तेहरान,5 मई (युआईटीवी)- होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसे वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही बहाल करने के लिए अमेरिका द्वारा शुरू किए गए ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नई बहस छिड़ गई है। एक ओर जहाँ अमेरिका इस मिशन को मानवीय और व्यापारिक जरूरतों से जोड़कर देख रहा है,वहीं ईरान ने इसे क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ाने वाला कदम बताया है। ईरान के विदेश मंत्री सैय्यद अब्बास अराघची ने इस पहल की तीखी आलोचना करते हुए इसे “प्रोजेक्ट डेडलॉक” करार दिया है।
ईरानी विदेश मंत्री ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि हाल के घटनाक्रम यह स्पष्ट करते हैं कि किसी भी राजनीतिक संकट का समाधान सैन्य कार्रवाई से नहीं हो सकता। उन्होंने अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात दोनों को चेतावनी देते हुए कहा कि इस तरह के कदम स्थिति को सुलझाने के बजाय और जटिल बना सकते हैं। उनका कहना था कि क्षेत्र में बातचीत की प्रक्रिया धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है,जिसमें पाकिस्तान जैसे देशों की भूमिका सकारात्मक रही है,ऐसे में सैन्य हस्तक्षेप इस प्रक्रिया को नुकसान पहुँचा सकता है।
सैयद अब्बास अराघची ने यह भी कहा कि अमेरिका को सावधान रहना चाहिए कि वह ऐसे हालात में न फँस जाए,जहाँ से बाहर निकलना मुश्किल हो जाए। उन्होंने संकेत दिया कि पिछले अनुभव बताते हैं कि मध्य पूर्व में सैन्य दखल कई बार लंबे और जटिल संघर्षों का कारण बन चुका है। इसी संदर्भ में उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात को भी संयम बरतने की सलाह दी और कहा कि क्षेत्रीय शांति के लिए कूटनीतिक रास्ते ही सबसे बेहतर विकल्प हैं।
दूसरी ओर,अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पूरे घटनाक्रम पर संतुलित लेकिन सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने यह स्पष्ट करने से इनकार कर दिया कि ईरान के साथ हुआ युद्धविराम आगे भी जारी रहेगा या नहीं। एक साक्षात्कार के दौरान जब उनसे पूछा गया कि क्या संघर्ष फिर से शुरू हो सकता है,तो उन्होंने कहा कि वह इस बारे में कोई निश्चित जानकारी साझा नहीं कर सकते। उनके इस बयान ने क्षेत्रीय अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है।
हालाँकि, एक अन्य बातचीत में डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि उसने होर्मुज जलडमरूमध्य या फारस की खाड़ी में अमेरिकी जहाजों को निशाना बनाने की कोशिश की,तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। उन्होंने यहाँ तक कहा कि अमेरिकी सेना किसी भी खतरे का जवाब देने में सक्षम है और वह अपने हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि सैन्य दृष्टि से ईरान के साथ संघर्ष लगभग समाप्त हो चुका है,जो एक तरह से तनाव कम करने का संकेत भी माना जा रहा है।
इस बीच,वैश्विक व्यापार और शिपिंग उद्योग के लिए एक राहत भरी खबर भी सामने आई है। डेनमार्क की प्रमुख शिपिंग कंपनी मेर्सक ने पुष्टि की है कि उसका एक जहाज अमेरिकी सैन्य सुरक्षा के साथ सुरक्षित रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य पार कर चुका है। कंपनी के अनुसार,यह जहाज ‘अलायंस फेयरफैक्स’ फरवरी में संघर्ष शुरू होने के बाद से फारस की खाड़ी में फँसा हुआ था और बाहर निकलने में असमर्थ था।
कंपनी ने अपने बयान में बताया कि हाल ही में अमेरिकी सेना ने उनसे संपर्क किया और सुरक्षा प्रदान करने की पेशकश की,जिसके बाद यह जहाज सुरक्षित रूप से खाड़ी से बाहर निकल सका। मेर्सक ने इस ऑपरेशन के लिए अमेरिकी सेना के पेशेवर रवैये और सहयोग की सराहना की है। कंपनी ने उम्मीद जताई है कि अब यह जहाज जल्द ही अपनी सामान्य व्यावसायिक सेवाओं में लौट सकेगा।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है,जब होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर वैश्विक चिंता बढ़ी हुई है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक रास्तों में से एक है, जहाँ से तेल और अन्य ऊर्जा संसाधनों का बड़ा हिस्सा गुजरता है। ऐसे में यहाँ किसी भी प्रकार का तनाव न केवल क्षेत्रीय,बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ जहाँ एक ओर फँसे जहाजों को राहत देने का प्रयास है,वहीं दूसरी ओर यह एक रणनीतिक कदम भी हो सकता है,जिसके जरिए अमेरिका इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में अपनी मौजूदगी और प्रभाव बनाए रखना चाहता है। हालाँकि,ईरान की प्रतिक्रिया से यह साफ है कि इस पहल को लेकर सहमति नहीं बन पाई है और आने वाले दिनों में यह मुद्दा और संवेदनशील हो सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सैन्य ताकत के जरिए जटिल राजनीतिक समस्याओं का समाधान संभव है। ईरान का स्पष्ट रुख है कि बातचीत और कूटनीति ही स्थायी समाधान का रास्ता है,जबकि अमेरिका अपनी रणनीतिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अलग दिशा में कदम उठा रहा है।
फिलहाल,दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या दोनों पक्ष तनाव कम करने के लिए कोई साझा रास्ता निकाल पाते हैं या फिर यह विवाद और गहराता है। यदि स्थिति बिगड़ती है,तो इसका असर न केवल मध्य पूर्व,बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह संतुलन बनाए रखते हुए शांति और स्थिरता की दिशा में सक्रिय भूमिका निभाए।
