषय रहे हैं। इनका समाधान केवल एक पक्ष के प्रयासों पर निर्भर नहीं करता, बल्कि संबंधित देशों के बीच बातचीत, सुरक्षा संबंधी आश्वासनों और समझौतों के पालन से भी जुड़ा होता है।

ट्रंप ने रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उनका प्रशासन इस युद्ध को समाप्त कराने के लिए प्रयास कर रहा है। रूस-यूक्रेन संघर्ष को लेकर अमेरिका की भूमिका अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में महत्वपूर्ण रही है,लेकिन युद्ध समाप्त करने के लिए दोनों देशों के बीच स्वीकार्य समझौते तक पहुँचना बड़ी चुनौती बना हुआ है।

अपने भाषण में ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र की भी आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन संघर्षों को सुलझाने में अपने प्रशासन की भूमिका का वह दावा करते हैं,उनमें संयुक्त राष्ट्र ने कोई उल्लेखनीय योगदान नहीं दिया।

ट्रंप ने कहा कि शांति स्थापित करने के लिए अमेरिका ने जो प्रयास किए,उन्हें अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की ओर से पर्याप्त समर्थन या मान्यता नहीं मिली। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि उनके प्रशासन की उपलब्धियों का श्रेय केवल किसी एक व्यक्ति को देने के बजाय अमेरिका को मिलना चाहिए था।

हालाँकि,संयुक्त राष्ट्र की भूमिका का आकलन करते समय उसके विभिन्न प्रयासों को ध्यान में रखना जरूरी है। संगठन अंतर्राष्ट्रीय विवादों में बातचीत,मध्यस्थता, शांति अभियानों और मानवीय सहायता जैसे कई माध्यमों से काम करता है। किसी विशेष संघर्ष में उसकी भूमिका कितनी प्रभावी रही,यह उस मामले की परिस्थितियों और संबंधित पक्षों के सहयोग पर निर्भर करता है।

ट्रंप की टिप्पणी संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं को लेकर उनके पहले के आलोचनात्मक रुख के अनुरूप है। वह कई मौकों पर अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की कार्यप्रणाली और उनके परिणामों पर सवाल उठाते रहे हैं।

ट्रंप की यह टिप्पणी तीन नवंबर को होने वाले अमेरिकी संसदीय चुनावों से पहले आयोजित रिपब्लिकन चुनावी रैली के दौरान आई। इस कार्यक्रम में उन्होंने अपनी सरकार की आर्थिक,आव्रजन और राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों का भी बचाव किया। रैली का उद्देश्य रिपब्लिकन उम्मीदवारों के समर्थन में माहौल तैयार करना था।

ऐसे राजनीतिक कार्यक्रमों में नेता अक्सर अपनी सरकार की उपलब्धियों को सामने रखते हैं और विरोधियों या संस्थाओं के फैसलों की आलोचना करते हैं। ट्रंप ने भी नोबेल शांति पुरस्कार का मुद्दा उठाकर अपनी कूटनीतिक उपलब्धियों को रेखांकित किया और अमेरिका की अंतर्राष्ट्रीय भूमिका पर जोर दिया।

उन्होंने पुरस्कार को व्यक्तिगत सम्मान के बजाय अमेरिका की उपलब्धियों से जोड़ते हुए कहा कि शांति स्थापना के लिए किए गए प्रयास अमेरिकी जनता की ओर से किए गए थे। उनके अनुसार,इसलिए इस सम्मान का वास्तविक हकदार अमेरिका होना चाहिए था।

नोबेल शांति पुरस्कार नॉर्वे की संसद द्वारा नियुक्त पाँच सदस्यीय स्वतंत्र नोबेल समिति प्रदान करती है। यह सम्मान उन व्यक्तियों और संगठनों को दिया जाता है,जिन्होंने शांति स्थापना,अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और संघर्षों के समाधान में महत्वपूर्ण योगदान दिया हो।

पुरस्कार के लिए किसी व्यक्ति या सरकार का स्वयं को योग्य बताना निर्णायक नहीं होता। समिति अपने निर्धारित मानदंडों के आधार पर उम्मीदवारों के योगदान का मूल्यांकन करती है और फिर विजेता का चयन करती है। किसी विवाद में मध्यस्थता करना,युद्धविराम हासिल करना और लंबे समय तक टिकने वाला शांति समझौता सुनिश्चित करना योगदान के अलग-अलग स्तर हैं।

ट्रंप ने अपने संबोधन में अपने प्रशासन के प्रयासों को पुरस्कार के योग्य बताया,लेकिन समिति के फैसले को बदलने का कोई आधार प्रस्तुत नहीं किया। उनकी आलोचना के बावजूद पुरस्कार चयन समिति का निर्णय उसकी स्वतंत्र प्रक्रिया के तहत आता है।

कुल मिलाकर,नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलने पर ट्रंप की नाराजगी ने एक बार फिर उनकी कूटनीतिक नीतियों और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ उनके संबंधों को चर्चा में ला दिया है। उन्होंने आठ संघर्षों को समाप्त कराने में भूमिका निभाने का दावा करते हुए अमेरिका को पुरस्कार का हकदार बताया है। वहीं,उनके दावों और विभिन्न संघर्षों की वास्तविक स्थिति का आकलन अलग-अलग तथ्यों के आधार पर किया जाना जरूरी है। फिलहाल,ट्रंप ने पुरस्कार समिति के फैसले पर सवाल उठाए हैं,जबकि नोबेल शांति पुरस्कार का चयन स्वतंत्र समिति की प्रक्रिया के तहत किया जाता है।