मुंबई,29 सितंबर (युआईटीवी)- टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड की संरचना में बड़े बदलाव की तैयारी चल रही है। टाटा ट्रस्ट्स, जिसके पास टाटा संस में करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है, ने कंपनी के रणनीतिक पुनर्गठन का प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव के तहत टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स का टाटा संस में विलय करने की योजना है। टाटा ट्रस्ट्स के मुताबिक, इस पुनर्गठन का उद्देश्य टाटा संस को भारतीय रिजर्व बैंक के गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी और कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी से जुड़े नियामकीय ढाँचे से बाहर लाना है। इस ढांचे के तहत कंपनी के लिए शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना जरूरी हो सकता है।
टाटा ट्रस्ट्स ने सोमवार को जारी बयान में कहा कि प्रस्तावित पुनर्गठन को केवल मौजूदा नियामकीय चुनौती से निपटने के उपाय के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। ट्रस्ट्स का कहना है कि टाटा संस के इतिहास में ऐसी संरचना पहले भी रही है,जिसमें कंपनी केवल निवेश और होल्डिंग कंपनी की भूमिका तक सीमित नहीं थी,बल्कि उसके अपने परिचालन कारोबार और उनसे होने वाली आय भी थी। ट्रस्ट्स के अनुसार, करीब 100 साल के इतिहास में लगभग 80 वर्षों तक टाटा संस के पास अपने परिचालन व्यवसाय रहे हैं और इन्हीं कारोबारों से मिलने वाली आय का इस्तेमाल समूह के नए तथा उभरते क्षेत्रों में निवेश के लिए किया जाता रहा है।
टाटा ट्रस्ट्स ने अपने बयान में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज का उदाहरण देते हुए कहा कि वर्ष 2004 तक यह टाटा संस का एक व्यावसायिक डिवीजन था। बाद में इसे अलग करके एक स्वतंत्र सहायक कंपनी के रूप में स्थापित किया गया। इसी तरह टाटा समूह के कई अन्य परिचालन कारोबार भी अलग-अलग समय में टाटा संस का हिस्सा रहे हैं। प्रस्तावित पुनर्गठन के बाद कंपनी फिर उस पुराने मॉडल की ओर लौट सकती है,जिसमें टाटा संस केवल समूह की होल्डिंग कंपनी नहीं होगी,बल्कि उसके पास अपना परिचालन कारोबार और उससे होने वाला राजस्व भी होगा।
इस प्रस्ताव के पीछे सबसे महत्वपूर्ण पहलू भारतीय रिजर्व बैंक का नियामकीय ढाँचा है। टाटा संस वर्तमान में कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के रूप में पंजीकृत है। ऐसी कंपनियों के लिए रिजर्व बैंक के नियमों के तहत कई शर्तें लागू होती हैं। यदि कोई कंपनी निर्धारित मानकों के तहत गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी या कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के दायरे में आती है,तो उसके लिए संबंधित नियामकीय प्रावधानों का पालन करना जरूरी होता है। टाटा ट्रस्ट्स का प्रस्ताव इसी स्थिति को बदलने की कोशिश के रूप में सामने आया है।
टाटा ट्रस्ट्स के अनुसार,टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स सॉल्यूशंस और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स के टाटा संस में विलय के बाद कंपनी की आय और परिसंपत्तियों की संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव आएगा। 31 मार्च 2026 की स्थिति के आधार पर दोनों कारोबारों को शामिल करने वाली संयुक्त इकाई का परिचालन राजस्व करीब 1,05,043 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। इसके मुकाबले वित्तीय परिसंपत्तियों से होने वाली आय लगभग 40,072 करोड़ रुपये होगी। इसका अर्थ है कि कुल आय में परिचालन गतिविधियों से आने वाले राजस्व की हिस्सेदारी करीब 64.3 प्रतिशत होगी।
टाटा ट्रस्ट्स का तर्क है कि इस संरचना के कारण टाटा संस गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी के लिए निर्धारित प्रमुख व्यवसाय मानदंड को पूरा नहीं करेगी। इन मानदंडों के तहत यह देखा जाता है कि किसी कंपनी की गतिविधियों में वित्तीय कारोबार का कितना महत्व है। यदि किसी कंपनी की मुख्य गतिविधि वित्तीय परिसंपत्तियों से जुड़ी नहीं रहती और उसके परिचालन कारोबार से पर्याप्त आय आती है,तो उसकी नियामकीय स्थिति अलग हो सकती है। प्रस्तावित विलय के बाद टाटा संस की आय संरचना इसी दिशा में बदलने का दावा किया गया है।
कंपनी की परिसंपत्तियों को लेकर भी टाटा ट्रस्ट्स ने अपने प्रस्ताव में आँकड़े पेश किए हैं। ट्रस्ट्स के अनुसार, विलय के बाद संयुक्त इकाई की कुल शुद्ध परिसंपत्तियां लगभग 2,00,158 करोड़ रुपये होंगी। वहीं समूह की कंपनियों में निवेश का मूल्य करीब 1,77,120 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। यह राशि कुल शुद्ध परिसंपत्तियों के 90 प्रतिशत से कम होगी। ट्रस्ट्स का कहना है कि इस अनुपात के कारण कंपनी कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी की निर्धारित परिभाषा के दायरे में भी नहीं आएगी।
कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के नियमों में निवेश की संरचना का महत्वपूर्ण स्थान है। ऐसी कंपनियों की पहचान मुख्य रूप से समूह की कंपनियों में निवेश रखने वाली संस्थाओं के रूप में होती है। इसलिए यह देखा जाता है कि उनकी कुल परिसंपत्तियों में समूह कंपनियों में किए गए निवेश का अनुपात कितना है। टाटा ट्रस्ट्स द्वारा दिए गए आँकडों के अनुसार, प्रस्तावित पुनर्गठन के बाद यह अनुपात निर्धारित सीमा से नीचे आ जाएगा। इस आधार पर ट्रस्ट्स का मानना है कि टाटा संस को कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के रूप में बनाए रखने की आवश्यकता नहीं रहेगी।
हालाँकि,प्रस्तावित पुनर्गठन को लागू करने के लिए केवल टाटा समूह के भीतर मंजूरी पर्याप्त नहीं होगी। टाटा ट्रस्ट्स के अनुसार,टाटा संस और गैर-वित्तीय परिचालन कंपनियों के बीच इस तरह के विलय को भारतीय रिजर्व बैंक के गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां—स्वैच्छिक विलय निर्देश,2025 के तहत पूरा करना होगा। इसके लिए रिजर्व बैंक से पहले अनुमति या अनापत्ति प्रमाणपत्र लेना आवश्यक होगा। यानी योजना के क्रियान्वयन से पहले नियामकीय प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
पुनर्गठन पूरा होने के बाद टाटा संस को कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के तौर पर मिला पंजीकरण भी वापस करना होगा। इसका मतलब यह होगा कि कंपनी की मौजूदा नियामकीय पहचान में औपचारिक बदलाव आएगा। हालाँकि,अंतिम रूप से कंपनी की स्थिति क्या होगी, यह प्रस्तावित विलय, नियामकीय मंजूरी और संबंधित प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
टाटा ट्रस्ट्स ने कहा है कि यह प्रस्ताव टाटा समूह और उसके सभी हितधारकों के व्यापक हित को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। ट्रस्ट्स के मुताबिक, योजना नियामकीय रूप से वैध और अनुपालन योग्य है। इसी उद्देश्य से ट्रस्ट्स ने टाटा संस के बोर्ड को पत्र भेजकर प्रस्ताव पर विचार करने और आवश्यक मंजूरी की प्रक्रिया शुरू करने का अनुरोध किया है। अब प्रस्ताव को आगे बढ़ाने में टाटा संस के बोर्ड की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस इस प्रस्तावित पुनर्गठन के विभिन्न पहलुओं पर भारतीय रिजर्व बैंक के साथ चर्चा भी करेंगे। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रस्ताव नियामकीय आवश्यकताओं के अनुरूप हो और विलय की प्रक्रिया में किसी तरह की वैधानिक बाधा न आए। रिजर्व बैंक की मंजूरी इस पूरी योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा होगी, क्योंकि मौजूदा ढाँचे से बाहर निकलने का प्रस्ताव सीधे कंपनी की नियामकीय स्थिति से जुड़ा हुआ है।
यह योजना जुलाई 2025 में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट के बोर्ड द्वारा पारित सर्वसम्मत प्रस्तावों से भी जुड़ी हुई है। इन प्रस्तावों में टाटा संस की अनलिस्टेड प्राइवेट कंपनी की स्थिति को बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास करने पर सहमति बनी थी। मौजूदा पुनर्गठन प्रस्ताव को इसी उद्देश्य की दिशा में उठाया गया कदम बताया जा रहा है। यदि योजना नियामकीय मंजूरियों के बाद लागू होती है,तो इससे टाटा संस की सूचीबद्धता से जुड़ी संभावित आवश्यकता को टाला जा सकता है।
टाटा संस की सूचीबद्धता का मुद्दा पिछले कुछ समय से टाटा समूह के लिए महत्वपूर्ण कॉरपोरेट और नियामकीय विषय रहा है। रिजर्व बैंक के नियमों के तहत कंपनी की स्थिति में बदलाव होने पर शेयर बाजार में सूचीबद्धता की आवश्यकता उत्पन्न हो सकती है। टाटा ट्रस्ट्स का प्रस्ताव इस संभावना से बचने के लिए कंपनी की व्यावसायिक संरचना को बदलने पर केंद्रित है। हालाँकि,यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि प्रस्तावित पुनर्गठन के बाद नियामकीय स्थिति किस अंतिम रूप में सामने आएगी,क्योंकि इसके लिए संबंधित संस्थाओं की मंजूरी जरूरी है।
इस पुनर्गठन का एक अन्य पहलू टाटा समूह की संगठनात्मक विरासत से जुड़ा है। टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि समूह की वर्तमान संरचना केवल कारोबारी या वित्तीय व्यवस्था नहीं है,बल्कि इसके पीछे एक लंबा ऐतिहासिक मॉडल रहा है। टाटा संस ने अलग-अलग दौर में नए कारोबारों को विकसित करने और उन्हें आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई है। परिचालन कारोबार से प्राप्त आय के माध्यम से नए क्षेत्रों में निवेश करना भी इसी मॉडल का हिस्सा रहा है। प्रस्तावित बदलाव के जरिए ट्रस्ट्स इसी परंपरा को नए स्वरूप में आगे बढ़ाने की बात कर रहा है।
टाटा समूह की कंपनियों ने पिछले कई दशकों में सूचना प्रौद्योगिकी, ऑटोमोबाइल, विमानन, इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग, स्टील, ऊर्जा और अन्य क्षेत्रों में विस्तार किया है। इनमें से कई कारोबार समय के साथ अलग-अलग कंपनियों के रूप में विकसित हुए। टाटा संस की भूमिका भी इसी प्रक्रिया के दौरान बदलती रही। अब टीईएसएस और टीसीई को टाटा संस में मिलाने का प्रस्ताव इस संरचना में एक और महत्वपूर्ण बदलाव की ओर संकेत करता है।
टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स से जुड़े कारोबार को समूह के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में देखा जाता है,खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण और नई तकनीकी क्षमताओं के विकास के संदर्भ में। वहीं टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स इंजीनियरिंग और तकनीकी परामर्श से जुड़ा कारोबार है। इन परिचालन गतिविधियों को टाटा संस के भीतर लाने से कंपनी की आय संरचना और कारोबार का स्वरूप पहले की तुलना में अधिक परिचालन-केंद्रित हो सकता है। ट्रस्ट्स द्वारा पेश किए गए राजस्व आँकड़े भी इसी बदलाव को रेखांकित करते हैं।
प्रस्तावित पुनर्गठन को केवल नियामकीय अनुपालन से जोड़कर देखने के बजाय टाटा ट्रस्ट्स इसे टाटा समूह की दीर्घकालिक पहचान को बनाए रखने की कोशिश के रूप में भी पेश कर रहा है। ट्रस्ट्स का कहना है कि समूह की 100 वर्ष से अधिक पुरानी संगठनात्मक व्यवस्था ने लंबे समय तक राष्ट्र निर्माण, रणनीतिक निवेश और समाज के कमजोर वर्गों के कल्याण से जुड़े उद्देश्यों को समर्थन दिया है। इसलिए टाटा संस की संरचना में बदलाव का सवाल समूह के कारोबारी हितों के साथ-साथ उसकी संस्थागत विरासत से भी जुड़ा हुआ है।
आने वाले समय में इस प्रस्ताव पर टाटा संस के बोर्ड और भारतीय रिजर्व बैंक की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। विलय की शर्तों,नियामकीय अनुपालन, परिसंपत्तियों और आय की संरचना तथा कंपनी की नई स्थिति जैसे पहलुओं पर विस्तृत विचार किया जाएगा। इसके बाद ही यह स्पष्ट होगा कि प्रस्ताव किस रूप में आगे बढ़ता है। फिलहाल टाटा ट्रस्ट्स ने अपनी ओर से यह स्पष्ट कर दिया है कि वह टाटा संस को एक ऐसी संरचना में बनाए रखना चाहता है,जिसमें कंपनी का अपना परिचालन कारोबार और राजस्व हो तथा उसे कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के रूप में लागू होने वाले संभावित सूचीबद्धता संबंधी नियमों से बाहर रखने का रास्ता तैयार किया जा सके।
इस तरह टीईएसएस और टीसीई के प्रस्तावित विलय से टाटा संस की कारोबारी संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव की संभावना है। एक ओर इसका उद्देश्य कंपनी की नियामकीय स्थिति को बदलना है,वहीं दूसरी ओर टाटा ट्रस्ट्स इसे उस पुराने परिचालन मॉडल की वापसी के रूप में देख रहा है,जिसमें टाटा संस स्वयं कारोबार चलाने और उससे होने वाली आय के जरिए समूह के विस्तार में योगदान देती थी। अब इस योजना की सफलता काफी हद तक बोर्ड की मंजूरी और भारतीय रिजर्व बैंक की नियामकीय प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
