विदेश मंत्री एस. जयशंकर (तस्वीर क्रेडिट@AIRNewsHindi)

भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर बनी व्यापक सहमति,लेकिन टैरिफ नीति ने बढ़ाई अंतिम रूप देने की चुनौती: जयशंकर

न्यूयॉर्क,29 सितंबर (युआईटीवी)- न्यूयॉर्क में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर अहम जानकारी दी है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को लेकर मोटे तौर पर सहमति बन चुकी है और बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है। हालाँकि,अमेरिकी व्यापार और टैरिफ नीति में हाल के बदलावों तथा कुछ प्रक्रियाओं के जारी रहने के कारण यह तय करना चुनौतीपूर्ण हो गया है कि इस समझौते को अंतिम रूप कब दिया जाए। जयशंकर के मुताबिक,समझौता अब बातचीत के शुरुआती चरण में नहीं है, बल्कि कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच समझ बनी हुई है। इसके बावजूद बदलते अमेरिकी नीतिगत माहौल ने अंतिम निर्णय की समयसीमा को अनिश्चित बना दिया है।

न्यूयॉर्क में एक सवाल-जवाब सत्र के दौरान जयशंकर ने कहा कि भारत और अमेरिका व्यापार समझौते के मामले में ऐसी स्थिति में पहुँच चुके हैं,जहाँ दोनों पक्षों के बीच कमोबेश सहमति बन चुकी है। उन्होंने इसे बेहद आगे बढ़ी हुई बातचीत बताया। हालांकि, उन्होंने साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि अब केवल दोनों देशों के बीच सहमति होना ही पर्याप्त नहीं है। अमेरिकी व्यापार नीति में बदलावों को भी समझना और उनके प्रभावों का आकलन करना जरूरी है। विशेष रूप से टैरिफ लगाने के आधार में बदलाव और अमेरिकी कानून के तहत चल रही धारा 301 की प्रक्रिया ने समझौते को अंतिम रूप देने के समय को लेकर नई जटिलता पैदा की है।

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर लंबे समय से बातचीत चल रही है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य दोनों देशों के बीच बाजार पहुँच बढ़ाना,व्यापार बाधाओं को कम करना और द्विपक्षीय व्यापार को अधिक संतुलित तथा पूर्वानुमान योग्य बनाना रहा है। फरवरी 2026 में दोनों देशों ने अंतरिम व्यापार व्यवस्था के लिए एक ढाँचे की घोषणा की थी और व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में आगे बढ़ने की प्रतिबद्धता जताई थी। उस समय जारी संयुक्त बयान में दोनों पक्षों ने पारस्परिक और संतुलित व्यापार को आगे बढ़ाने तथा आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक मजबूत बनाने पर जोर दिया था।

हालाँकि,इसके बाद अमेरिकी व्यापार नीति में कई बदलाव सामने आए। टैरिफ के अलावा रूस से ऊर्जा खरीद जैसे मुद्दे भी भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों के लिए महत्वपूर्ण हो गए हैं। सितंबर में अमेरिका के नए कानून ने रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने की संभावना को बढ़ाया है। भारत ने इस पर अपनी आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं अमेरिका के सामने रखी हैं। विदेश मंत्री जयशंकर ने भी न्यूयॉर्क में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ बैठक में इस मुद्दे पर भारत की चिंताओं को उठाया था।

ऐसे माहौल में व्यापार समझौते की अंतिम शर्तों को लेकर भारत के लिए यह देखना जरूरी हो गया है कि अमेरिकी टैरिफ नीति आगे किस दिशा में जाती है। जयशंकर की टिप्पणियों से संकेत मिलता है कि भारत बातचीत को आगे बढ़ाने के पक्ष में है,लेकिन किसी भी समझौते को अंतिम रूप देने से पहले बदलते अमेरिकी नीतिगत ढाँचे का मूल्यांकन करना चाहता है। भारत के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी व्यापार समझौते का असर केवल आयात-निर्यात पर नहीं पड़ता, बल्कि उद्योग, कृषि, छोटे कारोबार, रोजगार और निवेश जैसे क्षेत्रों पर भी पड़ता है।

जयशंकर ने इस संदर्भ में भारत की आर्थिक संरचना की जटिलताओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत में बड़ी संख्या में छोटे किसान और छोटे निर्माता हैं और देश की उत्पादन व्यवस्था अमेरिका से काफी अलग है। इसलिए व्यापार वार्ता में केवल बड़े औद्योगिक हितों को ध्यान में रखकर फैसला नहीं किया जा सकता। भारत को यह सुनिश्चित करना होता है कि बाजार खोलने या शुल्क घटाने से उसके छोटे उत्पादकों और किसानों पर प्रतिकूल असर न पड़े। यही वजह है कि व्यापार वार्ताओं में कई संवेदनशील क्षेत्रों पर लंबे समय तक चर्चा होती है।

भारत सरकार पहले भी कहती रही है कि व्यापार वार्ता में राष्ट्रीय हितों और घरेलू उद्योगों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखना जरूरी है। अमेरिकी धारा 301 के तहत विभिन्न देशों के व्यापार और आयात संबंधी उपायों की जाँच के बाद अतिरिक्त शुल्क के प्रस्ताव सामने आए थे। भारत ने इस प्रक्रिया में अमेरिकी अधिकारियों के साथ बातचीत जारी रखी थी। जुलाई में अमेरिका ने भारत से संबंधित कुछ अंतिम उपायों की घोषणा भी की थी,जिसके तहत अतिरिक्त शुल्क की दर प्रस्तावित दर से कम रखी गई थी।

जयशंकर ने व्यापार वार्ता को लेकर जल्दबाजी के बजाय धैर्य और बारीकी से विचार करने की जरूरत पर जोर दिया। उनके मुताबिक,किसी भी व्यापार समझौते में कई अलग-अलग पहलुओं को एक साथ देखा जाता है। दोनों पक्षों के बीच सहमति बनाने के बाद भी यह सुनिश्चित करना जरूरी होता है कि समझौते की शर्तें व्यावहारिक हों और लंबे समय तक दोनों देशों के लिए स्वीकार्य बनी रहें। भारत और अमेरिका जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापार समझौते का दायरा काफी व्यापक होता है,इसलिए छोटी-सी नीति में बदलाव भी अंतिम समझौते की समयसीमा पर असर डाल सकता है।

विदेश मंत्री ने यह भी माना कि व्यापार समझौते को लेकर चली लंबी बातचीत के दौरान पिछले वर्ष दोनों देशों के संबंधों में उतार-चढ़ाव देखने को मिले। हालाँकि,उन्होंने यह संकेत भी दिया कि व्यापार से जुड़ी मौजूदा अड़चनों के बावजूद भारत-अमेरिका संबंधों की बुनियाद काफी व्यापक है। दोनों देशों के बीच व्यापार के साथ-साथ रक्षा, प्रौद्योगिकी, शिक्षा, निवेश, ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग के कई क्षेत्र हैं। ऐसे में व्यापार विवाद या टैरिफ से पैदा हुई चुनौतियों को पूरे संबंधों के संदर्भ में देखना होगा।

जयशंकर ने भारत-अमेरिका संबंधों को प्रभावित करने वाले दो अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों का भी उल्लेख किया। इनमें पहला आतंकवाद और दूसरा लोगों की आवाजाही यानी मोबिलिटी है। आतंकवाद को भारत की प्रमुख सुरक्षा चिंताओं में शामिल करते हुए उन्होंने कहा कि भारत ने लंबे समय तक सीमा पार से होने वाले आतंकवादी हमलों का सामना किया है। ऐसे में यदि कोई साझेदार देश भारत की इस चिंता को पर्याप्त रूप से नहीं समझता है, तो उसका प्रभाव द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ना स्वाभाविक है।

जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारत के लिए आतंकवाद केवल किसी एक समय का मुद्दा नहीं है,बल्कि लंबे समय से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंता रहा है। उन्होंने कहा कि किसी साझेदारी में एक-दूसरे की प्रमुख चिंताओं को समझना आवश्यक है। उनके अनुसार,यदि किसी देश की सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा चिंताओं में से किसी एक को उसका साझेदार पूरी तरह नहीं समझता,तो इसका असर संबंधों के व्यापक माहौल पर पड़ सकता है। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब भारत लगातार सीमा पार आतंकवाद को लेकर अपनी स्थिति अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर रखता रहा है।

आतंकवाद के अलावा लोगों की आवाजाही का मुद्दा भी भारत-अमेरिका संबंधों में महत्वपूर्ण है। भारत और अमेरिका के बीच बड़ी संख्या में छात्र,पेशेवर, शोधकर्ता, तकनीकी विशेषज्ञ और कारोबारी आवाजाही करते हैं। दोनों देशों के आर्थिक और तकनीकी संबंधों में यह मानवीय संपर्क लंबे समय से अहम भूमिका निभाता रहा है। जयशंकर के मुताबिक,लोगों की आवाजाही से होने वाले आर्थिक लाभ और अमेरिका के कुछ हिस्सों में इससे जुड़ी राजनीतिक चिंताओं के बीच अब टकराव दिखाई दे रहा है। इसका असर इस बात पर भी पड़ सकता है कि आम लोग भारत-अमेरिका संबंधों को किस नजरिए से देखते हैं।

मोबिलिटी का मुद्दा खास तौर पर भारतीय पेशेवरों और अमेरिकी कंपनियों के बीच संबंधों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। सूचना प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, शिक्षा और अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में भारतीय पेशेवरों की मौजूदगी दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों का हिस्सा रही है,लेकिन अमेरिका में आव्रजन और काम के लिए विदेशी पेशेवरों की आवाजाही को लेकर राजनीतिक बहस तेज होने पर इसका प्रभाव भारत-अमेरिका संबंधों पर भी पड़ सकता है। जयशंकर ने इसी व्यापक संदर्भ में कहा कि आज की कूटनीति केवल सरकारों और राजनयिकों के बीच होने वाली बातचीत तक सीमित नहीं रह सकती।

उनके मुताबिक,लोकतांत्रिक देशों में जनता की राय का महत्व लगातार बढ़ रहा है। इसलिए किसी भी बड़े द्विपक्षीय रिश्ते को केवल नेताओं या सरकारों के बीच समझौते के रूप में नहीं देखा जा सकता। व्यापार, रोजगार, आव्रजन, सुरक्षा और आर्थिक अवसर जैसे मुद्दे सीधे आम लोगों को प्रभावित करते हैं और इसी वजह से इन पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण होती है। भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत बनाए रखने के लिए दोनों देशों की सरकारों को इन व्यापक सामाजिक और आर्थिक चिंताओं को ध्यान में रखना होगा।

जयशंकर ने कहा कि भारत निश्चित रूप से चाहता है कि दोनों देशों के संबंध आगे भी बेहतर दिशा में बढ़ें,लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इसके लिए दोनों पक्षों को सामने मौजूद समस्याओं को सुलझाना होगा। इस टिप्पणी को व्यापार समझौते के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि एक तरफ दोनों देश रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर टैरिफ, ऊर्जा सुरक्षा और बाजार पहुँच जैसे आर्थिक मुद्दे बातचीत को प्रभावित कर रहे हैं।

भारत-अमेरिका संबंधों में व्यापार लंबे समय से एक महत्वपूर्ण लेकिन जटिल विषय रहा है। दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश में काफी वृद्धि हुई है,लेकिन बाजार तक पहुँच, शुल्क, कृषि उत्पादों, औद्योगिक वस्तुओं और विभिन्न नियामकीय मुद्दों पर मतभेद भी सामने आते रहे हैं। फरवरी में घोषित अंतरिम व्यापार ढाँचे में अमेरिका और भारत ने कई क्षेत्रों में शुल्क और बाजार पहुँच को लेकर संभावित व्यवस्थाओं पर सहमति जताई थी। अमेरिकी पक्ष ने कुछ भारतीय उत्पादों पर पारस्परिक शुल्क कम करने तथा कुछ क्षेत्रों में अतिरिक्त शुल्क हटाने की बात भी कही थी।

मौजूदा स्थिति में भारत और अमेरिका के बीच बातचीत का अगला चरण महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल 29 सितंबर से 5 अक्टूबर तक अमेरिका की यात्रा पर हैं। इस दौरान प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने के लिए अमेरिकी अधिकारियों के साथ बातचीत होनी है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमीसन ग्रीयर के निमंत्रण पर होने वाली इस यात्रा में जी-20 व्यापार मंत्रियों की बैठक में भागीदारी भी शामिल है। भारत सरकार के अनुसार, बातचीत का उद्देश्य संतुलित और दोनों देशों के लिए लाभकारी व्यापार समझौते की दिशा में आगे बढ़ना है।

इस पूरी प्रक्रिया के बीच भारत के सामने एक तरफ अमेरिका के साथ आर्थिक संबंधों को और मजबूत करने का अवसर है, तो दूसरी तरफ घरेलू हितों की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण है। छोटे किसानों, छोटे निर्माताओं और घरेलू उद्योगों के लिए बाजार खोलने से जुड़े संभावित प्रभावों को लेकर सावधानी बरतना भारत की वार्ता रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वहीं अमेरिका अपनी व्यापार नीति के जरिए बाजार पहुँच,व्यापार घाटे और दूसरे आर्थिक मुद्दों पर अधिक अनुकूल शर्तें हासिल करना चाहता है। इन अलग-अलग प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाना ही बातचीत की सबसे बड़ी चुनौती है।

जयशंकर की न्यूयॉर्क में की गई टिप्पणियाँ इसी व्यापक तस्वीर को सामने रखती हैं। एक ओर उन्होंने संकेत दिया कि व्यापार समझौते पर बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है और दोनों पक्षों के बीच व्यापक समझ बन चुकी है। दूसरी ओर उन्होंने बदलती अमेरिकी टैरिफ नीति और जारी प्रक्रियाओं के कारण अंतिम रूप देने के समय को लेकर सावधानी बरतने की बात कही। साथ ही आतंकवाद और लोगों की आवाजाही जैसे मुद्दों को उन्होंने भारत-अमेरिका संबंधों की व्यापक दिशा से जोड़ा।

भारत और अमेरिका पिछले दो दशकों में रक्षा, प्रौद्योगिकी, व्यापार, शिक्षा और रणनीतिक सहयोग के कई क्षेत्रों में करीब आए हैं। दोनों देश क्वाड के सदस्य हैं और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भी सहयोग करते हैं। इसके बावजूद भारत अपनी विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता और स्वतंत्र निर्णय लेने की गुंजाइश बनाए रखने पर जोर देता रहा है। अमेरिका के साथ संबंधों को मजबूत करने के साथ-साथ रूस, यूरोप, पश्चिम एशिया और अन्य साझेदारों के साथ अपने हितों को संतुलित करना भारत की विदेश नीति का अहम हिस्सा है।

ऐसे में प्रस्तावित व्यापार समझौता केवल शुल्क और बाजार पहुँच का मामला नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के व्यापक आर्थिक और रणनीतिक संबंधों से भी जुड़ा हुआ है। यदि लंबित मुद्दों पर सहमति बनती है,तो समझौता दोनों देशों के कारोबारी संबंधों के लिए नई दिशा तय कर सकता है,लेकिन जयशंकर की टिप्पणियों से साफ है कि भारत अंतिम निर्णय लेने से पहले अमेरिकी टैरिफ नीति, धारा 301 की प्रक्रिया, घरेलू आर्थिक हितों और व्यापक द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े मुद्दों को एक साथ देख रहा है। आने वाले दौर की वार्ताओं से यह स्पष्ट होगा कि दोनों देश मौजूदा मतभेदों को किस तरह सुलझाते हैं और लंबे समय से चल रही बातचीत को अंतिम समझौते तक पहुँचाने के लिए किस तरह की शर्तों पर सहमति बनती है।