हूती हमलों के बीच रियाद एयरपोर्ट 17 अक्टूबर तक बंद,सऊदी अरब के एयर डिफेंस सिस्टम की जाँच शुरू (तस्वीर क्रेडिट@RdyTwitte1)

हूती हमलों के बीच रियाद एयरपोर्ट 17 अक्टूबर तक बंद,सऊदी अरब के एयर डिफेंस सिस्टम की जाँच शुरू

नई दिल्ली,13 अक्टूबर (युआईटीवी)- यमन के हूती विद्रोहियों की ओर से लगातार किए जा रहे मिसाइल और ड्रोन हमलों के बीच सऊदी अरब की राजधानी रियाद स्थित किंग खालिद अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे को 17 अक्टूबर तक बंद रखने का फैसला किया गया है। इस कदम से सऊदी अरब की हवाई सेवाओं पर असर पड़ने की आशंका है। हवाई अड्डे के बंद रहने के कारण कई उड़ानों के समय में बदलाव करना पड़ सकता है,जबकि कुछ उड़ानें रद्द भी हो सकती हैं। इस घटनाक्रम ने देश की हवाई सुरक्षा व्यवस्था और मिसाइलों तथा ड्रोन को रोकने के लिए तैनात रक्षा प्रणालियों की क्षमता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार,सोमवार को जारी उड़ान संबंधी नोटिस में हवाई अड्डे को 17 अक्टूबर की रात नौ बजे तक बंद रखने का उल्लेख किया गया। नोटिस में एयरलाइंस को अपने उड़ान कार्यक्रम में संभावित बदलावों के लिए तैयार रहने का संकेत दिया गया है। हालाँकि,हवाई अड्डे को बंद रखने की अवधि और संचालन दोबारा शुरू होने की स्थिति सुरक्षा संबंधी समीक्षा तथा संबंधित अधिकारियों के फैसलों पर निर्भर करेगी।

सऊदी अरब के नागरिक उड्डयन प्राधिकरण के अनुसार,इस कदम का उद्देश्य हवाई अड्डे की सुविधाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना और संचालन से जुड़ी तैयारियों की समीक्षा करना है। किंग खालिद अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा देश के प्रमुख विमानन केंद्रों में शामिल है। जेद्दा के हवाई अड्डे के बाद इसे सऊदी अरब के सबसे व्यस्त हवाई अड्डों में गिना जाता है। यहाँ लंबे समय तक उड़ानों का संचालन प्रभावित रहने से यात्रियों,एयरलाइंस और अंतर्राष्ट्रीय हवाई संपर्क पर असर पड़ सकता है।

रियाद की ओर मिसाइलों और ड्रोन के इस्तेमाल की खबरों के बाद सऊदी अरब ने अपनी हवाई रक्षा प्रणाली की कार्यप्रणाली की जाँच शुरू कर दी है। जाँच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि हूती विद्रोहियों की ओर से दागे गए हथियारों का पता लगाने और उन्हें बीच रास्ते में रोकने की प्रक्रिया में कोई कमजोरी तो नहीं रही।

दो क्षेत्रीय अधिकारियों के हवाले से सामने आई शुरुआती जानकारी के मुताबिक,हूती विद्रोहियों ने रियाद के किंग खालिद अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे की दिशा में क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइलें दागने से पहले कई ड्रोन तैनात किए थे। जाँच में इस बात पर भी ध्यान दिया जा रहा है कि इन ड्रोन की भूमिका क्या थी और क्या उनके इस्तेमाल से सऊदी अरब की रक्षा प्रणालियों के लिए खतरा बढ़ा।

अधिकारियों के मुताबिक,कुछ मिसाइलों और अन्य प्रक्षेपास्त्रों ने सऊदी राजधानी तक पहुँचने के लिए एक हजार किलोमीटर से अधिक की दूरी तय की। ऐसे में जाँचकर्ता यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि लंबी दूरी से आने वाले हथियारों की पहचान समय रहते क्यों नहीं हो सकी और उन्हें रोकने के लिए कौन-से कदम उठाए गए।

हालाँकि,जाँच के शुरुआती निष्कर्षों को अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। अभी यह स्पष्ट होना बाकी है कि किसी संभावित सुरक्षा चूक,हथियारों की तकनीकी विशेषताओं, निगरानी व्यवस्था या अन्य कारणों ने हमलों को रोकने की क्षमता को किस हद तक प्रभावित किया।

हूती विद्रोहियों के पास बैलिस्टिक मिसाइलों के अलावा ऐसे हथियार भी होने की जानकारी है,जो उड़ान के दौरान अपना रास्ता बदल सकते हैं। इन हथियारों की दिशा और उड़ान संबंधी विशेषताओं के कारण उन्हें समय रहते पहचानना और रोकना हवाई रक्षा प्रणालियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

बैलिस्टिक मिसाइलें आम तौर पर तेज गति से लंबी दूरी तय करती हैं,जबकि क्रूज मिसाइलें अपेक्षाकृत कम ऊँचाई पर उड़ते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ सकती हैं। कम ऊँचाई पर उड़ने वाले हथियारों का पता लगाने में भूभाग,रडार की स्थिति और निगरानी व्यवस्था की क्षमता जैसे कारक महत्वपूर्ण होते हैं। यदि एक साथ कई दिशाओं से ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल किया जाए,तो रक्षा प्रणाली पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

सऊदी अरब अपनी हवाई सुरक्षा के लिए अमेरिकी पैट्रियट मिसाइल प्रणाली सहित कई रक्षा प्रणालियों का इस्तेमाल करता है। इन प्रणालियों का उद्देश्य आने वाली मिसाइलों और अन्य हवाई खतरों की पहचान करना तथा जरूरत पड़ने पर उन्हें रोकना है। इसके बावजूद, किसी भी रक्षा प्रणाली की प्रभावशीलता हथियारों के प्रकार,हमले की संख्या,चेतावनी मिलने के समय और उपलब्ध संसाधनों पर निर्भर करती है।

इसी वजह से मौजूदा जाँच में केवल मिसाइलों को रोकने की क्षमता ही नहीं,बल्कि निगरानी,चेतावनी और अलग-अलग रक्षा प्रणालियों के बीच समन्वय जैसे पहलुओं की भी समीक्षा की जा सकती है। जाँच से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि भविष्य में इस तरह के हमलों के जोखिम को कम करने के लिए किन क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता है।

यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ अभियान के बीच सऊदी अरब अमेरिका से अधिक प्रत्यक्ष सैन्य सहयोग की अपेक्षा कर रहा है। अब तक अमेरिका सऊदी नेतृत्व वाले अभियान को खुफिया जानकारी,संभावित ठिकानों की पहचान और सैन्य रणनीति तैयार करने में सहायता देता रहा है। हालाँकि,हूती ठिकानों पर सीधे हमले करने के मामले में उसकी भूमिका सीमित रही है।

यदि अमेरिका अपनी सैन्य भागीदारी बढ़ाता है,तो यमन और आसपास के समुद्री क्षेत्रों में तनाव और बढ़ सकता है। हूती विद्रोहियों की गतिविधियों का प्रभाव पहले ही क्षेत्रीय सुरक्षा और व्यापारिक जहाजों की आवाजाही पर पड़ता रहा है। ऐसे में किसी नए सैन्य अभियान का असर केवल सऊदी अरब और यमन तक सीमित नहीं रह सकता।

सऊदी अरब के लिए हूती हमलों को रोकना महत्वपूर्ण है,क्योंकि राजधानी और प्रमुख बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा देश की आंतरिक स्थिरता तथा आर्थिक गतिविधियों से जुड़ी हुई है। दूसरी ओर,अमेरिका के लिए किसी प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई का फैसला क्षेत्रीय संघर्ष के विस्तार,अपने सैन्य संसाधनों के इस्तेमाल और समुद्री व्यापार की सुरक्षा जैसे सवालों से जुड़ा होगा।

इस स्थिति में दोनों देशों के बीच सहयोग की प्रकृति और उसका दायरा आने वाले घटनाक्रम को प्रभावित कर सकता है। हालाँकि,अमेरिका की ओर से प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई बढ़ाने को लेकर किसी निश्चित निर्णय की पुष्टि के बिना इसे संभावित स्थिति के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

यमन के निकट स्थित बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य अंतर्राष्ट्रीय समुद्री व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यह लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और यूरोप तथा एशिया के बीच जहाजों की आवाजाही के प्रमुख मार्गों में शामिल है। इस क्षेत्र में सुरक्षा जोखिम बढ़ने से व्यापारिक जहाजों को अपना रास्ता बदलना पड़ सकता है,जिससे यात्रा का समय और परिवहन लागत बढ़ सकती है।

यदि हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई तेज होती है या जवाबी हमले बढ़ते हैं, तो इस समुद्री मार्ग पर तनाव बढ़ने की आशंका है। जहाजों की आवाजाही बाधित होने से माल ढुलाई,बीमा लागत और वैश्विक आपूर्ति शृंखला प्रभावित हो सकती है। ऊर्जा उत्पादों की ढुलाई पर असर पड़ने की स्थिति में तेल बाजार पर भी दबाव बढ़ सकता है।

सऊदी अरब के लिए यह समुद्री मार्ग इसलिए भी महत्वपूर्ण है,क्योंकि क्षेत्र में सुरक्षा और व्यापारिक गतिविधियाँ उसकी आर्थिक रणनीति से जुड़ी हुई हैं। लंबे समय तक अस्थिरता बनी रहने पर समुद्री परिवहन कंपनियों और ऊर्जा कारोबार से जुड़े व्यवसायों को अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ सकता है।

बाब अल-मंदेब के अलावा होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल की आवाजाही को लेकर भी चिंताएँ बनी हुई हैं। यह जलमार्ग फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। संघर्ष से पहले दुनिया के समुद्री रास्तों से होने वाले तेल व्यापार का लगभग पाँचवाँ हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता था।

ईरान से जुड़े संघर्ष के कारण यहाँ जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने का खतरा बढ़ने से ऊर्जा बाजार की चिंताएँ और गहरी हो सकती हैं। यदि होर्मुज और बाब अल-मंदेब जैसे महत्वपूर्ण मार्गों पर एक ही समय में सुरक्षा जोखिम बढ़ते हैं,तो तेल तथा अन्य वस्तुओं की आपूर्ति पर व्यापक असर पड़ सकता है। हालाँकि,दोनों जलमार्ग अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में स्थित हैं और वहाँ की परिस्थितियों का आकलन अलग-अलग करना जरूरी है।

रियाद के किंग खालिद अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे को बंद रखने का फैसला ऐसे समय में आया है,जब सऊदी अरब हूती हमलों के खतरे का आकलन कर रहा है। हवाई अड्डे की सुरक्षा और संचालन की समीक्षा के साथ रक्षा प्रणाली की जाँच यह समझने के लिए महत्वपूर्ण होगी कि संभावित हमलों के खिलाफ सुरक्षा व्यवस्था को किस तरह मजबूत किया जा सकता है।

यात्रियों के लिए फिलहाल सबसे अहम बात यह है कि उड़ानों के समय और संचालन में बदलाव हो सकते हैं। ऐसे में प्रभावित यात्रियों को अपनी एयरलाइन से उड़ान की स्थिति की पुष्टि करनी चाहिए। दूसरी ओर,क्षेत्रीय स्तर पर सऊदी अरब और अमेरिका के बीच सैन्य सहयोग,यमन में हूती विद्रोहियों की गतिविधियाँ तथा लाल सागर और होर्मुज के आसपास की परिस्थितियाँ आने वाले दिनों में महत्वपूर्ण रहेंगी।

जाँच के नतीजों से यह स्पष्ट हो सकेगा कि सऊदी अरब की हवाई रक्षा प्रणाली में किस तरह के सुधार की जरूरत है। फिलहाल, हमलों की प्रकृति, हवाई अड्डे के बंद रहने की अवधि और क्षेत्रीय सैन्य गतिविधियों को लेकर स्थिति पर नजर बनी हुई है।