न्यूयॉर्क,30 अप्रैल (युआईटीवी)- उपनिवेशवाद और उससे जुड़े ऐतिहासिक विवाद एक बार फिर अंतर्राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। न्यूयॉर्क सिटी के मेयर जोहरान ममदानी ने हाल ही में ब्रिटेन के राजा किंग चार्ल्स III से मुलाकात के दौरान कोहिनूर हीरे का मुद्दा उठाने की बात कहकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। ममदानी ने स्पष्ट रूप से कहा कि अगर उन्हें किंग चार्ल्स से अलग से बात करने का अवसर मिलता,तो वे उनसे कोहिनूर हीरा भारत को लौटाने का आग्रह करते। उनके इस बयान को उपनिवेशवाद के इतिहास पर एक सशक्त और स्पष्ट टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है।
यह पूरा घटनाक्रम उस समय सामने आया,जब किंग चार्ल्स III अमेरिका के चार दिवसीय दौरे पर न्यूयॉर्क पहुँचे थे। इस दौरान वे 9/11 हमलों के पीड़ितों को श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित एक समारोह में शामिल हुए। इसी कार्यक्रम में उनकी मुलाकात ममदानी से भी हुई। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में दोनों को संक्षिप्त बातचीत करते हुए देखा गया,हालाँकि,यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि उस बातचीत में क्या चर्चा हुई। किंग चार्ल्स के हावभाव से भी यह संकेत नहीं मिला कि कोई गंभीर विषय उठाया गया हो,क्योंकि यह मुलाकात भीड़भाड़ वाले माहौल में अन्य विशिष्ट व्यक्तियों की उपस्थिति में हुई थी।
इस मुलाकात से पहले ही ममदानी ने अपने बयान में कहा था कि यदि उन्हें औपचारिक कार्यक्रम से अलग कोई समय मिलता है,तो वे कोहिनूर हीरे की वापसी का मुद्दा जरूर उठाएँगे। उन्होंने इसे ब्रिटिश शासन द्वारा भारत से की गई ऐतिहासिक लूट का प्रतीक बताया। ममदानी का यह रुख कोई नया नहीं है,क्योंकि वे पहले भी उपनिवेशवाद और उसके प्रभावों पर खुलकर बोलते रहे हैं। उनके पिता,प्रसिद्ध विद्वान महमूद ममदानी,भी उपनिवेशवाद के प्रभावों पर व्यापक लेखन कर चुके हैं,जिसका प्रभाव उनके विचारों में साफ देखा जा सकता है।
कोहिनूर हीरा,जिसे दुनिया के सबसे प्रसिद्ध और विवादित हीरों में गिना जाता है,लंबे समय से भारत और ब्रिटेन के बीच विवाद का विषय रहा है। करीब 106 कैरेट का यह हीरा आज ब्रिटिश शाही ताज का हिस्सा है और इसे लंदन स्थित टावर ऑफ लंदन में रखा गया है। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार,इस हीरे को 19वीं सदी में ईस्ट इंडिया कंपनी ने दूसरे एंग्लो-सिख युद्ध के बाद पंजाब के तत्कालीन महाराज दलीप सिंह से हासिल किया था,जो उस समय मात्र 11 वर्ष के थे।
ब्रिटेन का दावा है कि यह हीरा उन्हें कानूनी रूप से मिला था,क्योंकि उस समय के शासक ने इसे सौंपा था। हालाँकि,भारत इस दावे को पूरी तरह खारिज करता रहा है और स्वतंत्रता के बाद से ही इस हीरे की वापसी की माँग करता आया है। भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार,यह केवल एक हीरा नहीं,बल्कि उपनिवेशकालीन शोषण और सांस्कृतिक लूट का प्रतीक है।
इस मुद्दे पर भारतीय राजनीति में भी समय-समय पर बयान सामने आते रहे हैं। कांग्रेस नेता शशि थरूर ने कोहिनूर को उन सांस्कृतिक धरोहरों का प्रतीक बताया है,जिन्हें ब्रिटिश साम्राज्य अपने साथ ‘ट्रॉफी’ के रूप में ले गया था। उनका मानना है कि यह केवल भारत का ही नहीं,बल्कि उन सभी देशों का मामला है,जिनकी सांस्कृतिक संपत्तियाँ औपनिवेशिक दौर में उनसे छीन ली गईं।
कोहिनूर की उत्पत्ति भारत के दक्षिणी हिस्से में मानी जाती है। यह हीरा आंध्र प्रदेश के कोल्लूर खदानों से निकाला गया था,जो उस समय गोलकुंडा क्षेत्र के अंतर्गत आता था। बाद में इसे बिना तराशे ब्रिटेन ले जाया गया,जहाँ इसे कई हिस्सों में काटकर अधिक चमकदार बनाया गया। इस प्रक्रिया के बाद इसका आकार छोटा जरूर हुआ,लेकिन इसकी चमक और आकर्षण और बढ़ गया।
यह विवाद केवल भारत तक सीमित नहीं है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान ने भी समय-समय पर इस हीरे पर अपना दावा जताया है। हालाँकि,ममदानी ने अपने बयान में यह स्पष्ट नहीं किया कि कोहिनूर को किस देश को लौटाया जाना चाहिए,लेकिन उनका मुख्य जोर इस बात पर था कि यह हीरा अपने मूल क्षेत्र में वापस जाना चाहिए।
किंग चार्ल्स III का यह अमेरिका दौरा कई मायनों में महत्वपूर्ण था। अमेरिका इस समय अपनी आजादी की 250वीं वर्षगांठ की तैयारियों में जुटा है,जो उसे ब्रिटिश शासन से मिली स्वतंत्रता की याद दिलाता है। ऐसे समय में ब्रिटिश राजा का दौरा और कोहिनूर जैसे मुद्दे का उठना,इतिहास की उन परतों को फिर से उजागर करता है,जिनका असर आज भी अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर पड़ता है।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और दिलचस्प पहलू यह रहा कि पूर्व न्यूयॉर्क मेयर माइकल ब्लूमबर्ग ने किंग चार्ल्स और उनकी पत्नी क्वीन कैमिला को स्मारक स्थल तक ले जाकर फूल अर्पित कराए,जबकि ममदानी ने इस भूमिका को नहीं निभाया। इसे भी उनके औपचारिक दूरी बनाए रखने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
ममदानी के इस बयान ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या उपनिवेशकालीन धरोहरों को उनके मूल देशों को वापस किया जाना चाहिए। यह बहस केवल कोहिनूर तक सीमित नहीं है,बल्कि दुनिया भर के संग्रहालयों और निजी संग्रहों में रखी गई उन वस्तुओं तक फैली हुई है,जिन्हें औपनिवेशिक दौर में विभिन्न देशों से ले जाया गया था।
कोहिनूर हीरे को लेकर ममदानी का बयान एक बार फिर उस ऐतिहासिक बहस को सामने ले आया है,जो वर्षों से चली आ रही है। यह देखना दिलचस्प होगा कि भविष्य में इस मुद्दे पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई ठोस पहल होती है या यह केवल राजनीतिक और नैतिक बहस तक ही सीमित रह जाता है।
