नोएल टाटा (तस्वीर क्रेडिट@JaikyYadav16)

टाटा संस की लिस्टिंग पर नोएल टाटा की चिंता,बोले- निवेशकों की उम्मीदों और परोपकारी उद्देश्यों में हो सकता है टकराव

मुंबई,30 सितंबर (युआईटीवी)- टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने टाटा संस की संभावित शेयर बाजार लिस्टिंग को लेकर अपनी चिंता जाहिर की है। उन्होंने कहा कि टाटा संस के सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध होने के बाद निवेशकों की मुनाफे और रिटर्न से जुड़ी अपेक्षाएं टाटा ट्रस्ट्स के लंबे समय से चले आ रहे परोपकारी उद्देश्यों के साथ टकरा सकती हैं। नोएल टाटा ने टाटा संस के बोर्ड से कंपनी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने से बचाने के लिए प्रस्तावित पुनर्गठन योजना पर दोबारा विचार करने की अपील भी की है।

मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए नोएल टाटा ने कहा कि उन्हें अब भी उम्मीद है कि भारतीय रिजर्व बैंक टाटा संस की नियामकीय स्थिति को लेकर अपने रुख पर पुनर्विचार करेगा। उनका कहना है कि टाटा संस को सार्वजनिक कंपनी बनाने के बजाय ऐसा रास्ता तलाशा जा सकता है,जिससे कंपनी अपने मौजूदा स्वरूप में निजी बनी रहे और साथ ही नियामकीय आवश्यकताओं का पालन भी हो सके। टाटा ट्रस्ट्स की ओर से इसी दिशा में एक रणनीतिक पुनर्गठन का प्रस्ताव सामने रखा गया है।

टाटा संस टाटा समूह की प्रमुख होल्डिंग कंपनी है और इसमें टाटा ट्रस्ट्स की करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। प्रस्तावित पुनर्गठन के तहत टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स सॉल्यूशंस और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स का टाटा संस में विलय करने की योजना रखी गई है। इसका उद्देश्य टाटा संस के कारोबार में पर्याप्त परिचालन गतिविधियाँ और राजस्व जोड़ना है, ताकि कंपनी की नियामकीय श्रेणी बदल सके और उसे शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने की आवश्यकता से बाहर निकलने का रास्ता मिल सके। यह प्रस्ताव अभी संबंधित मंजूरियों की प्रक्रिया से गुजरना है।

नोएल टाटा के मुताबिक,टाटा समूह ने लंबे समय तक एक ऐसे मॉडल के तहत काम किया है,जिसमें होल्डिंग कंपनी का उद्देश्य केवल तिमाही मुनाफे को अधिकतम करना नहीं रहा है। समूह की कंपनियों को मुश्किल परिस्थितियों में सहयोग देना और लंबे समय के रणनीतिक निवेश को जारी रखना भी इस मॉडल का हिस्सा रहा है। उनका तर्क है कि अगर टाटा संस शेयर बाजार में सूचीबद्ध होती है तो बाहरी निवेशकों की मौजूदगी के कारण कंपनी के फैसलों पर बाजार की अपेक्षाओं का प्रभाव बढ़ सकता है।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या सार्वजनिक शेयरधारक उन निवेशों और फैसलों का उसी तरह समर्थन करेंगे,जिन्हें टाटा समूह ने ऐतिहासिक रूप से अपने व्यापक कारोबारी ढांचे के हित में किया है। उनके मुताबिक,सूचीबद्ध कंपनी के तौर पर टाटा संस को निवेशकों के हितों,बाजार की अपेक्षाओं और समूह की दीर्घकालिक रणनीति के बीच संतुलन बनाना होगा। यही वह बिंदु है जहाँ टाटा ट्रस्ट्स के परोपकारी उद्देश्यों और सार्वजनिक शेयरधारकों की व्यावसायिक अपेक्षाओं के बीच संभावित टकराव पैदा हो सकता है।

टाटा संस की लिस्टिंग का मुद्दा भारतीय रिजर्व बैंक के नियामकीय ढाँचे से जुड़ा हुआ है। सितंबर 2022 में आरबीआई ने टाटा संस को अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी की श्रेणी में शामिल किया था। इस श्रेणी में आने वाली कंपनियों के लिए नियामकीय अनुपालन की कई सख्त आवश्यकताएँ हैं,जिनमें निर्धारित समयसीमा के भीतर शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना भी शामिल है। टाटा संस ने इसके बाद अपनी देनदारियों को कम किया और निजी कंपनी के रूप में बने रहने के उद्देश्य से अपनी नियामकीय स्थिति बदलने का रास्ता तलाशा।

कंपनी ने 2024 में कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी का दर्जा छोड़ने और निजी कंपनी बने रहने के लिए आवेदन किया था। हालाँकि,सितंबर 2026 में आरबीआई ने इस आवेदन को खारिज कर दिया और टाटा संस से लागू नियमों का पालन करने को कहा। इसके बाद कंपनी के बोर्ड ने शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला किया।

इसी बीच टाटा ट्रस्ट्स ने टाटा संस के भविष्य के ढाँचे को लेकर वैकल्पिक योजना सामने रखी। ट्रस्ट्स का कहना है कि दो परिचालन कंपनियों के विलय से टाटा संस के पास पर्याप्त कारोबारी गतिविधियाँ और अपने राजस्व स्रोत होंगे। इससे कंपनी की प्रकृति एक ऐसी परिचालन इकाई की ओर बदल सकती है,जो केवल निवेश रखने वाली होल्डिंग कंपनी न रहकर खुद भी बड़े पैमाने पर कारोबार करती हो। प्रस्ताव का उद्देश्य टाटा संस को आरबीआई के एनबीएफसी और कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी से जुड़े नियामकीय दायरे से बाहर लाने की संभावना तलाशना है।

नोएल टाटा ने टाटा संस के बोर्ड से इस प्रस्ताव की समीक्षा करने और जरूरत पड़ने पर इसमें बदलाव कर आरबीआई के साथ चर्चा करने का आग्रह किया है। उनका कहना है कि समाधान ऐसा होना चाहिए,जो नियामकीय जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ टाटा समूह की ऐतिहासिक कार्यप्रणाली को भी बनाए रख सके। हालाँकि,इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए बोर्ड और नियामकीय स्तर पर मंजूरी की जरूरत होगी।

टाटा संस की लिस्टिंग को लेकर चल रही बहस के बीच कंपनी के बोर्ड में नेतृत्व को लेकर भी मतभेद सामने आए हैं। 17 सितंबर को टाटा संस के बोर्ड ने एन. चंद्रशेखरन को चेयरमैन के तौर पर पाँच साल का एक और कार्यकाल देने को मंजूरी दी थी। बोर्ड ने साथ ही कंपनी की शेयर बाजार लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला किया। इस निर्णय पर नोएल टाटा ने आपत्ति जताई और वह चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के खिलाफ मतदान करने वाले अकेले बोर्ड सदस्य थे।

नोएल टाटा ने बाद में इस पुनर्नियुक्ति प्रक्रिया की वैधता पर भी सवाल उठाया। टाटा ट्रस्ट्स ने तर्क दिया कि बोर्ड के फैसले के लिए ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों की आवश्यक सहमति नहीं मिली थी। हालाँकि,टाटा संस ने इस आपत्ति को स्वीकार नहीं किया और बाद में कंपनी की ओर से चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को वैध ठहराने वाले कानूनी मत भी सामने आए। इस तरह टाटा संस की लिस्टिंग और नेतृत्व का मुद्दा अब कंपनी के कारोबारी ढाँचे के साथ-साथ उसके कॉरपोरेट गवर्नेंस से भी जुड़ गया है।

नोएल टाटा ने टाटा ट्रस्ट्स के परोपकारी कामकाज की प्राथमिकताओं पर भी बात की। उन्होंने शिक्षा,स्वास्थ्य सेवा और रोजगार को प्रमुख क्षेत्र बताते हुए कहा कि समाज की जरूरतों और उद्योग की आवश्यकताओं के बीच मौजूद अंतर को कम करना जरूरी है। विशेष रूप से उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने उद्योग की बदलती जरूरतों के अनुरूप युवाओं को तैयार करने पर जोर दिया।

इस पूरे विवाद के केंद्र में टाटा संस की भविष्य की संरचना का सवाल है। एक तरफ कंपनी के सामने आरबीआई के नियमों का पालन करने की चुनौती है,वहीं दूसरी तरफ टाटा ट्रस्ट्स कंपनी को निजी बनाए रखते हुए समूह की पारंपरिक कार्यप्रणाली और परोपकारी गतिविधियों के साथ संतुलन बनाए रखना चाहता है। प्रस्तावित पुनर्गठन इसी अंतर को पाटने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। अब इस योजना पर टाटा संस के बोर्ड और आरबीआई का रुख आगे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होगा।